उम्र 70, हाथों में हुनर और जंगल आजीविका का सहारा; जानिए फूलमनी की संघर्ष कहानी

झारखंड के गुड़ाबांदा में सबर जनजाति के लोग जंगल से खड़ाग घास चुनकर झाड़ू बना रहे हैं. जानिए कैसे यह पारंपरिक काम उनकी आजीविका का मुख्य साधन बना हुआ है.

गुड़ाबांदा. गुड़ाबांदा प्रखंड में सबर जनजाति के लोग इन दिनों जंगलों से खड़ाग घास (सींक या जंगली घास) चुनकर झाड़ू बनाने और बेचने का काम कर अपनी आजीविका चला रहे हैं. सिंहपुरा हाटचाली के समीप जंगल में गुरुवार को फूलखुटा निवासी 70 वर्षीय फूलमनी सबर भी खड़ाग घास चुनती नजर आयीं. उम्र के इस पड़ाव में वह जंगल से घास चुनकर झाड़ू तैयार कर परिवार के भरण-पोषण में सहयोग कर रही हैं. फूलमनी जी बताती हैं कि यह काम करके उन्हें अपने परिवार का पेट भरने में मदद मिलती है. इस उम्र में भी कुछ काम करने से उन्हें अपनेपन और जरूरत का एहसास होता है, जिससे उन्हें संतुष्टि मिलती है.

सबर समुदाय के लिए जंगल से मिलने वाले उत्पाद लंबे समय से आजीविका का प्रमुख और पारंपरिक साधन रहे हैं. खड़ाग घास झारखंड, ओडिशा और पश्चिम बंगाल के जंगलों में अधिक पायी जाती है. जंगल से घास चुनने के बाद इसे धूप में सुखाया जाता है और फिर पुरुष व महिलाएं मिलकर हाथों से झाड़ू तैयार करते हैं. वे घास के गुच्छों को इकट्ठा करके, उन्हें बारी-बारी से दोनों हाथों से कसकर मरोड़ते हैं. फिर, एक मजबूत डंडी को बीच में डालकर, वे उसे घास के साथ कसकर बांधते हैं, कभी-कभी सूत या किसी अन्य मजबूत धागे का इस्तेमाल करते हुए. उनकी उंगलियां इतनी फुर्ती से चलती हैं कि देखते ही बनता है. बिना किसी आधुनिक मशीन के तैयार ये झाड़ू मजबूत और टिकाऊ होते हैं.

जंगल से इकट्ठा की गई घास को सुखाकर और हाथों से झाड़ू बनाने के बाद, समुदाय इन्हें स्थानीय हाटों में बेचता है. तैयार झाड़ू को स्थानीय साप्ताहिक हाट में बेचकर परिवार अपनी जरूरतें पूरी करते हैं. एक झाड़ू 30 से 50 रुपये तक में बिकती है. हालांकि दिनभर की मेहनत के बावजूद उचित बाजार नहीं मिलने और बिचौलियों के कारण इन्हें उत्पाद का सही मूल्य नहीं मिल पाता.

ग्रामीणों का कहना है कि यदि सबर समुदाय के इन पारंपरिक उत्पादों के लिए उचित बाजार और बेहतर मूल्य की व्यवस्था हो, तो उनकी आर्थिक स्थिति में सुधार हो सकता है और उनकी पारंपरिक कला भी संरक्षित रह सकेगी.

प्रभात खबर डिजिटल टॉप स्टोरी

लेखक के बारे में

By मो. युनूस परवेज

मो. युनूस परवेज वर्ष 1995 से पत्रकारिता कर रहे हैं. उन्होंने घाटशिला महाविद्यालय और रांची विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में स्नातक और राजनीतिक विज्ञान ऑनर्स की डिग्री हासिल की है. इनकी राजनीति, अपराध, नक्सलवाद, खेल, शिक्षा और खेती किसानी की खबरों में विशेष रुचि है. डिजिटल जर्नलिज्म में 5 साल का अनुभव है.

Read More
ePaper

अपने दैनिक समाचार अनुभव को और बेहतरीन बनाएं

सिर्फ ₹399 ₹149

एक साल के लिए

आज ही सब्सक्राइब करें

संबंधित खबरें >

यह भी पढ़ें >