चाईबासा.
किरीबुरु के आदिवासी कल्याण केंद्र में आदिवासी हो समाज महासभा का दो दिवसीय वार्षिक अधिवेशन शनिवार से शुरू हुआ. कार्यक्रम का शुभारंभ आदिवासी कल्याण केंद्र के अध्यक्ष हीरालाल सुंडी व करमपदा के मुंडा राजेश मुंडा ने किया. इसके बाद प्रतिनिधि सभा के सदस्यों के बीच परिचर्चा शुरू हुई. इस मौके पर सामाजिक प्रक्रिया के बारे में विस्तार से चर्चा की गयी. अलग- अलग समूह में प्रतिनिधियों ने परंपराओं की बात की. इस मौके पर वक्ताओं ने कहा कि अपनी परंपरा को अपनी सुविधा के अनुसार न बदलें. अन्यथा आने वाले समय में अपनी परंपरा की शुद्धता के लिए समाज को संघर्ष करना पड़ेगा. मूल सामाजिक दस्तूर और परंपरा धीरे-धीरे नष्ट हो जायेगी. भाग कर शादी करने की प्रथा मान्य होगी, पर घर के आंगन में ससंग-सुनुम और आदिंग-हेबे आदेर की प्रक्रिया को पूर्ण करना होगा.गोत्र के कुर्सीनामा को दिया जाता है मारंग बोंगा के रूप में सम्मान
महासभा के अध्यक्ष मुकेश बिरुवा ने बिरुवा किली के मारंग बोंगा के बारे बताया की बिरुवा किली के लोग अभी तक 84 गांव में रहते हैं. अंतरजातीय विवाह को हो समाज में मान्यता नहीं मिलेगी. रिंग सेरेमनी भी आदिवासी हो समाज के शादी-विवाह में विधान नहीं है. इसीलिए ऐसे आयोजन से ””””””””हो”””””””” समाज के लोग बचें. इस मौके पर सोमा कोड़ा, चैतन्य कुंकल, बामिया बारी, छोटेलाल तामसोय, माधव चंद्र कोड़ा, रोयाराम चंपिया, गोपी लागुरी, रमेश लागुरी, बलभद्र बिरुली, श्याम बिरुवा, अमर बिरुवा, जयराम पाट पिंगुवा, भूषण लागुरी, पुतकर लागुरी, अमरसिंह सुंडी, नीलिमा पुरती, गीता लागुरी, पद्मिनी लागुरी आदि मौजूद थे.डिस्क्लेमर: यह प्रभात खबर समाचार पत्र की ऑटोमेटेड न्यूज फीड है. इसे प्रभात खबर डॉट कॉम की टीम ने संपादित नहीं किया है
