गढ़वा में बच्चों की स्कूल यात्रा पर सवाल, 5 बसों में 3 खराब, 2 में नहीं मिला फर्स्ट एड-जीपीएस

गढ़वा में स्कूली बच्चों की परिवहन व्यवस्था पर सवाल उठे हैं. पांच बसों का दावा होने के बावजूद जांच में सिर्फ दो बसें मिलीं और दोनों में फर्स्ट एड बॉक्स व जीपीएस नहीं था. कई बच्चे अभिभावकों की ओर से की गयी टेंपो व्यवस्था से स्कूल पहुंच रहे हैं.

गढ़वाः बच्चे स्कूल सुरक्षित पहुंचें और सुरक्षित घर लौटें, यह जिम्मेदारी केवल अभिभावकों की नहीं, बल्कि स्कूल प्रबंधन और परिवहन व्यवस्था से जुड़े पूरे तंत्र की है. लेकिन जिले में स्कूली बच्चों के आवागमन की व्यवस्था को लेकर सामने आ रही स्थिति बच्चों की सुरक्षा पर सवाल खड़े कर रही है. स्कूल आने-जाने के दौरान बच्चों की सुरक्षा आखिर किसके भरोसे है, यह सवाल अब गंभीर होता जा रहा है.

स्कूल के पास पांच बसें, जांच में मिली 2

एक विद्यालय के निरीक्षण के दौरान प्रधानाध्यापिका ने बताया कि बच्चों के आवागमन के लिए स्कूल संचालक की ओर से पांच बसों की व्यवस्था की गई है. हालांकि, जांच के दिन इनमें से केवल दो बसें ही उपलब्ध थी. बताया गया कि शेष तीन बसें खराब होने के कारण संचालित नहीं हो रही थी. उपलब्ध दोनों बसों की जांच के दौरान उनमें फर्स्ट एड बॉक्स और जीपीएस की सुविधा नहीं मिली. आपात स्थिति में प्राथमिक उपचार और वाहन की निगरानी के लिहाज से ये दोनों व्यवस्थाएं बच्चों की सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण मानी जाती हैं.

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अभिभावकों पर टेंपो से आने-जाने वाले बच्चों की जिम्मेदारी

जांच के दौरान यह भी सामने आया कि कई बच्चे टेंपो से स्कूल आते-जाते हैं. इन टेंपो की व्यवस्था विद्यालय की ओर से नहीं की जाती है. अभिभावक अपने स्तर से बच्चों के लिए टेंपो की व्यवस्था करते हैं. ऐसे में बच्चे किस टेंपो से स्कूल जाएंगे, चालक कौन होगा और वाहन बच्चों के लिए कितना सुरक्षित है, इसकी जिम्मेदारी अभिभावकों पर ही रह जाती है. टेंपो परिचालन की जानकारी मिलने के बाद जांच टीम ने विद्यालय प्रबंधन को निर्देश दिया कि अभिभावकों को बच्चों के परिवहन के दौरान होने वाले हादसों और सुरक्षा संबंधी जोखिमों के बारे में स्पष्ट रूप से बताया जाए. अभिभावकों को यह भी जानकारी देने को कहा गया कि विद्यालय की ओर से टेंपो उपलब्ध नहीं कराया जा रहा है और परिवहन की व्यवस्था वे अपने स्तर से कर रहे हैं.

बसों की व्यवस्था पर भी उठे सवाल

विद्यालय प्रबंधन ने बच्चों के परिवहन के लिए पांच बसें होने की जानकारी दी, लेकिन निरीक्षण के दिन तीन बसों का संचालित नहीं होना व्यवस्था की वास्तविक स्थिति पर सवाल खड़ा करता है. खराब बसें कब से बंद हैं और उनके स्थान पर बच्चों के लिए वैकल्पिक सुरक्षित परिवहन की क्या व्यवस्था है, यह भी महत्वपूर्ण है. उपलब्ध दोनों बसों में फर्स्ट एड बॉक्स और जीपीएस नहीं मिलना भी चिंता का विषय है. दुर्घटना या आपात स्थिति में प्राथमिक उपचार की व्यवस्था और वाहन की निगरानी के लिए जीपीएस जैसी सुविधाएं बच्चों की सुरक्षा से सीधे जुड़ी हैं.

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पिछली जांच में भी सामने आयी थी गंभीर लापरवाही

स्कूल वाहनों को लेकर प्रशासन की चिंता नई नहीं है. पिछले दिनों जिला शिक्षा पदाधिकारी जगरनाथ लोहरा और मोटरयान निरीक्षक मनीष कुमार गुप्ता की जांच में भी स्कूली बच्चों के परिवहन में गंभीर खामियां सामने आयी थी. आरके पब्लिक स्कूल, हूर की जांच के दौरान 15 सीट वाली बस में 32 बच्चे और 22 सीट वाली बस में 41 बच्चे सवार मिले थे. यानी दोनों वाहनों में निर्धारित क्षमता से काफी अधिक बच्चों को बैठाया गया था. जांच के दौरान एक चालक के मादक पदार्थ के सेवन की स्थिति में होने की बात भी सामने आई थी. इसके अलावा वाहनों के जरूरी कागजात और सुरक्षा मानकों की भी जांच की गई थी.

स्कूल बसों के साथ टेंपो पर भी निगरानी जरूरी

लगातार सामने आ रहे मामलों से यह स्पष्ट है कि स्कूली बच्चों के परिवहन की निगरानी केवल स्कूल बसों तक सीमित रखने से बात नहीं बनेगी. बड़ी संख्या में अभिभावक बच्चों के लिए निजी स्तर पर टेंपो की व्यवस्था करते हैं. ऐसे में स्कूल प्रबंधन की जिम्मेदारी केवल स्कूल परिसर तक सीमित नहीं मानी जा सकती. कम से कम अभिभावकों को सुरक्षित परिवहन के मानकों और संभावित जोखिमों की जानकारी देना जरूरी है.

जिला शिक्षा पदाधिकारी जगरनाथ लोहरा की निगरानी में हुई जांचों से संकेत मिलता है कि प्रशासन स्कूलों की परिवहन व्यवस्था को लेकर गंभीर है. अब जरूरत इस बात की है कि स्कूल बसों के साथ उन टेंपो की व्यवस्था पर भी नजर रखी जाये, जिनसे बच्चे रोज स्कूल पहुंच रहे हैं. बच्चों की सुरक्षा केवल स्कूल के गेट तक सीमित नहीं है. घर से स्कूल और स्कूल से घर तक उनका सुरक्षित सफर भी उतना ही जरूरी है.

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By Avinash Singh

अविनाश कुमार सिंह प्रभात खबर के गढ़वा ब्यूरो चीफ हैं. वह आंचलिक से लेकर राज्य मुख्यालय तक 27 वर्ष से अधिक की पत्रकारिता का अनुभव रखते हैं. राजनीतिक विश्लेषण, क्राइम रिपोर्टिंग, हाई-प्रोफाइल इंटरव्यू और खोजी पत्रकारिता.में इन्हें महारत हासिल है. अविनाश कुमार सिंह झारखंड की पत्रकारिता और 'प्रभात खबर' के विश्वसनीय चेहरा हैं, जिन्होंने खबरों की गुणवत्ता को हमेशा प्राथमिकता दी है. लगभग तीन दशकों (27 वर्ष) के अपने लंबे सफर में उन्होंने पलामू ब्यूरो प्रमुख के रूप में 10 साल से अधिक समय तक नेतृत्व किया. इसके बाद प्रदेश मुख्यालय (रांची) में काम करते हुए, विशेषकर वर्ष 2024 के चुनावों के दौरान, उनके सटीक चुनावी विश्लेषण और राजनीतिक रिपोर्टिंग ने काफी प्रभाव छोड़ा.उनकी लेखनी का दायरा बेहद व्यापक है—संवेदनशील क्राइम रिपोर्टिंग से लेकर प्रमुख राजनीतिक हस्तियों के इंटरव्यू तक, उनकी हर खबर चर्चा में रही है. पत्रकारिता के माध्यम से कई बड़े मामलों का उद्भेदन करना उनकी विशेष पहचान है.झारखंड राज्य गठन के बाद अविनाश ने पलामू में काम करते हुये राजनीतिक से जुड़ी कई ऐसी खबर को ब्रेक किया ,जिसका असर राज्य की राजनीतिक पड़ा .प्रयोगधर्मी पत्रकार के रूप में भी इनकी पहचान है .संस्थान के प्रति समर्पण के लिए उन्हें 'बेस्ट एम्प्लोयी' जैसे पुरस्कारों से भी नवाजा जा चुका है. प्रभात खबर के संघर्ष से लेकर इसके विकास और उत्थान के सफर में अविनाश एक सक्रिय सहभागी और सहयात्री रहे हैं.

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