संघर्ष से जननेता बने कॉमरेड महेंद्र सिंह, दामोदर नदी पार करके पहुंचते थे जनता के बीच, ऐसे शुरू हुई राजनीतिक यात्रा
Comrade Mahendra Singh: झारखंड की राजनीति के इतिहास में कॉमरेड महेंद्र सिंह का जीवन आज भी मिसाल है. इस जननेता ने चलकरी गांव में रहकर आईपीएफ और भाकपा (माले) संगठन को मजबूती दी और शोषण, विस्थापन के खिलाफ लड़ाई लड़ी.
Comrade Mahendra Singh, राकेश वर्मा, (बोकारो, बेरमो): झारखंड के इतिहास में कॉमरेड महेंद्र सिंह का नाम एक ऐसे जननेता के रूप में दर्ज है, जिन्होंने सत्ता और सुविधा के बजाय संघर्ष, सादगी और जनता के साथ खड़े रहने को अपनी राजनीति का आधार बनाया. विधायक बनने के बाद भी उनके जीवन-व्यवहार में कोई बदलाव नहीं आया था. वे आजीवन एक सामान्य कार्यकर्ता की तरह जनता के बीच रहे.
पैदन नदी पार करके पहुंचते थे गांव
बेरमो स्थित चार नंबर मोड़ से उतरकर जरीडीह बाजार होते हुए दामोदर नदी पार कर पैदल चलकरी गांव पहुंचना उनकी दिनचर्या का हिस्सा था. यह कोई प्रतीकात्मक कदम नहीं, बल्कि उनकी राजनीति की आत्मा थी. 1980 के दशक में आईपीएफ के बिहार राज्य सचिव के रूप में कॉमरेड महेंद्र सिंह ने चलकरी को जनसंघर्षों और संगठन विस्तार का एक मजबूत केंद्र बनाया. वे बस या ट्रेकर से क्षेत्र में आते, चार नंबर मोड़ पर उतरते और फिर पैदल दामोदर नदी पार कर गांवों तक पहुंचते थे.
चलकरी गांव को केंद्र बनाकर माले को दी मजबूती
1990 में बगोदर से विधायक निर्वाचित होने के बाद भी उनकी यही दिनचर्या बनी रही. सत्ता की हैसियत उनके कदमों की चाल नहीं बदल सकी. चलकरी गांव को केंद्र बनाकर उन्होंने आईपीएफ और भाकपा (माले) संगठन को पूरे बेरमो-बगोदर क्षेत्र में मजबूती प्रदान की.
जेल से शुरू हुई संगठित राजनीतिक यात्रा
1985 में गिरिडीह जेल में बंद रहने के दौरान बेरमो के विस्थापित नेता काशीनाथ केवट से कॉमरेड महेंद्र सिंह की पहली मुलाकात हुई. उस समय काशीनाथ केवट छात्र नेता और झामुमो के केंद्रीय सदस्य थे. जेल में हुई लंबी राजनीतिक चर्चाओं ने गहरा प्रभाव छोड़ा. रिहाई के बाद महेंद्र सिंह चलकरी पहुंचे और यहीं से एक संगठित राजनीतिक यात्रा की शुरुआत हुई. काशीनाथ केवट आईपीएफ से जुड़े और क्षेत्र में जनसंघर्षों की ठोस नींव पड़ी. इसी क्रम में छात्र युवा संघर्ष वाहिनी के साथ मिलकर स्व. सिंह की रिहाई को लेकर जोरदार आंदोलन चला. वर्ष 1987-88 में बेरमो के संडे बाजार में जनसंस्कृति मंच का गठन किया गया, वहीं ग्रामीण क्षेत्रों के लिए जनवादी मजदूर किसान संघ की स्थापना हुई.
प्रेस पाबंदी के खिलाफ लोकतांत्रिक प्रतिरोध
जब बिहार में तत्कालीन जगन्नाथ मिश्र सरकार ने प्रेस पाबंदी विधेयक लाया, तब कॉमरेड महेंद्र सिंह के निर्देश पर सुबोध सिंह पवार के नेतृत्व में बेरमो अनुमंडल के पत्रकारों ने जनसंस्कृति मंच के बैनर तले तेनुघाट में विरोध प्रदर्शन किया. इस आंदोलन को स्वयं महेंद्र सिंह ने संबोधित किया. इसे क्षेत्र में लोकतांत्रिक प्रतिरोध की एक अहम घटना के रूप में याद किया जाता है.
झुमरा मार्च और संघर्ष का निर्णायक मोड़
गोमिया प्रखंड के झुमरा पहाड़ क्षेत्र के ग्रामीणों के अनुरोध पर महेंद्र सिंह ने बहुचर्चित ‘झुमरा मार्च’ का नेतृत्व किया. इस दौरान विरोधियों द्वारा उन पर गोलियां चलाई गईं, जिसमें कार्यकर्ता अशोक महतो की मृत्यु हो गई. यह घटना क्षेत्रीय संघर्ष के इतिहास में एक दुखद लेकिन निर्णायक मोड़ साबित हुई.
बबली हत्याकांड और लेवाटांड गोलीकांड में निर्णायक भूमिका
4 नवंबर 1999 को बबली हत्याकांड के खिलाफ तुपकाडीह में हुए आंदोलन के दौरान तत्कालीन अनुमंडलाधिकारी के आदेश पर हुई गोलीबारी में दो लोगों की मौत हो गई और कई लोग घायल हुए. भय और आतंक के माहौल में कॉमरेड महेंद्र सिंह मौके पर पहुंचे और साफ कहा कि यह मामला किसी राजनीतिक दल का नहीं, बल्कि जनता की अस्मिता और सुरक्षा से जुड़ा प्रश्न है. उन्होंने सभी राजनीतिक दलों से एकजुट होकर न्याय के लिए संघर्ष करने का आह्वान किया. फरवरी 2001 में बोकारो के लेवाटांड गोलीकांड के खिलाफ उन्होंने सदन और सड़क दोनों जगहों पर आंदोलन किया. दोषियों को सजा दिलाने की मांग को लेकर उन्होंने आमरण अनशन शुरू किया. छह दिनों तक चले अनशन के बाद विधानसभा अध्यक्ष द्वारा जांच और कार्रवाई का लिखित आश्वासन मिलने पर ही उन्होंने अनशन तोड़ा.
शहादतों को स्मृति में बदलने वाला नेतृत्व
बेरमो क्षेत्र की संघर्ष यात्रा में कई साथियों ने शहादत दी. 1990 में आईपीएफ के ‘दाम बांधो, काम दो’ नारे के साथ दिल्ली रैली में शामिल होने गये मोहर, तिलक और रामदास रविदास शहीद हो गये. इन तीनों साथियों के नाम का शीलापट्ट महेंद्र सिंह ने पटना में बनवाया और उसे कंधे पर लेकर पटना से जारंगडीह स्टेशन होते हुए संडे बाजार पहुंचे. इसके अलावा मेजर नागेंद्र प्रसाद की हत्या, सुखदेव महतो, चैता तूरी सहित अनेक साथियों का बलिदान आंदोलन की राह में दर्ज हुआ. हर कठिन क्षण में महेंद्र सिंह चट्टान की तरह खड़े रहे और संघर्ष की मशाल बुझने नहीं दी.
जब साइलेंसर कंधे पर रखकर पहुंचे सभा स्थल
भाकपा (माले) और विस्थापित नेता विकास कुमार सिंह बताते हैं कि गांधीनगर में एक बार आईपीएफ की बड़ी सभा आयोजित की गई थी. लोग महेंद्र सिंह को देखने और सुनने को उत्सुक थे. इसी दौरान एक साधारण कपड़ों में व्यक्ति कंधे पर मोटरसाइकिल का साइलेंसर लेकर पहुंचा. बाद में पता चला कि वही कॉमरेड महेंद्र सिंह हैं. रास्ते में मोटरसाइकिल का साइलेंसर टूटकर गिर गया था, जिसे उन्होंने जंगल के पत्तों की मदद से अपने कंधे पर रख लिया.
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