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बिहार में राष्ट्रीय उत्पादकता के मुकाबले न्यूनतम स्तर पर पहुंची पपीता की पैदावार, जानें कैसे करें बचाव

Updated at : 04 Aug 2022 5:00 AM (IST)
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बिहार में राष्ट्रीय उत्पादकता के मुकाबले न्यूनतम स्तर पर पहुंची पपीता की पैदावार, जानें कैसे करें बचाव

डॉ राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय के सह निदेशक अनुसंधान एवं अखिल भारतीय समन्वित फल अनुसंधान परियोजना के प्रधान अन्वेषक डॉ एसके सिंह स्थिति को चिंताजनक बताते हैं.

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बिहार में पपीते की खेती में क्षेत्रफल और उत्पादन में लगातार बढ़ाेतरी हो रही है. इसके बावजूद बरसात में फलों में लगने वाले रोग के कारण राज्य में उत्पादन राष्ट्रीय उत्पादकता के मुकाबले करीब 22.45 टन प्रति हेक्टेयर स्तर पर पहुंच गयी है. पपीते की राष्ट्रीय उत्पादकता 43.30 टन प्रति हेक्टेयर है.

फल की पैदावार में बढ़ोतरी चुनौती

कृषि वैज्ञानिकों के लिए इस फल की पैदावार में बढ़ोतरी चुनौती बनी हुई है. हालांकि, बिहार सरकार के रिकाॅर्ड के मुताबिक 2017-18 की अपेक्षा 2019-20 में पपीते के उत्पादन में 5.9 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई. क्षेत्रफल 19.78 फीसदी और उत्पादन 41.32 फीसदी की वार्षिक चक्रवृद्धि से बढ़ रहा है.

बड़े पैमाने पर पपीते की खेती की जा रही है

डॉ राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय के सह निदेशक अनुसंधान एवं अखिल भारतीय समन्वित फल अनुसंधान परियोजना के प्रधान अन्वेषक डॉ एसके सिंह स्थिति को चिंताजनक बताते हैं. वह बताते हैं कि बड़े पैमाने पर पपीते की खेती की जा रही है, लेकिन बरसात के मौसम में पपाया रिंग स्पॉट विषाणु रोग और जड़ गलन जैसी घातक बीमारी उत्पादन को कम कर दे रही है.

बिहार की उत्पादकता 22.45 टन प्रति हेक्टेयर है

डाॅ एसके सिंह के अनुसार बिहार में वर्तमान में 1.90 हजार हेक्टेयर में 42.72 हजार टन पपीते का उत्पादन हो रहा है. बिहार की उत्पादकता 22.45 टन प्रति हेक्टेयर है. राष्ट्रीय उत्पादकता 43.30 टन हेक्टेयर है. देश में पपीता 138 हजार हेक्टेयर क्षेत्रफल में उगाया जाता है और कुल 5989 हजार टन उत्पादन प्राप्त होता है. बिहार में पपीते की उत्पादकता राष्ट्रीय उत्पादकता से लगभग आधी है.

ऐसे करें फसल का बचाव

डॉ एसके सिंह कहते हैं कि पपीते के खेत में 24 घंटा पानी रुक गया, तो फसल को बचाना असंभव हो जायेगा. इस समय पेड़ के आसपास पांच इंच ऊंचा थल्ला बनाने की जरूरत है. पपीते को बीमारियों से बचाने के लिए कृषि विश्वविद्यालय ने तकनीक भी विकसित किया है. पपाया रिंग स्पॉट विषाणु से बचाव के लिए दो प्रतिशत नीम के तेल जिसमें 0.5 मिली/लीटर स्टीकर मिला कर एक-एक महीने के अंतर पर छिड़काव आठवें महीने तक करना चाहिए. पौधों में रोगरोधी गुण पैदा करने के लिए यूरिया पांच ग्राम, जिंक सल्फेट चार ग्राम और बोरान चार ग्राम प्रति लीटर पानी में घोल कर एक एक महीने के अंतर पर छिड़काव आठवें महीने तक करना चाहिए.

फलों की खेती का रकबा 51 हजार हेक्टेयर बढ़ा उत्पादन 7600 टन

फल उत्पादन में बिहार के किसान तरबूज- खरबूज की खेती में सबसे अधिक रुचि दिखा रहे हैं. फलों के कुल उत्पादन में यह पहले नंबर पर हैं. आर्थिक सर्वे 2021-22 के मुताबिक एक साल में फलों की खेती के क्षेत्रफल (रकबा)मे 51 हजार हेक्टेयर की वृद्धि हुई. हालांकि, इसके मुकाबले उत्पादन में 7600 टन की ही वृद्धि हुई. 2020-21 में करीब 3.74 लाख हेक्टेयर पर फलों की खेती हुई. कुल उत्पादन 50.02 लाख टन रहा. इससे पूर्व 2019-20 में करीब 3.23 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में पर फलों की खेती हुई. कुल उत्पादन 42.42 लाख टन रहा.

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राज्य में फल उत्पादन एक नजर

  • फल उत्पादन लाख टन

  • आम 15.49

  • केला 13.69

  • अमरूद 4.34

  • लीची 3.08

  • अनानास 1.13

  • पपीता 0.95

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