Netaji Jayanti 2026: रांची के लालपुर के इस घर में आज भी जिंदा हैं नेताजी की यादें, फणिंद्र आयकत साथ थे खड़े

Netaji Jayanti 2026: रांची के लालपुर के आयकत परिवार का घर आज भी नेताजी सुभाष चंद्र बोस की हिस्टोरिकल मेमोरीज को संजोए हुए है. साल 1940 में नेताजी के प्रवास से जुड़ा यह घर आजादी की लड़ाई का लाइव प्रूफ है. फणिंद्र नाथ आयकत ने अंग्रेजों की नौकरी छोड़कर नेताजी का साथ दिया और आजाद हिंद फौज के लिए बड़ा दान भी किया. रांची से जुड़े कई हिस्टोरिकल प्लेस और घटनाएं आज भी नेताजी की विरासत को जिंदा रखे हुए हैं. नेताजी से जुड़ी पूरी खबर नीचे पढ़ें.

लालपुर में आयकत परिवार का वह घर, जहां पर 1940 में नेताजी सुभाष चंद्र बोस ठहरे थे. फोटो: प्रभात खबर

Netaji Jayanti 2026: आज 23 जनवरी 2026 है और आजादी की लड़ाई के महानायक नेताजी सुभाष चंद्र बोस का जन्मदिन भी है. नेताजी सुभाष चंद्र बोस से जुड़ी मेमारीज आज भी झारखंड की राजधानी रांची में पूरी श्रद्धा और सम्मान के साथ संजोकर रखी गई हैं. यह हिस्टोरिकल हेरिटेज रांची के लालपुर में आयकत परिवार के घर में आज भी जीवंत रूप में मौजूद है. यही वह स्थान है, जहां नेताजी वर्ष 1940 में रांची आने के बाद ठहरे थे. आज आयकत परिवार की थर्ड जेनरेशन के विष्णु आयकत उन हिस्टोरिकल पीरियड से जुड़े सबूतों को सहेज कर रखे हुए हैं, जो सीधे-सीधे भारत की आजादी की लड़ाई से जुड़े हैं.

आयकत परिवार का घर बना आजादी की लड़ाई का म्यूजियम

लालपुर का यह घर केवल एक घर नहीं है, बल्कि आजादी की लड़ाई की लाइव स्टोरी है. घर का वही बरामदा आज भी मौजूद है, जहां नेताजी घंटों बैठकर अधिवेशन और आंदोलन की रणनीतियों की तैयारी करते थे. जिस कुर्सी पर बैठकर वे डिस्कशन किया करते थे, उसे भी आज तक सुरक्षित रखा गया है. विष्णु आयकत बताते हैं कि बरामदे और उस हिस्टोरिकल कुर्सी की रोजाना सफाई की जाती है, ताकि इन मेमोरीज की गरिमा बनी रहे और आने वाली जेनरेशन भी उस दौर को महसूस कर सकें. उनका कहना है कि जब भी वे उस बरामदे में खड़े होते हैं, तो ऐसा लगता है मानो हिस्ट्री आज भी वहां सांस ले रहा हो.

दिसंबर 1940 में चार दिन रांची में ठहरे थे नेताजी

विष्णु आयकत बताते हैं कि नेताजी दिसंबर 1940 में एक अधिवेशन में भाग लेने के लिए रांची पहुंचे थे. उस दौरान वे करीब चार दिनों तक आयकत परिवार के इसी घर में ठहरे थे. यही वह समय था, जब देश आजादी की लड़ाई के निर्णायक मोड़ की ओर बढ़ रहा था. नेताजी ने रांची रहने के दौरान कई इंपॉर्टेंट मीटिंग्स और डिबेट में हिस्सा लिया. हिस्टोरिकल डॉक्यूमेंट्स और फैमिली मेमोरीज के अनुसार, नेताजी दो बार रांची आए थे. पहली बार दिसंबर 1940 में और दूसरी बार मार्च 1941 को रांची आए थे. इस दौरान रांची को फ्रीडम मूवमेंट के मैप पर एक इम्पॉर्टेंट स्पेस दिलाया.

आजाद हिंद फौज के लिए 40 हजार का दान

आयकत परिवार की देशभक्ति केवल आश्रय तक सीमित नहीं थी. विष्णु आयकत बताते हैं कि उनके दादा फणिंद्र नाथ आयकत ने आजाद हिंद फौज के लिए 40 हजार रुपये का दान दिया था. उस दौर में यह रकम बेहद बड़ी मानी जाती थी.यह दान केवल आर्थिक सहयोग नहीं, बल्कि ब्रिटिश सत्ता के खिलाफ खुला समर्थन था. उस समय आयकत परिवार के बड़े पिताजी स्वर्गीय मुरलीमनोहर बोस और स्वर्गीय यदुगोपाल मुखर्जी भी नेताजी की टीम का हिस्सा थे. यह पूरा परिवार उस दौर में आजादी की लड़ाई की एक्टिविटी में सक्रिय रूप से जुड़ा हुआ था.

नेताजी के साथ खड़े हुए फणिंद्र आयकत

फणिंद्र नाथ आयकत कोलकाता के बड़े कॉन्ट्रैक्टर थे. अंग्रेजों ने उन्हें रांची बुलाकर गवर्नर हाउस से जुड़ा काम सौंपा था. यह एक प्रतिष्ठित और आर्थिक रूप से सुरक्षित पद था. लेकिन हिस्ट्री ने उस वक्त करवट ली, जब नेताजी आयकत परिवार के घर पर ठहरे. अंग्रेज अफसरों ने फणिंद्र आयकत से पूछताछ की कि उन्होंने सुभाष चंद्र बोस को अपने घर में क्यों ठहराया? फणिंद्र आयकत ने साफ शब्दों में कहा कि नेताजी उनके परिचित हैं. बातचीत के दौरान ही उन्होंने अंग्रेजों का काम छोड़ दिया और बिना किसी पेमेंट लिये घर लौट आए. यह फैसला उनके लिए आर्थिक नुकसान का था, लेकिन देशभक्ति उनके लिए सर्वोपरि थी.

डॉ पीएन चटर्जी खुद कार चलाकर नेताजी को लाए थे रांची

आजादी की लड़ाई से जुड़ा एक और रोचक और इम्पॉटेंट स्टोरी यह है कि स्वर्गीय यदुगोपाल मुखर्जी ने अपनी कार नेताजी सुभाष चंद्र बोस को मुहैया कराई थी. इस कार को डॉ पीएन चटर्जी खुद चलाकर खूंटी के रास्ते रांची लेकर आए थे. उस कार का नंबर बीआरएन-70 था. यह हिस्टोरिकल कार आज भी चालू हालत में है. यह गाड़ी आज भी उस दौर की साहसिक यात्राओं और गुप्त गतिविधियों की कहानी सुनाती है, जब हर सफर आजादी की दिशा में एक जोखिम भरा कदम होता था.

आजाद हिंद फौज में मेजर थे रांची के डॉ बीरेंद्र नाथ रॉय

नेताजी से जुड़ी रांची की स्टोरी केवल आश्रय और सहयोग तक सीमित नहीं रही. रांची के डॉ बीरेंद्र नाथ रॉय आजाद हिंद फौज में मेजर के रूप में काम करते थे. उनका जन्म 16 दिसंबर 1915 को हुआ था. वे साल 1943 से 1945 तक आजाद हिंद फौज के मेडिकल विंग में डॉक्टर रहे. डॉ रॉय 26 साल की उम्र में ब्रिटिश इंडियन आर्मी में शामिल हुए थे और जनवरी 1941 में सिंगापुर पहुंचे. वहां 15 फरवरी 1942 तक वे बेस अस्पताल में मेडिकल अफसर के रूप में काम करते रहे. 1943 में रास बिहारी बोस और नेताजी के नेतृत्व में जब इंडियन नेशनल आर्मी का गठन हुआ, तो डॉ बीरेंद्र नाथ रॉय उसमें एक डॉक्टर के रूप में शामिल हो गए. यह रांची के लिए गर्व का एक हिस्टोरिकल चैप्टर है.

यूनियन क्लब में 8.5 फीट ऊंची नेताजी की मूर्ति

रांची के यूनियन क्लब में नेताजी सुभाष चंद्र बोस की 8.5 फीट ऊंची मूर्ति स्थापित की गई है. इस मूर्ति का निर्माण मूर्तिकार अमिताभ मुखर्जी ने किया है. मूर्ति की लागत करीब 3.5 लाख रुपये है और इसे कल्याणी से बनवाकर रांची लाया गया. फाइबर मटेरियल से बनी यह मूर्ति युवाओं को नेताजी के साहस और विचारों की याद दिलाती है. क्लब के सचिव श्वेतांक सेन के अनुसार नेताजी जयंती पर विशेष कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं, जिनमें पूजा, बैंड प्रस्तुति, शंखध्वनि और सांस्कृतिक आयोजन शामिल होते हैं.

कांटाटोली में है नेताजी नगर

रांची के कांटाटोली इलाके में नेताजी नगर नाम से एक कॉलोनी बसी है, जिसे साल 1958 में नेताजी को समर्पित किया गया था. यहां 500 से अधिक परिवार रहते हैं, जिनमें बड़ी संख्या बंगाली परिवारों की है. नेताजी की मूर्ति यहां 20 सालों से अधिक समय से स्थापित है. नेताजी जयंती पर यहां झंडोत्तोलन, बच्चों के सांस्कृतिक कार्यक्रम और क्लब उद्घाटन जैसे आयोजन किए जाते हैं, जिससे न्यू जेनरेशन को हिस्ट्री से जोड़े रखने का प्रयास होता है.

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रांची में आज भी सांस लेता है नेताजी का इतिहास

लालपुर का आयकत परिवार का घर, यूनियन क्लब की मूर्ति, नेताजी नगर, डॉ बीरेंद्र नाथ रॉय की स्टोरी और नेताजी पार्क इस बात के सबूत हैं कि रांची केवल एक शहर नहीं, बल्कि आजादी की लड़ाई की एक लाइव हेरिटेज है. यहां नेताजी की यादें केवल हिस्टी नहीं, बल्कि आज भी लोगों की चेतना में जिंदा हैं.

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By KumarVishwat Sen

कुमार विश्वत सेन प्रभात खबर डिजिटल में डेप्यूटी चीफ कंटेंट राइटर हैं. इनके पास हिंदी पत्रकारिता का 25 साल से अधिक का अनुभव है. इन्होंने 21वीं सदी की शुरुआत से ही हिंदी पत्रकारिता में कदम रखा. दिल्ली विश्वविद्यालय से हिंदी पत्रकारिता का कोर्स करने के बाद दिल्ली के दैनिक हिंदुस्तान से रिपोर्टिंग की शुरुआत की. इसके बाद वे दिल्ली में लगातार 12 सालों तक रिपोर्टिंग की. इस दौरान उन्होंने दिल्ली से प्रकाशित दैनिक हिंदुस्तान दैनिक जागरण, देशबंधु जैसे प्रतिष्ठित अखबारों के साथ कई साप्ताहिक अखबारों के लिए भी रिपोर्टिंग की. 2013 में वे प्रभात खबर आए. तब से वे प्रिंट मीडिया के साथ फिलहाल पिछले 10 सालों से प्रभात खबर डिजिटल में अपनी सेवाएं दे रहे हैं. इन्होंने अपने करियर के शुरुआती दिनों में ही राजस्थान में होने वाली हिंदी पत्रकारिता के 300 साल के इतिहास पर एक पुस्तक 'नित नए आयाम की खोज: राजस्थानी पत्रकारिता' की रचना की. इनकी कई कहानियां देश के विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं.

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