नयी उम्मीद: रिंच और सीरिंज का पुराना नाता, पूर्णिया में दे सकता है आत्मनिर्भरता को नया आयाम
Author : Prabhat Khabar News Desk Published by : Prabhat Khabar Updated At : 18 May 2020 11:43 PM
रिंच और सीरिंज के क्षेत्र में संभावनाओं को विकसित कर पूर्णिया समेत पूरे सीमांचल में रोजगार का सृजन किया जा सकता है. इससे न केवल पलायन को रोका जा सकेगा बल्कि लॉकडाउन में कोरोना के खौफ से बड़ी संख्या में आये प्रवासियों के जीने की राह भी निकलेगी.
पूर्णिया : कहते हैं रिंच और सीरिंज से पूर्णिया का पुराना नाता रहा है और आज के दौर में यही नाता आत्मनिर्भरता को नया आयाम दे सकता है. मोटर और मेडिकल के क्षेत्र में यहां असीम संभावनाएं आज भी हैं पर कार्य कुशलता का अभाव बना हुआ है. जानकारों की मानें तो रिंच और सीरिंज के क्षेत्र में संभावनाओं को विकसित कर पूर्णिया समेत पूरे सीमांचल में रोजगार का सृजन किया जा सकता है. इससे न केवल पलायन को रोका जा सकेगा बल्कि लॉकडाउन में कोरोना के खौफ से बड़ी संख्या में आये प्रवासियों के जीने की राह भी निकलेगी. हालांकि सरकार ने भी इस दिशा में पहल की है पर इसके लिए ठोस रणनीति और उस पर अमल करने की जरुरत महसूस की जा रही है.
गौरतलब है कि पूर्णिया जब पूर्ण रुप से विकसित नहीं हुआ था तब यहां मोटर मरम्मत के कई संस्थान यानी बड़े-बड़े गैरेज चल रहे थे जिसमें चक्का बनाने से लेकर बस व ट्रक की बॉडी बनाने के साथ डेंटिंग-पेंटिंग तक का काम हुआ करता था. शहर के गुरुद्वारा रोड स्थित पटना गैरेज का नाम आज भी पुराने लोगों की जुबान पर है जिसमें कई युवा मिस्त्री का काम करते थे. उस जमाने में मोटर गैरेज के मामले में मुजफ्फरपुर के बाद पूर्णिया का ही नाम था जबकि अभी के हिसाब से उस समय बस-ट्रक या कार-जीप गिने चुने लोगों के पास ही होते थे. दूसरे शहरों की गाड़ियां यहां मरम्मत के लिए आती थी. इन्हीं गैरेजों में कुछ दिन काम करने के बाद कई लोग रिंच और अन्य औजार लेकर सड़क किनारे बैठ जाते थे और वाहनों की मरम्मत कर जीवन यापन कर लेते थे. मेडिकल के क्षेत्र में भी अमूमन यही स्थिति थी.
आज भले ही पूर्णिया मेडिकल हब के रुप में विकसित हो गया है और सुविधाएं बढ़ गई हैं पर उस जमाने में भी औसतन हर पांच घर के बाद छठा घर एेसा था जिसमें कोई न कोई कंपाउंडर के रुप में सूई लगा यानी इंजेक्शन देकर अपनी कमाई कर लेता था. बुजुर्गों की मानें तो उस समय एक इंजेक्शन देने के एवज में बारह आना यानी पचहत्तर पैसे लिए जाते थे. बाद के दिनों में यह रेट दो रुपये तक हो गया था. उस समय न तो इतने नर्सिंग होम थे और न ही डाक्टरों की इतनी बड़ी फौज थी. जानकारों ने आफ दे रिकार्ड बताया कि उस समय सदर अस्पताल में बहुत व्यवस्था नहीं थी पर यह एक तरह का ट्रेनिंग सेंटर था जहां लोग स्टाफ से जान-पहचान बढ़ा कर इंजेक्शन देना सीख जाते थे.
मोटर लाइन में तकनीकी प्रशिक्षण की जरूरतपूर्णिया. मोटर लाइन में तकनीकी प्रशिक्षण के लिए योजना लाने की जरूरत बतायी जा रही है. इसके जरिये युवाओं का भविष्य संवारा जा सकता है. आज के दौर में वाहनों की संख्या में काफी इजाफा हो गया है पर किसी को कार की सर्विसिंग कराने के लिए कंपनी के शो रुम में नंबर लगाना पड़ता है. इसके लिए सुबह से शाम तक का वक्त जाया हो जाता है. जानकारों का कहना है कि इसके लिए तकनीकी कामगारों का अभाव है पर ऐसे लोगों को प्रशिक्षण देकर बैंकों के माध्यम से आर्थिक सहायता उपलब्ध करा दी जाए तो नये रोजगार का सृजन हो सकता है.
इसी तरह बेरोजगार युवाओं को ऑटो रिक्शा, टैक्सी, ई रिक्शा, निजी बस और राज्य ट्रांसपोर्ट में काम करने का प्रशिक्षण मिले और प्रशिक्षण के बाद लोन दिलाने और गाड़ी खरीदवाने में मदद मिल जाए तो पलायन को ब्रेक लग सकता है.
मेडिकल के क्षेत्र में रोजगार की कई संभावनाएं पूर्णिया. मेडिकल के क्षेत्र में भी रोजगार की कई संभावनाएं हैं. बीएससी बायोटेक, बीएससी नर्सिंग, बी. फार्मा और पैरामेडिकल कोर्स से न केवल करियर बन सकता है बल्कि बेरोजगारों का जीवन यापन भी हो सकता है. पूर्णिया में करीब चार सौ नर्सिंग होम हैं और इसकी तिगुनी संख्या में डाक्टरों की क्लीनिक है. जानकारों का मानना है कि प्रशिक्षण के अभाव के कारण बाहर के लोग यहां बड़ी संख्या में काम कर रहे हैं.
डाक्टरों को प्रशिक्षित स्टाफ की जरूरत है और यहां इसका अभाव बना हुआ है. हालांकि मेडिकल कालेज खुल गया है पर इससे वह जरूरत पूरी नहीं हो सकती जिससे पलायन रोकने वाले रोजगार की उम्मीदें की जाएं. इसके अलावा दवा के क्षेत्र में भी नया कुछ कर रोजगार का सृजन कर लोगों को आत्मनिर्भर बनाया जा सकता है. फोटो. 18 पूर्णिया 7परिचय- बाइक मरम्मत करते मैकेनिक नोट: आत्मनिर्भर भारत पैकेज का लोगों लगा दीजियेगा.
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