चालकों की चलती है मनमानी

Updated at :05 Jul 2016 7:46 AM
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चालकों की चलती है मनमानी

परेशानी. बाढ़ काल में नाव ही होता है कोसी पीड़ितों का एक मात्र सहारा कोसी के पूर्वी व पश्चिमी तटबंध के बीच बसे लाखों की आबादी के लिए मानसून का मौसम हर साल आफत का मौसम साबित होता है. वर्षा काल के चार महीनों के दौरान कोसीवासियों को बाढ़ की विभीषिका के साथ विभिन्न प्रकार […]

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परेशानी. बाढ़ काल में नाव ही होता है कोसी पीड़ितों का एक मात्र सहारा
कोसी के पूर्वी व पश्चिमी तटबंध के बीच बसे लाखों की आबादी के लिए मानसून का मौसम हर साल आफत का मौसम साबित होता है. वर्षा काल के चार महीनों के दौरान कोसीवासियों को बाढ़ की विभीषिका के साथ विभिन्न प्रकार की समस्याओं से जूझना पड़ता है.
पंकज
सुपौल : कोसी के पूर्वी व पश्चिमी तटबंध के बीच बसे लाखों की आबादी के लिए मानसून का मौसम हर साल आफत का मौसम साबित होता है. वर्षा काल के चार महीनों के दौरान कोसीवासियों को बाढ़ की विभीषिका के साथ विभिन्न प्रकार की समस्याओं से जूझना पड़ता है. बाढ़ का कटाव, घरों में पानी घुसना, विस्थापन की मार, मवेशी चारे का संकट, फसलों का डूबना जैसी अनेक समस्याएं तटबंध के भीतर जुलाई माह शुरू होते ही प्रारंभ हो जाती है. जिसे हर वर्ष भुगतना जिले के डेढ़ लाख बाढ़ पीड़ितों के लिए उनकी नीयती बन चुकी है.
कोसी समस्या के स्थायी निदान के लिए बीते 60 वर्षों में कई तरह के प्रयास व कवायतें हो चुकी है. नेपाल प्रभाग स्थित कोसी की राह में हाई डेम का निर्माण कर समस्या से स्थायी तौर पर छुटकारा पाने की बात भी कई बार सियासत दानों द्वारा उठायी जा चुकी है, लेकिन इस दिशा में सकारात्मक पहल नहीं किये जाने की वजह से कोसी की समस्या आज भी जस की तस बरकरार है और तटबंध के भीतर सैकड़ों गांवों में बसे लोग आज भी कोसी मैया के रहमो-करम पर जीने को मजबूर हैं.
नाव ही बना है आवागमन का सहारा
कोसीवासियों को बाढ़ काल के दौरान सबसे अधिक विस्थापन की मार सहना पड़ता है. वहीं आवागमन की समस्या से भी जूझना पड़ता है. दरअसल तटबंधों के बीच अब तक सड़क व पुल-पुलिये का निर्माण नहीं किया गया है.
वहीं मानसून शुरू होने के बाद कोसी नदी का जब जलस्तर बढ़ता है तो प्रभावित क्षेत्र का करीब 75 हजार हेक्टेयर भूमि पूरी तरह जलमग्न हो जाता है. इस दौरान सबसे बड़ी समस्या आवागमन की होती है. बाढ़ के क्रम में कोसी पीड़ितों के लिए नाव ही आवागमन का एक मात्र सहारा होता है. नाव के सहारे ही प्रभावित क्षेत्र के लोग एक दूसरे गांव व टोले तक पहुंच पाते हैं. पशु चारे के लिए भी नाव का ही सहारा लेना पड़ता है. वहीं जब कोसी का उफान परवान चढ़ता है तो नाव के द्वारा ही कोसी पीड़ित जान माल बचाने के लिए ऊंचे स्थानों की ओर कूच करते हैं.
कुल मिलाकर नाव के बिना कोसीवासियों के जीवन की उम्मीद नहीं की जा सकती.15 जून से 31 अक्तूबर तक बाढ़ काल घोषित : सरकार द्वारा 15 जून से 31 अक्तूबर तक का समय बाढ़ काल घोषित किया गया है. इस दौरान प्रभावित क्षेत्र के लोगों की सुविधाओं के लिए अनेक तरह की सरकारी योजनाएं चलायी जाती है. इनमें विस्थापितों के लिए आश्रय स्थल, पीड़ितों के लिए अनाज, बीमार के लिए दवा, पशुओं के लिए चारा आदि शामिल हैं. इन सब के अलावा तटबंध के भीतर पर्याप्त संख्या में नाव की बहाली का भी दावा किया जाता है.
लेकिन हकीकत है कि इस दिशा में सरकार के सक्षम प्रयास की कमी की वजह से प्रभावित क्षेत्र में अक्सर नाव की कमी की समस्या बनी रहती है. जबकि पीड़ितों के लिए खर्च के नाम पर करोड़ों के वारे-न्यारे किये जाते हैं. नतीजा है कि बाढ़ के समय निजी नाव चालक कोसी पीड़ितों से विपदा की घड़ी में मनमाना शुल्क वसूल करते हैं. कई बार तो ऐसा देखा गया है कि एक ही नाव संचालक सरकारी कोष से भी भाड़ा वसूली करते हैं. जबकि उसी नाव को गहरे जल क्षेत्र में बिना लाल झंडा लगाये संचालित कर पीड़ितों का शोषण किया जाता है.
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