-डॉ मुकुल श्रीवास्तव-
New gaming rules : देश बदला, दुनिया बदली. मनोरंजन के तौर-तरीके बदले. फिर खेल भी कहां पिछड़ने वाले थे. जब सब डिजिटल हो रहा है, तब खेल क्यों न हो? पर मामला इतना भर नहीं है. इंटरनेट के मौद्रिकीकरण ने खेलों को भी नहीं छोड़ा, और जब डिजिटल खेलों के साथ धन जुड़ा, तभी से मामला गंभीर हो गया. लंबे इंतजार के बाद आगामी एक मई की तारीख मील का पत्थर साबित होने जा रही है. इस दिन से देश में ‘ऑनलाइन गेमिंग नियम, 2026’ लागू हो रहे हैं.
यह केवल एक कानूनी दस्तावेज नहीं, उस जटिल डिजिटल भूलभुलैया को सुलझाने का प्रयास है, जिसमें देश का युवा और निवेश जगत पिछले एक दशक से उलझा हुआ था. दस साल की लंबी वैधता वाले गेमिंग सर्टिफिकेट और बिना पैसे वाले खेलों को पंजीकरण से मुक्ति देने जैसे प्रावधानों के साथ सरकार ने स्पष्ट कर दिया है कि वह ‘नियंत्रण’ से अधिक ‘नियमन’ पर भरोसा कर रही है. इस नियमन की सबसे बड़ी उपलब्धि है ‘कौशल’ और ‘किस्मत’ के बीच के सदियों पुराने विवाद को तकनीकी रूप से परिभाषित करना. सुप्रीम कोर्ट ने डॉ केआर लक्ष्मणन बनाम तमिलनाडु राज्य जैसे मामलों में यह स्पष्ट किया है कि कोई भी खेल ‘कौशल का खेल’ तब कहलाता है, जब उसमें खिलाड़ी की मानसिक योग्यता, रणनीति, निर्णय लेने की क्षमता और अनुभव जीत का मुख्य आधार होते हैं.
इसके विपरीत, ‘किस्मत का खेल’ वह है, जहां परिणाम पूरी तरह से भाग्य या संयोग पर निर्भर करता है, जैसे सट्टेबाजी या लॉटरी. नये नियम इस अंतर को डिजिटल प्लेटफॉर्म पर सख्ती से लागू करते हैं. सरकार ने ‘रियल मनी गेमिंग’ के उन रूपों को प्रतिबंधित कर दिया है, जो सट्टेबाजी के करीब थे, जबकि ‘ई-स्पोर्ट्स’ और कौशल आधारित खेलों को बढ़ावा देने का रास्ता साफ किया है. यह स्पष्टता निवेशकों के लिए सबसे महत्वपूर्ण थी, क्योंकि बिना परिभाषा के करोड़ों का निवेश हमेशा जोखिम में रहता था. भारत में गेमिंग अब समय बिताने का साधन नहीं, बल्कि एक विशाल आर्थिक शक्ति है.
ल्युमिकाई की वार्षिक रिपोर्ट ‘स्टेट ऑफ इंडिया गेमिंग 2023-24’ के अनुसार, भारत का गेमिंग बाजार अभी करीब तीन अरब डॉलर का मूल्य रखता है. यह उद्योग 28 फीसदी की वार्षिक चक्रवृद्धि दर से बढ़ रहा है, जो 2028 तक पांच अरब डॉलर के जादुई आंकड़े को छू लेगा. देश में अभी करीब 50 करोड़ से अधिक गेमर्स हैं, जिनमें से एक बड़ा हिस्सा ‘इन-गेम’ खरीदारी के जरिये राजस्व में योगदान दे रहा है. यह वृद्धि मनोरंजन तक सीमित नहीं है; यह भारत को वैश्विक सॉफ्टवेयर और एनीमेशन हब बनाने की दिशा में उठाया गया बड़ा कदम है.
हालांकि आलोचक मानते हैं कि इन नियमों के आने में थोड़ी देर हुई. तब तक देश के लाखों युवाओं और किशोरों को सट्टे की लत लगी और ये रातों रात अमीर बनने के सपने देख कर ऐसे खेलों के आदी हो गये, जिनमें पैसा शामिल रहता था. हालांकि इसके पीछे की जटिलताओं को समझना जरूरी है. देरी के तीन कारण हैं. पहला यह कि संविधान की सातवीं अनुसूची के अनुसार ‘जुआ और सट्टेबाजी’ राज्य सूची का विषय है. कर्नाटक, तमिलनाडु और केरल जैसे राज्यों ने जब अपनी सीमाओं में गेमिंग पर प्रतिबंध लगाया, तब मामला अदालतों में पहुंचा. केंद्र सरकार को एक ऐसा मध्य मार्ग खोजना था, जो राज्यों की शक्तियों का सम्मान करे और पूरे देश के लिए एक समान डिजिटल ढांचा भी प्रदान करे.
दूसरा कारण है तकनीकी अस्पष्टता. पारंपरिक खेलों के विपरीत ऑनलाइन गेम्स के एल्गोरिद्म इतने जटिल होते हैं कि यह पहचानना मुश्किल हो जाता है कि जीत कौशल से हुई है या सॉफ्टवेयर द्वारा नियंत्रित ‘किस्मत’ से. सरकार को विशेषज्ञों की समितियों और तकनीकी ऑडिटर्स की फौज तैयार करनी पड़ी, जो इन दावों की पुष्टि कर सकें. तीसरा है आर्थिक और सामाजिक संतुलन साधना. एक तरफ 28 फीसदी जीएसटी लगाने का आर्थिक दबाव था, दूसरी तरफ युवाओं में गेमिंग की लत से जुड़ी सामाजिक चिंताएं. सरकार ऐसा कानून चाहती थी, जो न तो उद्योग का गला घोंटे और न ही युवा पीढ़ी को जोखिम में डाले.
नये नियमों के तहत, एक बार किसी गेम को उसकी श्रेणी के आधार पर सर्टिफिकेट मिल जाता है, तो वह दस साल तक वैध रहेगा. यह गेम डेवलपर्स को दीर्घकालिक स्थिरता प्रदान करता है. सबसे राहत छोटे डेवलपर्स और छात्रों के लिए है. बिना वित्तीय लेन-देन वाले खेलों को अनिवार्य पंजीकरण की कतार से बाहर रखा गया है. इससे कॉलेज कैंपस और छोटे स्टार्टअप्स में ‘इनोवेशन’ की लहर आयेगी.
उपभोक्ता सुरक्षा के लिए आयु सत्यापन और खर्च की सीमा तय करने जैसे फीचर्स से छात्रों और बच्चों पर गेमिंग के दुष्प्रभाव कम होंगे. विदेशी निवेश में स्पष्ट नियमों के कारण अब वैश्विक गेमिंग कंपनियां भारत में अपने सर्वर और ऑफिस स्थापित करने में संकोच नहीं करेंगी. पांच अरब डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने की राह में ग्राफिक्स डिजाइनर्स, कोडिंग एक्सपर्ट्स और डाटा एनालिस्ट्स के लिए लाखों नये अवसर पैदा होंगे. भारत अब गेमिंग के क्षेत्र में केवल ‘उपभोक्ता’ नहीं, ‘नियामक’ और ‘निर्माता’ के रूप में उभर रहा है. यह नियमों और विकास का वह संतुलित संगम है, जिसकी प्रतीक्षा लंबे समय से थी.
(ये लेखक के निजी विचार हैं.)
