जलापूर्ति केंद्र बंद, पानी के लिए भटक रहे लोग
Updated at : 06 May 2016 3:53 AM (IST)
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14 सालों से ठप पड़ा है जलापूर्ति केंद्र गांवों में सूखने लगे चापाकल दो गांवों के लोगों के सामने शुद्ध पेयजल का है संकट देसरी : प्रखंड क्षेत्र के ममरेजपुर गांव में स्थित ग्रामीण जलापूर्ति केंद्र लगभग बारह सालों से ठप पड़ा हुआ है. इसके कारण उसमें लगी मशीनें जंग खा रही हैं और ग्रामीण […]
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14 सालों से ठप पड़ा है जलापूर्ति केंद्र
गांवों में सूखने लगे चापाकल
दो गांवों के लोगों के सामने शुद्ध पेयजल का है संकट
देसरी : प्रखंड क्षेत्र के ममरेजपुर गांव में स्थित ग्रामीण जलापूर्ति केंद्र लगभग बारह सालों से ठप पड़ा हुआ है. इसके कारण उसमें लगी मशीनें जंग खा रही हैं और ग्रामीण पानी के लिए इधर-उधर भटक रहे हैं. लोक स्वास्थ्य अभियंत्रण विभाग के द्वारा ममरेजपुर, धर्मपुर रामराय ग्रामीण जलापूर्ति केंद्र का निर्माण वर्ष 2000 में कराया गया था. इसका शिलान्यास 22 जून, 1999 को तत्कालीन पीएचइडी मंत्री दिवंगत मुंशीलाल राय के द्वारा किया गया था.
शिलान्यास कार्यक्रम की अध्यक्षता तत्कालीन शिक्षा मंत्री जयप्रकाश नारायण यादव ने की थी. जलापूर्ति केंद्र शिलान्यास के एक वर्ष बाद तैयार होकर चालू हो गया था और धर्मपुर एवं ममरेजपुर के लोगों को शुद्ध पेयजल की आपूर्ति होनी लगी थी. लेकिन यह केंद्र दो-ढाई वर्ष बाद ही खराब होकर ठप पड़ गया, जो आज तक बंद पड़ा है.
आज भू-गर्भ जल स्तर घटने के कारण पानी काफी नीचे चला गया है, जिससे निजी चापाकल भी लगातार सूखने लगे हैं और क्षेत्र के लोग पानी के लिए तरस रहे हैं. दोनों गांवों में चार-पांच ही ऐसे चापाकल हैं, जो अधिक गहराई तक गाड़े गये हैं, जिससे यहां के लोग किसी तरह किसी तरह इस पर ही निर्भर होकर अपना काम चला रहे हैं. सरकारी मद से लाखों के खर्च से लगाये गये इस जलापूर्ति केंद्र को ठप छोड़ देने से यहां के लोग साधन रहते हुए सिर्फ मरम्मत के अभाव में पानी के लिए दर-दर की ठोकर खाने को मजबूर हैं.
राज्य सरकार की उदासीनता के कारण इस गरमी में यहां के लोग पानी के लिए तरस रहे हैं और जलापूर्ति केंद्र शोभा की वस्तु बन कर बंद पड़ा है. स्थानीय लोगों ने मुख्यमंत्री से इस जलापूर्ति केंद्र को चालू कराने की मांग करते हुए कहा है कि सुविधा रहते हुए इस केंद्र को चालू नहीं कराने के कारण ममरेजपुर के 5 सौ 74 एवं धर्मपुर रामराय के 13 हजार 1 सौ 72 लोगों को पानी के लिए तरसना पड़ रहा है और सरकारी संपत्ति शोभा की वस्तु बन कर पड़ी हुई है.
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