भवन में दरार, गिर रहे प्लास्टर

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सड़कों की हाल भी चलने लायक नहीं, पेयजल की भी है समस्या मधुबनी : जिले के करीब 42 लाख की आबादी को योजना का लाभ पहुंचाने वाले अधिकारी, न्याय दिलाने वाले न्यायाधीश, दिन रात सरकार के योजनाओं के क्रियान्वयन कर उसे धरातल पर लाने में लगे रहने वाले कर्मी आज खुद योजना के लिए मोहताज […]

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सड़कों की हाल भी चलने लायक नहीं, पेयजल की भी है समस्या

मधुबनी : जिले के करीब 42 लाख की आबादी को योजना का लाभ पहुंचाने वाले अधिकारी, न्याय दिलाने वाले न्यायाधीश, दिन रात सरकार के योजनाओं के क्रियान्वयन कर उसे धरातल पर लाने में लगे रहने वाले कर्मी आज खुद योजना के लिए मोहताज हैं. उनको रहने के लिए दिया गया आवास जर्जर है.
घर जाने वाले रास्ते टूटी हैं, लेकिन इसे ठीक करने की पहल तक नहीं हो पा रही हैै.
इन अधिकारियों की मजबूरी है कि वे इस समस्या के निदान के लिए किसी से नहीं बता सकते. वे खुद हर समस्या का निदान करने में सक्षम हैं. दरअसल, हम बात कर रहे हैं जिले के ऑफीसर कॉलोनी की. जहां जिले के कई वरीय समाहर्ता, जिला स्तरीय पदाधिकारी व न्यायाधीश के साथ साथ दर्जनों सरकारी विभाग के कर्मी रहते हैं.
इस कॉलोनी में बने अधिकांश भवन जर्जर हैं. कॉलोनी में जाने को सड़क तक ठीक नहीं है. पेयजल की समस्या है. रात को अंधेरों का साम्राज्य भी कायम रहता है. कुल मिलाकर यह कि हर प्रकार की समस्या से ये अधिकारी दिन रात जूझ रहे हैं. यह समस्या कोई नयी नहीं है. वर्षों से इस काॅलोनी की यह समस्या है.
कॉलोनी में हैं 85 क्वार्टर
जानकारी के अनुसार आॅफीसर कॉलोनी का निर्माण वर्ष 1980 के आस पास किया गया था. करीब 85 क्वार्टर हैं. सभी में सरकारी विभाग के अधिकारी या कर्मचारी ही रहते हैं, लेकिन अब इस भवन की हालत यह है कि कब कौन सा भवन धराशायी हो जाये और किस अधिकारी के परिवार पर कब कौन सी विपदा आ जाये यह कहना असंभव है.
जिस प्रकार इस कॉलोनी के भवन जर्जर हैं. उससे तो यही कहा जा सकता है कि विगत साल अप्रैल माह में आये भूकंप मे भगवान ही इन कॉलोनी में रहने वाले अधिकारियों पर मेहरबान थे, जिस कारण कोई भयानक हादसा नहीं हो सका. शायद ही कोई क्वार्टर ऐसा हो जिसकी दीवार दरकी न हो, छतों के प्लास्टर गिर कर गिर नहीं रहे हों.
सड़कें भी ठीक नहीं
कॉलोनी का नाम ऑफीसर कॉलोनी और रहते भी ऑफीसर ही हैं, लेकिन इस काॅलोनी में समस्या किसी ग्रामीण क्षेत्रों की तरह ही है. किसी भी सूरत में यह अधिकारियों के कॉलोनी कहलाने लायक नहीं है. जिला पदाधिकारी के आवास के सामने से होकर जाने वाली सड़क इस कदर जर्जर हो चुकी है कि अधिकारी यदि शौक से भी पैदल घूमने निकले तो परेशानी होगी. चारपहिये वाहन रहने के कारण उन्हें सूखाड़ के दिनों में भले ही अधिक दिक्कत न आती हो, लेकिन बारिश होते ही इस सड़क से जाना असंभव हो जाता है.
नहीं है पेयजल की व्यवस्था
कॉलोनी में रहने वाले कर्मियों को पेयजल की समस्या से भी जूझना पड़ता है. जानकारी के अनुसार पूरे कॉलोनी में पांच सात चापाकल ही है. इसमें किसी आम गली मोहल्ले में चापाकल पर पानी भरने के लिए लगने वाली लाइन की तरह ही इन अधिकारियों या उनके परिवारों को पानी के लिए मशक्कत करनी पड़ती है.
हर बार मिलता है आश्वासन
ऐसा नहीं कि इन अधिकारियों के समस्या से जिला पदाधिकारी अवगत न हों. हर एक समस्या से जिला पदाधिकारी अवगत हैं, लेकिन इसके सुधार का सिर्फ आश्वासन ही मिलता रहा है. कई बार अधिकारियों ने दबी जुबान से अपनी अपनी समस्याओं से जिला पदाधिकारी को अवगत कराया है, लेकिन नतीजा शून्य ही रहा.
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