जिला खादी ग्रामोद्योग के अस्तत्वि पर संकट
Published by : Prabhat Khabar Digital Desk Updated At : 08 Jan 2016 8:43 PM
जिला खादी ग्रामोद्योग के अस्तित्व पर संकट फोटो नंबर-7, वीरान पड़ा बथनाहा के माधोपुर स्थित खादी भंडार केंद्रसीतामढ़ी : राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने खादी के माध्यम से गांव-गांव तक रोजगार उपलब्ध कराने का जो सपना देखा था, उसका असर आजादी के कुछ दशकों बाद तक दिखाई दिया, परंतु सरकार की उदासीनता के कारण धीरे-धीरे खादी […]
जिला खादी ग्रामोद्योग के अस्तित्व पर संकट फोटो नंबर-7, वीरान पड़ा बथनाहा के माधोपुर स्थित खादी भंडार केंद्रसीतामढ़ी : राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने खादी के माध्यम से गांव-गांव तक रोजगार उपलब्ध कराने का जो सपना देखा था, उसका असर आजादी के कुछ दशकों बाद तक दिखाई दिया, परंतु सरकार की उदासीनता के कारण धीरे-धीरे खादी ग्रामोद्योग के अस्तित्व पर संकट का बादल छाने लगा और वर्तमान में खादी ग्रामोद्योग अंतिम सांसे गिन रहा है. आज यदि बापू जिंदा होते, तो खादी भंडार की दुर्दशा देख कर उन्हें काफी पीड़ा होती.–सूत काटने वाले को बनाया जाता था कांग्रेस सदस्य पुराने कांग्रेसियों की मानें, तो कभी कांग्रेस पार्टी का सदस्य उसे ही बनाया जाता था, जो सूत काटा करते थे और इस कार्य में रुचि लेते था. अब वह बात इतिहास के पन्नों तक ही सिमट कर रह गयी है. स्वतंत्रता सेनानी जीबछ झा बताते हैं कि गांधी जी का नाम लेकर कांग्रेस पार्टी दशकों तक सत्ता में रही, परंतु खादी को ऊंचाई तक पहुंचा कर बापू के सपनों को साकार करने के बजाय उल्टे बापू के सपनों को लगभग भुला सा दिया गया. फलत: आज खादी ग्रामोद्योग पतन के कगार पर खड़ा है. जिला खादी ग्रामोद्योग संघ के अध्यक्ष रामबलम राय व मंत्री मुख्तार सिंह के अनुसार खादी ग्रामोद्योग के माध्यम से गांव के गरीब महिलाओं को रोजगार मिलता था. इसके अलावा गांव-गांव में महिलाएं सूत काट कर घर के कपड़े की जरूरतों को पूरा करती थी. खादी से महिला तो महिला, पुरुष भी सूत काट कर बीट करने आते थे. जिला के दर्जनों केंद्रों पर भीड़ लगती थी, परंतु आज वह बात नहीं रही. आज जिले का हर केंद्र सुनसान रहता है.संघ से जुड़ कर गरीबी में ही गुजार दी जिंदगी पूर्व में जिला में सैकड़ों बुनकर व हजारों सूतकार खादी भंडार से जुड़ कर आजीविका चलाते थे. वहीं वर्तमान में करीब 35 बुनकर व करीब 500 सूतकार ही शेष रह गये हैं. इनके पास भी पर्याप्त काम नहीं होने के कारण खादी भंडार से इनका भी मोह भंग हो गया है. वर्तमान में जिले में करीब 18 केंद्र संचालित है, जिसमें करीब 35 कर्मचारी कार्यरत हैं. कई कर्मी दूसरे काम में लग गये, जबकि कई कर्मचारी संघ से जुड़ कर गरीबी में ही जिंदगी गुजार दिया. वेतन इतना मिलता है कि अपना भी गुजारा मुश्किल है. –राज्य सरकार पर लाखों का बकायाबताया गया कि पिछले कुछ साल पूर्व सरकार द्वार खादी ग्रामोद्योग को 1 करोड़ सहायता देने की घोषणा की गयी थी, जिससे खादी ग्रामोद्योग से जुड़े लोगों को थोड़ी उम्मीद जगी थी. उसे भी ठंढ़े बस्ता में डाल दिया गया, जिससे कर्मचारियों को निराशा हुई है. कहा कि राज्य सरकार पर अब भी लाखों रूपया बकाया है. खादी ग्रामोद्योग का उत्पादन इतना कम है कि उससे कच्चा माल खरीदने के अलावा कर्मियों व बुनकरों को भुगतान करने में भी परेशानी हो रही है.खादी भंडार में उपलब्ध सामग्रीकर्मचारियों के अनुसार आज भी खादी भंडार के पास सूती, सिल्क, ऊनी व पॉली वस्त्र के अलावा अगरबत्ती, आयुर्वेदिक औषधियां, दंत मंजन, सतरीठा, शहद व अन्य सामग्री उपलब्ध है. जरूरत है लोगों को जागरूक करने की. खादी कपड़ों का ब्रांडिंग कराया जाये व खादी पहनने के लिए प्रेरित किया जाए, तो खादी का दिन लौट सकता है. आधुनिक मशीनें लायी जाए व खादी की मांग बढ़ने लगे, तो आज भी इससे जुड़ कर जिले की सैकड़ों सूतकार व बुनकर अपना आजीविका चला सकता है.
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