अमेरिकी राजदूत गोर कुछ ज्यादा ही सक्रिय हैं, पढ़ें प्रभु चावला का आलेख

नयी दिल्ली में गोर का अति सक्रिय आधिपत्य एक चेतावनी भरी कथा के रूप में काम करना चाहिए. गोर भारत-अमेरिका व्यापार सौदे को आगे बढ़ाने, रूसी तेल खरीद से जुड़े टैरिफ समायोजन पर बातचीत करने और सेमीकंडक्टर तथा एआइ आपूर्ति शृंखलाओं के लिए 'पैक्स सिलिका डिक्लेरेशन' जैसी पहलों का समर्थन करने में सहायक रहे हैं. अपने उद्घाटन दूतावास संबोधन और बाद की टिप्पणियों में उन्होंने खुद को एक अपरिहार्य सेतु निर्माता के रूप में पेश किया है. राजनयिकों को अदृश्य प्रेरक बने रहना चाहिए, सलाहकार के रूप में कार्य नहीं करना चाहिए.

हाल ही में, वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने अपने एक्स हैंडल पर एक महत्वपूर्ण तस्वीर साझा की. इसमें मंत्री के साथ विवादास्पद अमेरिकी वाणिज्य सचिव हॉवर्ड लटनिक और राजदूत सर्जियो गोर आत्मीय मुद्रा में दिखाई दे रहे थे. यह छवि शिष्टाचार के बजाय भाईचारे का संदेश दे रही थी. अतीत में राजकीय यात्राओं के दौरान ऐसी तस्वीरें सार्वजनिक मंचों पर शायद ही कभी साझा की जाती थीं. अमेरिकी राजदूत गोर ने वह अंतर पैदा कर दिया है. राजदूत पारंपरिक रूप से वे अदृश्य प्रेरक होते हैं, जो छायादार गलियारों में फुसफुसाकर परामर्श देते हैं, न कि आक्रामक स्वामी की तरह सुर्खियों में छाये रहते हैं. फिर भी, नयी दिल्ली के व्यस्त राजनयिक मंच पर, भारत में अमेरिका के नये राजदूत दूत गोर ने इस बुनियादी सिद्धांत को ऐसी भव्यता के साथ तोड़ा है, जो ढिठाई की सीमा को छूती है.

मात्र 38 वर्ष की आयु में, हालिया स्मृति में इस महत्वपूर्ण पद पर तैनात होने वाले सबसे कम उम्र के राजदूत, एक बवंडर की तरह आये हैं. उन्होंने 14 जनवरी को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को अपना परिचय पत्र सौंपने से बहुत पहले ही अपना संचालन शुरू कर दिया था. उनका अति सक्रिय कार्यकाल अमेरिकी अतिरेक का सुझाव देता है. उन्होंने रक्षा प्रतिष्ठानों, राज्यों की राजधानियों, कॉरपोरेट बोर्डरूम और राजनीतिक सैलूनों के दौरे पहले ही पूरे कर लिये हैं. उन्होंने अपने आवास पर भव्य दावतों की मेजबानी की है. भारतीय मंत्री और सांसद न केवल उनसे मिलते हैं, बल्कि इन मुलाकातों को प्रतिष्ठा के प्रतीक के रूप में प्रचारित करते हैं. कोई उन्हें किसी विदेशी राष्ट्रपति का नामित व्यक्ति नहीं, बल्कि एक वास्तविक ‘अमेरिकी वायसराय’ समझने की भूल कर सकता है, जिसकी सत्ता के हर गलियारे तक बेरोकटोक पहुंच है. वह कोई साधारण राजनयिक नहीं हैं.

सोवियत मूल के राजनीतिक संचालक और ट्रंप के वफादार गोर कभी व्हाइट हाउस प्रेसिडेंशियल पर्सनेल ऑफिस के प्रमुख थे. उनका नामांकन विवादों के घेरे में था : एलन मस्क ने एक बार उन्हें ‘सांप’ कहा था, क्योंकि उन पर आरोप था कि उन्होंने हजारों अन्य लोगों की जांच करते समय मस्क के व्यक्तिगत सुरक्षा मंजूरी कागजी कार्रवाई में जानबूझकर देरी की थी. पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जॉन बोल्टन ने उन्हें भारत-विशिष्ट राजनयिक अनुभव की कमी का हवाला देते हुए अयोग्य करार दिया था. आलोचकों ने उन्हें एक ऐसे ‘इनसाइडर ऑपरेटर’ के रूप में चित्रित किया, जो भाषा की बारीकियों के बजाय वफादारी परीक्षणों में माहिर है. सीनेट की सुनवाई में गोर ने गरजते हुए कहा था कि ट्रंप ने यह बिल्कुल ‘स्पष्ट कर’ दिया है कि भारत को रूसी तेल खरीदना बंद करना होगा. वाशिंगटन और उसके बाहर उनके विरोधियों ने उन्हें ट्रंप की दुनिया में सबसे मुखर भारत विरोधी आवाजों में से एक बताया था. इसकी तुलना उनके साथियों के शालीन संयम से करें. यूरोप, जापान, चीन और रूस के राजदूत दिल्ली में खुद को आधिकारिक सम्मेलनों, संक्षिप्त विज्ञप्तियों और औपचारिक हाथ मिलाने तक सीमित रखते हैं. गोर के तत्काल पूर्ववर्ती एरिक गार्सेटी ने भी ऊर्जावान होने के बावजूद नपा-तुला व्यवहार बनाये रखा था.

पिछले महीने गोर अमेरिकी हिंद-प्रशांत कमान के कमांडर एडमिरल सैमुअल जे पापारो के साथ भारतीय सेना के पश्चिमी कमान मुख्यालय के हाई प्रोफाइल दौरे के लिए चंडीगढ़ पहुंचे. वहां उन्हें परिचालन तत्परता, पश्चिमी मोर्चे पर रणनीतिक गतिशीलता और यहां तक कि ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के बारे में जानकारी दी गयी-ये वे विवरण हैं, जो आमतौर पर संप्रभु राष्ट्र की अपनी नजरों के लिए आरक्षित होते हैं. भारतीय विपक्षी दल आक्रोश से भड़क उठे. फिर भी गोर ने एक्स पर गर्व से लिखा : ‘अभी चंडीगढ़ उतरा हूं. पश्चिमी कमान के दौरे के लिए उत्सुक हूं.’ भारत के राजनीतिक, सैन्य और व्यापारिक अभिजात वर्ग-फोर स्टार जनरलों से लेकर बैकबेंच सांसदों तक, औद्योगिक दिग्गजों से लेकर राज्य स्तर के नौकरशाहों तक-के साथ इस निरंतर मेलजोल ने गोर के अंतर्निहित उद्देश्यों पर परेशान करने वाले सवाल खड़े कर दिये हैं.

विपक्षी दलों ने, जो पहले से ही बढ़ते अमेरिकी असर के प्रति सतर्क हैं, इस तमाशे को नयी दिल्ली के नीतिगत प्रतिष्ठान पर वाशिंगटन के अनुचित प्रभाव के प्रमाण के रूप में लिया है. जिसे गोर पुल बनाना कहते हैं, उनके आलोचक उसे प्रभाव का सौदा और भारत के निर्णय लेने वाले तंत्र में एक सुनियोजित पैठ मानते हैं. गोर भारत-अमेरिका व्यापार सौदे को आगे बढ़ाने, रूसी तेल खरीद से जुड़े टैरिफ समायोजन पर बातचीत करने और सेमीकंडक्टर तथा एआइ आपूर्ति शृंखलाओं के लिए ‘पैक्स सिलिका डिक्लेरेशन’ जैसी पहलों का समर्थन करने में सहायक रहे हैं. अपने उद्घाटन दूतावास संबोधन और बाद की टिप्पणियों में उन्होंने खुद को एक अपरिहार्य सेतु निर्माता के रूप में पेश किया है.

फिर भी, इस सौहार्द के नीचे एक चिंताजनक विषमता छिपी है. आलोचकों ने उनकी इस अति संलिप्तता के पैटर्न पर चिंता जतानी शुरू कर दी है. रक्षा समझौतों के बीच पश्चिमी कमान की गोर की यात्रा को एक बड़े सिंड्रोम के प्रतीक के रूप में कोसा गया है-जहां अमेरिकी दूत सलाह देना बंद कर देते हैं और निर्देश देना शुरू कर देते हैं. एक विदेशी राजदूत, जिसे अभी मुश्किल से मान्यता मिली है, एक फोर स्टार अमेरिकी एडमिरल के साथ संवेदनशील सैन्य चर्चाओं में शामिल है. यह कूटनीति नहीं है, शालीनता के लिबास में प्रभुत्व है. उनके पूर्ववर्तियों ने खुद को प्रोटोकॉल तक सीमित रखा था. गोर इससे परे जाते हैं. पहुंच की इस संस्कृति को विकसित करके, संभ्रांत लोगों को अपने आवास पर आमंत्रित करके, वायरल तस्वीरों के लिए पोज देकर और खुद को भारतीय सत्ता संरचनाओं की नसों में डालकर, गोर उस पुराने संदेह को खतरनाक बल देते हैं कि भारत अमेरिकी धुन पर नाचता है.

नयी दिल्ली में गोर का यह अति सक्रिय आधिपत्य एक चेतावनी भरी कथा के रूप में काम करना चाहिए. राजनयिकों को अदृश्य प्रेरक बने रहना चाहिए, सलाहकार के रूप में कार्य नहीं करना चाहिए. भारत, जो प्राचीन भव्यता और आधुनिक पुनरुत्थान की सभ्यता है, ऐसे दूतों का हकदार है, जो स्वायत्तता को नष्ट किये बिना गठबंधन को ऊपर उठायें. इससे कम कुछ भी कूटनीति नहीं है, यह दूसरे नाम से प्रभुत्व है. यह उस स्वतंत्रता का अपमान है, जिसकी भारत इतनी मजबूती से रक्षा करता है. (ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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