प्रकृति और संस्कृति का मेल है आदिवासी जीवन
Published by : Prabhat Khabar Digital Desk Updated At : 24 Jun 2015 8:20 AM
मेदनीचौकी: मैदानी संस्कृति से दूर पहाड़ियों और जंगलों के बीच विभिन्न गांवों में सांवले रंग के, नंगे बदन, भोले-भाले चेहरे वाले अनुसूचित जनजाति की करीब आठ हजार आबादी जिले में निवास करती है. इनमें भारत की प्राचीनतम संस्कृति आज भी देखी जा सकती है. प्रकृति की अधिकतर वस्तुओं को ये आदिवासी अपने अदृश्य देवता द्वारा […]
प्रकृति की अधिकतर वस्तुओं को ये आदिवासी अपने अदृश्य देवता द्वारा प्रदत्त वरदान की तरह स्वीकार करते हैं. शायद इसलिए प्रकृति से उनका संबंध बहुत सहज और घनिष्ठ होता है. प्रकृति इनके लिए पिकनिक स्थल नहीं बल्कि जीवन का आधार है. ऐसी स्थिति में बाहरी लोगों द्वारा प्रकृति पर किया गया आक्रमण इन्हें स्वयं पर किया गया आक्रमण मालूम होता है.
जंगलों से प्राप्त फल-फूल, कंद मूल के अलावा मोटे अनाज, इनका मुख्य भोजन हैं. जबकि शिकार से प्राप्त पशु-पक्षियों के मांस को ये बड़े चाव से खाते हैं. इन्हें चावल को उबाल कर उसके मांड़ में नमक मिला कर पीना विशेष प्रिय है. भात में दूसरे दिन पानी और नमक मिला कर खाना इनका महत्वपूर्ण भोजन है जबकि महुआ इनका प्रिय भोजन हैं. दारू इनके जीवन का अभिन्न अंग है. ये महुआ और चावल से शराब बनाने में सिद्धहस्त होते हैं. प्रतिदिन शाम को पूरे परिवार के साथ बैठ कर शराब पीना इनका दिनचर्या है.
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