India exports : वर्तमान की चुनौतीपूर्ण वैश्विक परिस्थितियों के बावजूद भारत ने निर्यात में नया कीर्तिमान बनाया है. इंजीनियरिंग, इलेक्ट्रॉनिक्स और फार्मास्युटिकल्स जैसे प्रमुख क्षेत्रों के बेहतर प्रदर्शन के कारण भारत को यह उपलब्धि हासिल हुई है. वित्त वर्ष 2025-26 में हमारा कुल निर्यात 860 अरब डॉलर से अधिक हो गया, जो अब तक का सबसे ऊंचा स्तर है. इसमें वस्तु और सेवा क्षेत्र शामिल हैं. वहीं आयात में लगभग 6.5 प्रतिशत की वृद्धि हुई. वाणिज्य मंत्रालय द्वारा जारी अंतरिम आंकड़ों के अनुसार, वित्त वर्ष 2025-26 के दौरान वस्तुओं का कुल निर्यात लगभग 441 अरब डॉलर रहा.
भारत का यह प्रदर्शन और भी शानदार होता, यदि ईरान-अमेरिका युद्ध शुरू नहीं हुआ होता. इस युद्ध का असर हमारे निर्यात पर मार्च महीने में दिखाई दिया. उस महीने हमारे निर्यात में 7.6 प्रतिशत, यानी 59.6 अरब डॉलर की कमी आयी. अमेरिकी दबाव के कारण ईरान को भारत के निर्यात में लगातार गिरावट आती रही और यह 2018-19 के 17.03 अरब डॉलर से गिरते-गिरते महज 1.68 अरब डॉलर का रह गया है. लेकिन भारतीय निर्यातकों ने नये द्वार खोल लिये हैं. अब वे ईरान की जगह संयुक्त अरब अमीरात को निर्यात बढ़ा रहे हैं. कई अन्य देशों में भी भारत ने अपने पंख पसार दिये हैं. भारत ने पिछले दिनों ओमान, इंग्लैंड और न्यूजीलैंड से व्यापार बढ़ाने के लिए समझौते किये हैं, जिसका असर आने वाले समय में दिखाई देगा.
इंग्लैंड का बाजार बहुत बड़ा है और भारतीय निर्यातकों के लिए वहां काफी संभावनाएं हैं. भारत-यूरोपीय संघ व्यापार और आर्थिक साझेदारी समझौता (टीइपीए) भारत का पहला मुक्त व्यापार समझौता था, जिसमें निवेशकों से प्रत्यक्ष विदेशी निवेश बढ़ाने के उद्देश्य से एक समर्पित प्रतिबद्धता शामिल है. यह भारत के निर्यातकों के लिए बड़ा रास्ता खोलता है. यूरोपीय संघ के देशों को बिना शुल्क निर्यात करने से हमारे मैन्युफैक्चरिंग उद्योग को न केवल आर्थिक लाभ हो रहा है, बल्कि उनका उत्पादन भी बढ़ रहा है. इससे रोजगार भी बढ़ रहा है. इस बीच, इस्राइल, कनाडा, जीसीसी देशों, चिली और पेरू के साथ चल रही व्यापार वार्ताएं विभिन्न क्षेत्रों में उच्च मूल्य वाले व्यापार गलियारों का विस्तार करने के भारत के दृढ़ संकल्प को दर्शाती हैं. भारत लगातार नये बाजारों की खोज करता जा रहा है और उसे उसमें सफलता भी मिल रही है.
पिछले दिनों संसद में वाणिज्य एवं उद्योग राज्य मंत्री जितिन प्रसाद ने कहा था कि भारत की निर्यात रणनीति एक निर्णायक समग्र सरकारी दृष्टिकोण को दर्शाती है, जो लेन-देन संबंधी सहायता से आगे बढ़कर एक गतिशील, प्रतिस्पर्धी और भविष्य के लिए तैयार इकोसिस्टम के निर्माण पर केंद्रित है. लक्षित वित्तीय प्रोत्साहनों, प्रौद्योगिकी आधारित व्यापार सुविधा, संस्थागत सुधारों और सक्रिय बाजार पहुंच पहलों को मिलाकर, डिजिटल शासन को सुदृढ़ करने, वैश्विक पहुंच का विस्तार करने और विभिन्न क्षेत्रों में निर्यातकों की क्षमताओं को मजबूत करने पर बल दिया गया है. यह एकीकृत दृष्टिकोण भारत को न केवल एक भागीदार के रूप में, बल्कि वैश्विक व्यापार में एक विश्वसनीय, प्रौद्योगिकी संचालित साझेदार के रूप में स्थापित करता है.
मध्य-पूर्व में युद्ध के मद्देनजर भारत सरकार ने हाल ही में एक समय-सीमित ‘रिलीफ’ स्कीम अधिसूचित की है, जो निर्यात प्रोत्साहन मिशन के तहत एक उपाय है और जिसे भारतीय निर्यात ऋण गारंटी निगम (इसीजीसी) के माध्यम से कार्यान्वित किया जायेगा. इसका उद्देश्य खाड़ी और पश्चिम एशिया समुद्री गलियारे में भू-राजनीतिक व्यवधानों से उत्पन्न निर्यात जोखिमों पर ध्यान देना है. इसीजीसी निर्यात के लिए महत्वपूर्ण जोखिम निवारण सहायता प्रदान करता है और देशभर में निर्यात से जुड़े बुनियादी ढांचे का निर्माण करने वाली व्यापार अवसंरचना योजना (टीआइइएस) जैसी योजनाओं के साथ मिलकर काम करता है. भारत मुख्य रूप से परिष्कृत पेट्रोलियम उत्पाद, इंजीनियरिंग सामान, फार्मास्युटिकल्स, रत्न एवं आभूषण, ऑटोमोबाइल और इलेक्ट्रॉनिक्स सामान तथा मोबाइल फोन का बड़े पैमाने पर निर्यात करता है. इसके अतिरिक्त, भारत कृषि उत्पादों, वस्त्र, रसायन और प्लास्टिक के निर्यात में भी प्रमुख स्थान रखता है. भारत दवाओं का एक बड़ा निर्यातक देश भी है.
भारत का निर्यात भविष्य उज्ज्वल है और यदि ईरान-अमेरिका में समझौता हो जाता है, तो इसकी गति न केवल तेज होगी, बल्कि इसका असर हमारे कुल राजस्व पर भी पड़ेगा. हमें अपने आयात को भी नियंत्रित करना होगा. भारत के व्यापार घाटे का मुख्य कारण सोने का अबाध आयात है. भारत ने 2025-26 में कुल 721 टन सोने का आयात किया था. अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोने की असाधारण रूप से बढ़ी हुई कीमतों के कारण भारत पर दबाव बढ़ गया है और उसका व्यापार घाटा ऐतिहासिक रूप से बढ़ गया है. वर्ष 2025-26 में भारत का कुल वस्तु व्यापार घाटा बढ़कर 333.2 अरब डॉलर हो गया, जो निर्यात में वृद्धि की चमक को फीका कर रहा है. इसी तरह, चांदी का आयात भी हमारे व्यापार संतुलन को बिगाड़ रहा है. इन दोनों के आयात पर सरकार को नियंत्रण करना होगा. हालांकि, इस पर रोक लगाना आसान नहीं है. इसलिए इस संबंध में सोच-विचार कर कदम उठाना होगा. (ये लेखक के निजी विचार हैं.)
