बच्चों में कुपोषण की समस्या को मात देने के लिए गुमला जिले में पिछले पांच वर्षों से कार्यरत है ‘सेव दि चिल्ड्रेन’

By Prabhat Khabar Digital Desk
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-रजनीश आनंद-

रांची/गुमला :
बच्चों को देश का भविष्य माना जाता है, लेकिन यह झारखंड के लिए दुर्भाग्य की बात है कि यहां के 47.8 प्रतिशत बच्चे कुपोषण के शिकार हैं. एनएफएचएस-4 (2015-16) के अनुसार झारखंड में 5 वर्ष से कम उम्र के लगभग 45 प्रतिशत बच्चे बौनेपन के शिकार हैं. 29 प्रतिशत बच्चे काफी दुबले हैं, यानी वे पोषाहार से वंचित हैं. लगभग 47.8 प्रतिशत बच्चे कुपोषण के शिकार है. स्थिति कितनी भयावह है इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि छह से 59 माह के 70 प्रतिशत बच्चे एनिमिया के शिकार हैं. इनमें से 32 प्रतिशत माइल्ड एनीमिया के शिकार हैं, जबकि 37 प्रतिशत को मध्यम श्रेणी का एनीमिया है और एक प्रतिशत बच्चे सिवियर एनीमिया के शिकार हैं.

बच्चों में कुपोषण की समस्या को मात देने के लिए गुमला जिले में पिछले पांच वर्षों से कार्यरत है ‘सेव दि चिल्ड्रेन’

बच्चों को एक स्वस्थ जीवन देने और इस स्थिति से उबरने के लिए के झारखंड सरकार ने 13 नवंबर 2015 को स्टेट न्यूट्रिशन मिशन को लॉन्च किया. इस मिशन का उद्देश्य बच्चों को कुपोषण से मुक्त करना है. झारखंड ने प्रदेश को कुपोषण मुक्त राज्य बनाने के लिए दस साल का समय निर्धारित किया है.बाल अधिकारों के लिए काम करने वाली संस्था ‘सेव दि चिल्ड्रेन’ गुमला में पिछले पांच वर्षों से सरकार के साथ काम कर रही है. अभी संस्था स्टेट न्यूट्रिशन मिशन के तहत काम कर रही है. संस्था के अस्टिेंट मैनेजर प्रोग्राम संजय कुमार ने बताया कि ‘सेव दि चिल्ड्रेन’ सरकारी योजनाओं के अनुसार ही काम कर रही है. इसके लिए वे समुदाय आधारित प्रबंधन का काम करते हैं. संस्था गांव में अति कुपोषित बच्चों को चिह्नित करने का काम करती है, इसके लिए वे आंगनबाड़ी सेविका और एएनएम का सहयोग लेते हैं.

बच्चों में कुपोषण की समस्या को मात देने के लिए गुमला जिले में पिछले पांच वर्षों से कार्यरत है ‘सेव दि चिल्ड्रेन’



बच्चों को जब चिह्नित कर लिया जाता है, तो जो बच्चे सामान्य होते हैं, उनके माता-पिता की काउंसिलिंग की जाती है और उन्हें यह बताया जाता है कि आपका बच्चा सामान्य है. साथ ही उन्हें यह भी बताया जाता है कि वे कैसे और क्या करें कि उनका बच्चा सामान्य बना रहे. इसमें साफ-सफाई और आहार की जानकारी दी जाती है.जिनके बच्चों में कुपोषण के लक्षण दिखते हैं उनके माता-पिता की काउंसेलिंग होती है जिसमें उन्हें पोषण का महत्व बताया जाता है, साथ ही पोषाहार की जानकारी दी जाती है. साथ ही पोषण का महत्व समझाते हुए उन्हें यह बताया जाता है कि कैसे बच्चों को स्वस्थ रखा जा सकता है.वहीं जो बच्चा कुपोषित बच्चे के रूप में चिह्नित होता है, उसका इलाज शुरू किया जाता है. अगर जरूरत होती है तो उसे पोषण पुर्नवास केंद्र में उपचार हेतु परामर्श देकर भेजा जाता है.

बच्चों में कुपोषण की समस्या को मात देने के लिए गुमला जिले में पिछले पांच वर्षों से कार्यरत है ‘सेव दि चिल्ड्रेन’


अस्टिेंट मैनेजर प्रोग्राम संजय कुमार, ‘सेव दि चिल्ड्रेन’

साथ ही गर्भवती माताओं को भी पोषाहार के बारे में जानकारी दी जाती है, ताकि कोई कुपोषित बच्चा जन्म ना ले. यह प्रयास किया जाता है कि 2.5 किलोग्राम से कम वजन का बच्चा जन्म ना ले, इसके लिए गर्भवती माताओं को आयरन की गोली देना और पोषाहार उपलब्ध कराना प्रमुख है. साथ ही लोगों को जागरूक करने के लिए हेल्दी बेबी शो का भी आयोजन किया जाता है, ताकि लोग पोषण के महत्व को समझें. बच्चों और माताओं को ‘रेडी यू यूज’ आहार भी दिया जाता है.बच्चों को कुपोषण से बचाने के लिए सरकार के कई विभाग अपने-अपने स्तर से प्रयास कर रहे हैं और इन विभागों को कोआर्डिनेट करने का काम ‘सेव दि चिल्ड्रेन’ कर रही है. जो डिपार्डमेंट कुपोषण के खिलाफ काम कर रहा है उनमें महिला एवं बाल विकास विभाग, कृषि एवं पशुपालन, पेयजल एवं स्वच्छता, कल्याण विभाग, स्वास्थ्य विभाग एवं जनजातीय विभाग प्रमुख है.

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