रहमत, मगफिरत और जहन्नुम से बचाता है रोजा, कुबूल होती है दुआ
Updated at : 14 May 2019 6:51 AM (IST)
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रहमानी, सुपौल : इस्लामी कैलेंडर का 09वां महीना रमजानुल मुबारक के सातवां दिन गुजरने को है. इसको लेकर मुस्लिम धर्मावलंबियों में रोजा रखने के प्रति उत्साह और जज्बा परवान पर है. हालांकि इस बार रोजा मई महीना में होने के कारण तेज धूप और बेतहाशा गर्मी होने के चलते रोजेदारों में परेशानी का होना स्वाभाविक […]
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रहमानी, सुपौल : इस्लामी कैलेंडर का 09वां महीना रमजानुल मुबारक के सातवां दिन गुजरने को है. इसको लेकर मुस्लिम धर्मावलंबियों में रोजा रखने के प्रति उत्साह और जज्बा परवान पर है. हालांकि इस बार रोजा मई महीना में होने के कारण तेज धूप और बेतहाशा गर्मी होने के चलते रोजेदारों में परेशानी का होना स्वाभाविक है.
इसके बावजूद अल्लाह और आखिरी नबी पर ईमान रखने वाले बंदों पर इसका कोई प्रभाव नहीं दिख रहा है. अल्लाहताला ने रोजा को फर्ज करार दिया है. भला रोजेदार को फर्ज अदा करने से कैसे रोका जा सकता है. बेशक उम्मते मोहम्मदिया कयामत के दिन की हौलनाक और खौफनाक मंजर को याद करते हुए तेज धूप और गर्मी की शिद्दत का प्रवाह नहीं कर रहे हैं.
रमजान और रोजा के अवसर पर बाजारों में रोजेदारों द्वारा सेहरी और इफ्तार के लिए फल एवं अन्य सामानों की खरीदारी करने के चलते बाजार की रौनक देखते बनता है. हालांकि कि इस बार सेहरी और इफ्तार हेतु व्यवहार में लाये जाने वाले सामानों के दामों में काफी बढ़ोतरी के बावजूद रोजादार सामानों की खरीदारी में जुट गये हैं.
दुनिया के विभिन्न धर्मों में मानव के आत्म सिद्धि पापों और गुनाहों से छुटकारा पाने हेतु अपने अल्लाह, भगवान, ईश्वर और परमात्मा खुश कर उन तक पहुंचने के लिए जो रास्ते बताये गये हैं, उसमें एक रास्ता उपवास, भूखे प्यासे रहना और व्रत के माध्यम से मंजिल तक पहुंचने का है.
इस्लाम धर्मावलंबियों के द्वारा भी रोजा रखना बताया गया है. मौलाना मो रमजान अली क़ासमी के अनुसार अरब की सरजमीं न में अवतरित हुए अल्लाह के आखरी पैगंबर हजरत मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम पर अल्लाहताला ने दुनिया वालों की हिदायत और रहनुमाई के लिए बेहतर हकीमी नुस्खा की शक्ल में अपने करीबी फरिश्ता हजरत जिब्राईल अमीन के माध्यम से आखरी किताब कुरान मजीद को रमजान के आखरी हिसा लैलतुल कद्र अर्थात शबेकद्र में नाजिल किया. रमजान का पहला हिस्सा रहमत, दूसरा मगफिरत और तीसरा तथा आखरी जहन्नुम से छुटकारा दिलाता है.
रमजान और रोजा की हकीकत के बारे में मौलाना मुफ्ती मेराज सईद काशमी कहते हैं कि रमजान का चांद दिखने के बाद रोजा की शुरुआत की जाती है. सुबह सादिक अर्थात सूरज उगने एवं सफेदी आने से पहले रोजादार सेहरी अर्थात थोड़ा कुछ खा-पीकर रोजा की नीयत की जाती है तथा सूरज डूबने पर मगरिब की आजाएं सुनकर इफ्तार कर उस दिन के रोजा को समाप्त किया जाता है. यह सिलसिला पूरे रमजान महीना तक करना है.
मुफ्ती साहब के अनुसार रोजेदारों को कयामत अर्थात प्रलय के दिन अल्लाहताला खास मेहमानों में शामिल करते हुए अर्श के साये में मेहमाननवाजी करेंगे. खुद अल्लाह के आखिरी नबी हौज कौसर पर अपने उम्मतियों को पानी पिलाकर सैराब करेंगे. खुश किस्मत है वह लोग जिसने अल्लाह की खुशनुदी के लिए पूरे रमजान के महीना का रोजा रखा तथा रोजा के दौरान गलत और बुरे कामों से बचने का काम किया बेशक वह अल्लाह का महबूब बंदा है. हसके लिए जन्नत में सबसे ऊंचा दर्जा नसीब होगा.
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