India Korea Trade : हाल ही में दक्षिण कोरियाई राष्ट्रपति ली जे मायुंग के भारत दौरे से एक दिन पहले विदेश मंत्रालय ने साउथ ब्लॉक में अपनी प्रथागत पूर्व यात्रा ब्रीफिंग आयोजित की. पत्रकारों को जानकारी देते हुए सचिव ने एक असामान्य खुलासा किया : “कोरिया के साथ द्विपक्षीय व्यापार 27 अरब डॉलर के करीब है, पर यह काफी असंतुलित है. हमारा निर्यात करीब 6.5 अरब डॉलर के दायरे में है, जबकि कोरिया का निर्यात करीब 21.4 अरब डॉलर है. इसलिए दोनों देशों के बीच व्यापक आर्थिक भागीदारी समझौते (सीइपीए) को पुनर्संतुलित करने की जरूरत है.” इसे कूटनीतिक विचलन नहीं मानना चाहिए.
सरकार की ओर से उस सच्चाई का खुलासा किया गया, जिस पर 16 वर्षों से कूटनीतिक चुप्पी थी. दक्षिण कोरियाई राष्ट्रपति के सम्मान में समारोह, सहमति पत्रों और 2030 तक द्विपक्षीय व्यापार को दोगुना, यानी 54 अरब डॉलर करने के वादे को व्यापार असंतुलन की ठोस सच्चाई के बरक्स देखना चाहिए. दक्षिण कोरिया को भारतीय निर्यात 2021-22 के आठ अरब डॉलर के मुकाबले 2024-25 में गिरकर 5.82 अरब डॉलर रह गया. जबकि इसी दौरान भारत में कोरियाई निर्यात बढ़कर 21.06 अरब डॉलर हो गया.
जाहिर है, 2010 में सीइपीए लागू होने के बाद 2024-25 में भारत का व्यापार घाटा लगभग तीन गुना बढ़कर 15.2 अरब डॉलर हो गया. वर्ष 2021-22 से 2023-24 के बीच कोरिया को भारतीय निर्यात 11 फीसदी की चक्रवृद्धि वार्षिक दर से कम हुआ, जबकि कोरियाई आयात में सालाना 10 फीसदी की वृद्धि हुई. द्विपक्षीय व्यापार को दोगुना करने का लक्ष्य नया नहीं है. वर्ष 2019 में भी यही लक्ष्य रखा था. नयी बात यह है कि भारत ने स्वीकार किया है कि व्यापार असंतुलन को सुधारे बिना 50 अरब डॉलर के लक्ष्य तक पहुंचने से भारत का व्यापार घाटा और बढ़ेगा.
भारतीय क्षोभ के केंद्र में वे कोरियाई ब्लूचिप सब्सिडीयरी हैं, जिनका भारतीय परिचालन मूल्य और नकदी पैदा करने की शक्ति मूल कोरियाई कंपनियों की तुलना में बहुत अधिक है. एलजी इलेक्ट्रॉनिक्स इंडिया ने पिछले वर्ष 24,366 करोड़ रुपये का राजस्व और 2,203 करोड़ रुपये का शुद्ध लाभ दर्ज किया, जो पिछले वर्ष से 46 फीसदी अधिक है. मूल दक्षिण कोरियाई कंपनी को रॉयल्टी भुगतान 454.61 करोड़ रुपये तक पहुंच गया. पर असली सुर्खी अक्तूबर, 2025 में इसके आइपीओ के साथ आयी : लिस्टिंग के समय भारतीय सहायक कंपनी का बाजार पूंजीकरण बढ़कर करीब 13 अरब डॉलर हो गया. और उसने करीब नौ अरब डॉलर के बाजार पूंजीकरण वाली अपनी दक्षिण कोरियाई मूल कंपनी को पीछे छोड़ दिया.
वैश्विक निवेशकों की नजर में एलजी इंडिया की कुल संपत्ति उसके कोरियाई मुख्यालय से अधिक हो गयी. ऐसा विशुद्ध रूप से उदार नीतिगत माहौल के कारण हुआ. मारुति सुजुकी यह उपलब्धि पहले ही हासिल कर चुकी है. भारत की इस सबसे बड़ी कार निर्माता कंपनी की कीमत हाल ही में लगभग 57 अरब डॉलर हो गयी, जो उसकी मूल जापानी कंपनी सुजुकी मोटर कॉर्प के बाजार अधिग्रहण से दोगुने से अधिक है.
हुंडई मोटर इंडिया और उसकी सहयोगी कंपनी किआ भी ऐसी ही कहानी बयान करती है.
पिछले साल कंपनी ने करीब 69,193 करोड़ रुपये का समेकित राजस्व और 5,640 करोड़ रुपये का कर-पश्चात लाभ दर्ज किया. इसके आइपीओ ने, जो भारत का सबसे बड़ा था, ऑफर-फॉर-सेल के जरिये 3.3 अरब डॉलर जुटाये, जिसमें पूरी राशि भारतीय सहायक कंपनी के बजाय मूल कोरियाई कंपनी के पास गयी. यानी देश से हर वर्ष हजारों करोड़ रुपये सियोल भेजे जा रहे हैं. और साथ मिलकर ये ऑटो दिग्गज भारत के यात्री वाहन बाजार के करीब 20 फीसदी हिस्से पर नियंत्रण रखते हैं. इस विसंगति ने टाटा मोटर्स और महिंद्रा को एक कठिन लड़ाई लड़ने के लिए छोड़ दिया है. सैमसंग इंडिया का राजस्व 2025 में पहली बार 1.11 लाख करोड़ रुपये को पार कर गया. इस तरह यह भारत की अकेली उपभोक्ता इलेक्ट्रॉनिक्स फर्म बन गयी है, जिसने ट्रिलियन रुपये का आंकड़ा पार किया है.
इस प्रसंग में सबसे कष्टप्रद आयाम ‘वियतनाम विरोधाभास’ है. वर्ष 2024 तक भारत में कोरिया का संचयी एफडीआइ लगभग 10 अरब डॉलर था. बावजूद इसके कि भारतीय अर्थव्यवस्था वियतनाम की अर्थव्यस्था से 10 गुना बड़ी है, उच्च रॉयल्टी, आइपीओ कैश-आउट और लाभांश प्रवाह के माध्यम से कोरियाई कंपनियां भारतीय उपभोक्ताओं से अर्जित मुनाफे से वियतनामी कारखानों को सब्सिडी दे रही हैं, जो फिर तैयार माल भारत निर्यात करते हैं क्यों? स्वदेशी नेता यह सवाल पूछते हैं कि क्या कोरियाई समूहों को भारत से निकाली गयी नकदी को एक छोटे पड़ोसी देश में विनिर्माण सुविधाओं में निवेश करना चाहिए, जो फिर भारतीय उद्योग को ही कमजोर करता है?
यह बेहद क्षुब्ध करने वाली स्थिति है कि भारत को एक दुधारू गाय समझ लिया गया है. यह आत्मनिर्भरता के भारतीय विमर्श की आत्मा पर प्रहार करती है. उदारीकरण के दशकों-दशक इस वादे के भरोसे रहे कि प्रत्यक्ष विदेशी निवेश घरेलू उद्योग को उत्प्रेरित करेगा, तकनीक हस्तांतरित करेगा व संतुलित विकास पैदा करेगा. जबकि वास्तविकता में नीति उन विदेशी दिग्गजों की ओर झुक गयी है जो मुनाफे, रॉयल्टी, विशेष लाभांश और आइपीओ की आय को अपने देश ले जाते हैं.
दूसरी ओर, भारतीय फर्में उच्च अनुपालन लागत, विलंबित अनुमोदन और रॉयल्टी के बोझ से जूझ रही हैं, जो स्थानीय नवाचार को भूखा रखता है. दक्षिण कोरियाई राष्ट्रपति के भारत दौरे के बाद सीइपीए को अपग्रेड करने की बात होने के साथ-साथ हिसाब-किताब करने का समय आ गया है. इसके बावजूद यह मौलिक प्रश्न बना हुआ है : क्या दिल्ली नियमों को फिर से लिखने का साहस जुटा पायेगी, या कोरियाई या जापानी प्रभाव एक बार फिर उस यथास्थिति को बनाये रखेगा, जो भारत की औद्योगिक संप्रभुता को खत्म करते हुए संपत्ति निकालती है?
इस प्रश्न का उत्तर न केवल भारत-कोरिया व्यापार संबंधों के भविष्य को परिभाषित करेगा, बल्कि भारत द्वारा हस्ताक्षरित हर रणनीतिक साझेदारी की विश्वसनीयता भी तय करेगा. भारत के पास वह प्रभाव है, जिसका उसने पहले कभी उपयोग नहीं किया. यह दुनिया का सबसे बड़ा उपभोक्ता बाजार और विश्व की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्था है. भविष्य बतायेगा कि अपने कोरियाई समकक्षों के सामने बैठे नयी दिल्ली के वार्ताकारों में धन को बाहर जाने से रोकने की इच्छाशक्ति है, या एक बार फिर वह दस्तावेजों पर हस्ताक्षर और रात्रिभोज की मेजबानी करते हुए मुनाफे को अगली उड़ान से सियोल जाते हुए देखेंगे. (ये लेखक के निजी विचार हैं.)
