दबी हुई ऊर्जा का सांस्कृतिक विस्तार है होली, पढ़ें परिचय दास का आलेख

पीली सरसों की गंध और गुलाल की महक जब हवा में मिलती है, तो एक बहु-इंद्रिय संसार बनता है-दृश्य, गंध, स्पर्श और ध्वनि का संयुक्त अनुभव. होली मनुष्य को यह स्मरण कराती है कि वह केवल विचारशील प्राणी नहीं, संवेदनशील भी है.

होली केवल लोकानुष्ठान नहीं, यह मनुष्य की सामूहिक आत्मा का खुला पाठ है-रंगों में लिखा हुआ, हंसी में उच्चरित और वसंत की हवा में बहता हुआ. यही अनुभूति सामान्य जन भी अपने सहज शब्दों में व्यक्त करता है. पीली सरसों का अनंत फैलाव केवल कृषि-दृश्य नहीं, वह प्रकृति और मनुष्य के सहअस्तित्व की दृश्य कविता है. धरती यहां स्वयं रंग का पाठ पढ़ाती है, कि जीवन अपनी पूर्णता में बहुरंगी है. वसंत ऋतु की कोमलता, आम्र मंजरियों की गंध और हवा की मृदुल थिरकन मिलकर एक ऐसा वातावरण रचती है, जिसमें ऋतु परिवर्तन उत्सव में रूपांतरित हो जाता है. किसी सभ्यता की परिपक्वता इसी से आंकी जा सकती है कि वह प्रकृति के इस रूपांतरण को कितनी सृजनात्मकता से सामाजिक अनुभव में बदलती है. होली सामाजिक संरचना का अद्भुत क्षण है, जहां स्थापित पदानुक्रम कुछ समय के लिए शिथिल पड़ जाते हैं. जिनके बीच सामान्य दिनों में दूरी रहती है, वे इस दिन एक-दूसरे के कपोलों पर अबीर लगा रहे होते हैं. यह सामाजिक भूमिका परिवर्तन का उत्सव है-एक ऐसा अवसर जब व्यक्ति अपनी कठोर परिभाषाओं से बाहर निकलकर सामूहिक ‘हम’ में विलीन होता है.

रंग यहां सजावट नहीं, पहचान की सीमाओं को धुंधला करने वाली प्रक्रिया है. होली दबी हुई ऊर्जा का सांस्कृतिक विसर्जन भी है. मनुष्य अपने भीतर अनेक इच्छाएं, संकोच और दबाव संचित करता है. इस दिन वह उन्हें रंग और हंसी में मुक्त करता है. चौतार पर गूंजते फगुआ के गीत, ढोलक की थाप पर थिरकते पांव, स्त्रियों के स्वर में छिपा परिहास-ये सब उस सामूहिक अवचेतन के झरोखे हैं, जो सामान्य दिनों में मौन रहता है. यहां वह स्वीकृत और सौंदर्यपूर्ण रूप में अभिव्यक्त होता है. यह उत्सव समय की रैखिकता को तोड़ देता है. दैनिक जीवन की क्रमबद्ध गति से अलग एक ‘विशेष काल’ निर्मित होता है. इस काल में नियम ढीले पड़ते हैं, भाषा मुक्त होती है, शरीर लय में खुलकर नाचता है. यह अस्थायी स्वतंत्रता अव्यवस्था नहीं रचती, बल्कि समाज को अपनी कठोरताओं से राहत देती है. हर सुदृढ़ सामाजिक संरचना को ऐसे अवसरों की आवश्यकता होती है, जहां व्यवस्था स्वयं को थोड़ी देर के लिए विराम दे सके.

रंगों के इस उत्सव में सौंदर्य स्थिर रूप में नहीं, प्रक्रिया में है. रंग एक-दूसरे में घुलते हैं, चेहरे बदलते हैं, आकृतियां धुंधली होती हैं. परिवर्तनशीलता ही यहां सौंदर्य है. शुद्ध और पृथक रूप की अपेक्षा मिश्रण अधिक जीवंत प्रतीत होता है. लाल का नीले में, हरे का पीले में विलय यह संकेत देता है कि मनुष्य संबंधों का समुच्चय है, अलगाव का नहीं. होली शक्ति संबंधों का क्षणिक पुनर्संतुलन भी रचती है. फगुआ के गीतों में व्यंग्य की महीन धार व्यवस्था पर हल्की चोट करती है. स्त्रियां गीतों में पुरुषों की चुटकी लेती हैं, युवा बुजुर्गों पर रंग डालते हैं. यह विनाशकारी विद्रोह नहीं, बल्कि सौम्य पुनर्संतुलन है. समाज अपनी ही संरचना पर मुस्कराता है और इसी मुस्कान में लचीलापन पाता है. होलिका दहन की अग्नि इस उत्सव का सांकेतिक केंद्र है. लोग लकड़ियां डालते हैं और लपटें आकाश की ओर उठती हैं. यह दृश्य स्मरण कराता है कि हर संस्कृति अपने भीतर के अंधकार को दृश्य बनाकर ही उससे मुक्त होती है. राख में बदलती लकड़ियां संकेत देती हैं कि जड़ता अनंत नहीं, रूपांतरण संभव है. पीली सरसों की गंध और गुलाल की महक जब हवा में मिलती है, तो एक बहु-इंद्रिय संसार बनता है-दृश्य, गंध, स्पर्श और ध्वनि का संयुक्त अनुभव. यह बहुलता जीवन की बहुलता का रूपक है. होली मनुष्य को यह स्मरण कराती है कि वह केवल विचारशील प्राणी नहीं, संवेदनशील भी है.

संध्या के समय जब रंग धुल जाते हैं और लोग शांत बैठते हैं, तब उत्सव का वास्तविक प्रभाव उसकी पश्चात शांति में दिखाई देता है. रंग भले बह गये हों, पर एक कोमलता मन में शेष रहती है. सामाजिक दूरी कुछ कम हुई होती है, हंसी की स्मृति बनी रहती है. यही अवशेष उत्सव का स्थायी अर्थ है. कहा जा सकता है कि यह उत्सव मनुष्य की सामूहिक कल्पना का दृश्य रूप है, जहां प्रकृति और संस्कृति, शरीर और समाज, खेल और दर्शन एक साथ उपस्थित होते हैं. वसंत की हरीतिमा, सरसों का स्वर्ण, चौतार की लय और फगुआ का रस मिलकर एक ऐसा क्षण रचते हैं, जहां जीवन स्वयं को रंग में पहचानता है. इस उत्सव का लालित्य केवल बाहरी रंगों में नहीं, उस अदृश्य प्रक्रिया में है, जो मनुष्य को अपने कठोर रूप से निकालकर एक कोमल, सामूहिक, बहुरंगी अस्तित्व में प्रवेश कराती है. होली केवल देखी नहीं जाती, उसमें प्रवेश करना पड़ता है. दर्शक बने रहना संभव नहीं, रंग अंततः दर्शक को भी सहभागी बना लेते हैं. यही सहभागिता उसकी सच्ची व्याख्या है. होली मनुष्य की उस गहरी आकांक्षा का सार्वजनिक रूप है, जिसमें वह सीमाओं से परे जाना चाहता है-विनाश करके नहीं, खेलकर, तोड़कर नहीं, रंगकर. यहां विरोध भी परिहास में बदल जाता है और दूरी भी स्पर्श में. इस प्रकार होली किसी एक भूगोल का उत्सव नहीं, मनुष्य की सार्वभौमिक चेतना का रूपक है, जहां जीवन, अपनी जटिलताओं के बीच, रंग का एक क्षण खोज लेता है और उसी क्षण में स्वयं को पुनः रच लेता है. (ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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