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Sarhul 2022: सरहुल पूजा में सरई के फूल और आम के पत्तों का क्या है महत्व, जानें

सरहुल पर्व को लेकर आदिवासी समुदाय के लोगों की तैयारी अंतिम चरण में है. सरहुल पूजा में सरई के फूल और आम के पत्तों का अपना महत्व है. इस संबंध में पहान और पुजार सरहुल पूजा से जुड़ी कई मान्यता बता रहे हैं, ताकि युवा पीढ़ी अपनी परंपरा को जानें.

By Prabhat khabar Digital
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Jharkhand news: सरहुल पूजा में सरई के फूल और आम के पत्तों का विशेष महत्व बताते पहान और पुजार.
Jharkhand news: सरहुल पूजा में सरई के फूल और आम के पत्तों का विशेष महत्व बताते पहान और पुजार.
प्रभात खबर.

Sarhul 2022: आदिवासियों की परंपरा, संस्कृति, रहन-सहन से जुड़ा हुआ पर्व है सरहुल. सरहुल पर्व के बाद से आदिवासी परिवार में कई शुभ काम शुरू होते हैं. अगर सरहुल पूजा की बात करें, तो सरई के फूल और आम के पत्तों का इस पूजा में विशेष महत्व है. घाघरा के समीर भगत और भउवा पहान ने बताया कि हम आदिवासी प्राकृतिक पूजक हैं. हमारे पूर्वजों ने प्राकृतिक की पूजा की. जिसे हम जन्मों जन्मांतर तक बरकरार रखेंगे. यह पर्व हमारी पहचान है. सरहुल के बाद जोताई, कोड़ाई और बुनाई जैसे कामों में किसान लग जाते हैं. जब तक सरहुल का पूजा नहीं होता. तब तक नया पत्ता का उपयोग नहीं किया जाता है. सरहुल के दिन सरई के फूल और पत्तों से सरना में पूजा अर्चना की जाती है. जिसके बाद ही नये पत्ते का उपयोग हम सभी करते हैं.

आदिवासी समुदाय की पहचान है सरहुल पर्व

कामडारा प्रखंड के बुका तोपनो ने सरहुल पर्व मनाने की परंपरा को आदिवासी की पहचान बताया है. उन्होंने कहा कि आदिवासी समाज हमेशा से प्रकृति पूजक रहा है. सरहुल पर्व हमें पर्यावरण बचाने का संदेश देता है. मरकुश तोपनो, नूतन तोपनो और आमुश तोपनो ने कहा कि सरहुल पर्व हमारी संस्कृति और सभ्यता तथा एकता और अखंडता को बनाये रखने का प्रेरणा देता है. सरना स्थल में देवी-देवता की पहान और पुजार के नेतृत्व में पूजा पाठ किया जाता है.

जल, जंगल और जमीन में बसती है आदिवासियों की आत्मा

चैनपुर के बैगा रवि उरांव ने कहा कि आदिवासियों की आत्मा जल, जंगल एवं जमीन में बसती है. सरहुल पर्व जल, जंगल और जमीन पर ही आधारित है. पतझड़ के बाद जब पेड़-पौधों में नये पत्ते उगते हैं और प्रकृति हरी-भरी होने लगती है. रबी की फसल कट जाती है. तब सरहुल का पर्व मनाया जाता है. डुमरी प्रखंड के जगरनाथ भगत ने बताया कि सरहुल के दिन सरना स्थल में बैगा पुजार द्वारा धरती माता और सूर्यदेव भगवान की पूजा अर्चना की जाती है. उस दिन के पूजा का मान्यता यह है कि बरसात होने से पहले आदिवासी समाज आनेवाले दिनों में कृषि कार्य और खेती-बारी से जुड़े हैं. पूजा के बाद खेती-बारी का काम शुरू करता है.

खिचड़ी खाने और आग जलाने की प्राचीन मान्यता

पूजा के दिन बैगा पुजार द्वारा घड़े में खिचड़ी पकाया जाता है. इसकी मान्यता है कि घड़े के जिस ओर से खिचड़ी उबलना शुरू करता है. उसी ओर से बरसात का आगमन होता है. इसके बाद जब बैगा पुजार लोग खिचड़ी खाते हैं, तो उनके पीछे की ओर आग जला दिया जाता है. इसका मतलब यह होता है कि अगर बैगा पुजार आग की गर्मी को बर्दाश्त करते हुए शांतिपूर्ण ढंग से खिचड़ी खाते हैं, तो गांव में सुख-शांति रहती है और जहां आग या गर्मी को बर्दाश्त नहीं कर पाते हैं, तो गांव में मच्छर, बीमारी सहित अन्य प्रकार का कहर बढ़ जाता है. इसलिए सरहुल सरना पूजा आदिवासियों के लिए बहुत महत्वपूर्ण है.

रिपोर्ट : दुर्जय पासवान, गुमला.

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