बाढ़ से बेघर चार सौ परिवारों को 22 साल में भी नहीं बसा पायी सरकार

Published at :11 Sep 2016 7:03 AM (IST)
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बाढ़ से बेघर चार सौ परिवारों को 22 साल में भी नहीं बसा पायी सरकार

चौदह साल लगे भू-अर्जन में चार साल से जारी है कब्जा दिलाने की प्रक्रिया नहरों और रेल पटरियों के किनारे 22 साल से बसे हैं ये परिवार नक्शे में अपनी जमीन के टुकड़े को निहारते रहते हैं लोग दबंगों ने कर लिया है सरकार द्वारा अर्जित जमीन पर कब्जा लोग खुद बसने गये तो दबंगों […]

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चौदह साल लगे भू-अर्जन में चार साल से जारी है कब्जा दिलाने की प्रक्रिया

नहरों और रेल पटरियों के किनारे 22 साल से बसे हैं ये परिवार
नक्शे में अपनी जमीन के टुकड़े को निहारते रहते हैं लोग
दबंगों ने कर लिया है सरकार द्वारा अर्जित जमीन पर कब्जा
लोग खुद बसने गये तो दबंगों ने घेर कर गोलीबारी शुरू कर दी
बलकुंडा(खगड़िया) : बीस एकड़ जमीन के टुकड़े का एक नक्शा है, इस नक्शे में 400 छोटे-छोटे खाने बने हैं. ये चार-चार डिसमिल के खाने हैं. 22 साल पहले बाढ़ और कटाव की वजह से बेघर हुए बलकुंडा के लोगों के लिए ये खाने ही इकलौती उम्मीद हैं. इन खानों में एक रोज उनकाघर होगा. घर होगा तो सबकुछ आसान हो जायेगा. मजदूरी मिलेगी, बच्चे स्कूल जा पायेंगे. सरकारी योजनाओं का लाभ मिलेगा. कात्यायनी मंदिर के पास छोटी-मोटी दुकान खोली जा सकेगी. चार डिसमिल जमीन का जो सपना कागज पर एक बाइ एक सेमी की
बाढ़ से बेघर…
जगह घेर रहा है, उस छोटी सी जगह में इन लोगों के बड़े-बड़े सपने पल रहे हैं. मगर यह नक्शा है कि जमीन पर उतर ही नहीं रहा. जमीन एक्वायर कर ली गयी है, भू-मालिकों को बाजार मूल्य से तीन-चार गुना तक मुआवजा दिया जा चुका है. जमीन पर नक्शे के हिसाब से प्लॉट काटे जा चुके हैं. मगर कब्जा नहीं मिल रहा. क्योंकि उस जमीन पर दबंगों का कब्जा है और सरकार बेबस है.
बलकुंडा गांव खगड़िया जिले के चौथम प्रखंड का हिस्सा है.
यह गांव उस कुख्यात धमहरा स्टेशन के पास है, जहां दो बार भीषण रेल दुर्घटना हो चुकी है. इस इलाके में पहुंचने के लिए आज तक सड़क नहीं बन पायी, लोग पुरानी रेल पटरियों के सहारे आना-जाना करते हैं और कोसी की उछाल मारती लहरों को देखते हुए दम साध कर रेलवे पुलों से गुजरते हैं. उस दुर्गम दुनिया में रह रहे चार सौ परिवार जिनमें ज्यादातर महादलित और अति पिछड़े लोग हैं, बाइस साल से अपनी बसाहट तलाश रहे हैं. बाइस साल पहले आयी एक भीषण बाढ़ ने उनके गांव को डुबा दिया. कोसी ने उनकी बस्ती को अपने आगोश में ले लिया. तब से वे बेघर हैं.
वे रेल पटरियों के किनारे, नहर के कछार पर और न जाने किस-किस जगह पर बसे हैं. तब से वे सरकार के पास लगातार गुहार लगा रहे हैं कि उन्हें बसने के लिए थोड़ी सी जमीन दी जाये.
बलकुंडा गांव के शिवनंदन सिंह जो किसी रिटायर स्कूल मास्टर की तरह दिखते हैं, इन चार सौ परिवारों के लिए नेताजी हैं. यही पिछले बीस सालों से अपने गांव के लोगों को जमीन दिलाने की लड़ाई लड़ रहे हैं. इन पीड़ित परिवारों के चंदे से चलने वाली लड़ाई लड़ते हुए बीस सालों में शिवनंदन सिंह ने राज्य के हर छोटे-बड़े सरकारी अधिकारियों से मुलाकात की और उन्हें इस बस्ती की विपदा सुनायी. उनके तमाम अनुनय विनय का नतीजा यह निकला कि 1998 में इस बस्ती के लिए 20 एकड़ जमीन एक्वायर करने का फैसला लिया गया. तब लोगों को लगा था कि बहुत जल्द अब उनके दिन फिर जायेंगे. मगर यह फैसला महज दिलासा ही साबित हुआ.
शिवनंदन सिंह कहते हैं. सिर्फ जमीन एक्वायर करने में ही चौदह साल लग गये. 2012 में भू-मालिकों को ग्यारह लाख रुपये प्रति एकड़ के हिसाब से मुआवजा देकर उनसे 20 एकड़ जमीन हासिल की गयी. जबकि उस वक्त उस जमीन का बाजार मूल्य 3-4 लाख रुपये प्रति एकड़ से अधिक नहीं था. सात भू-स्वामियों से यह जमीन हासिल की गयी थी. मगर दिक्कत यह है कि भू-अर्जन किये जाने के चार साल बाद भी सरकार हमें उस जमीन पर बसा नहीं पा रही है.
क्या है पेंच
वस्तुतः जो बीस एकड़ जमीन इन परिवारों के पुनर्वास के लिए एक्वायर की गयी थी, उस पर स्थानीय दबंगों ने कब्जा कर लिया है. वे कब्जा छोड़ने को तैयार नहीं हैं. शिवनंदन सिंह बताते हैं कि नौ जुलाई, 2013 को डीसीएलआर, एसडीओ, चौथम और मानसी के सीओ, दो थानों की पुलिस, सात अमीन समेत बड़ा सरकारी अमला इन गरीब परिवारों को बसाने के लिए बलकुंडा पहुंचा था. मगर उस वक्त इन दबंगों द्वारा लायी गयी कुछ महिलाएं जमीन पर लेट गयीं और अमीनों को जमीन मापने नहीं दिया. महिलाओं को देख कर अधिकारियों के हाथ-पांव फूलने लगे. कहने लगे कि 15 दिन बाद महिला पुलिस को लेकर आयेंगे. अभी इन महिलाओं से लड़ना ठीक नहीं. इतना कह कर पूरी टीम लौट गयी और बेघर लोग ठगे रह गये.
सीओ को है बसाने की जिम्मेवारी
शिवनंदन सिंह कहते हैं, 26 नवंबर, 2014 को डीएम के जनता दरबार में वे इस मामले को लेकर गये थे. तब जिलाधिकारी महोदय ने अगले रोज पत्र(पत्रांक 2453) जारी कर कहा कि दखल कब्जा अंचलाधिकारी, चौथम के जिम्मे है. लाभार्थियों को बसाने की कार्रवाई अब अंचलाधिकारी से अपेक्षित है. मगर सीओ इस मामले में कोई भी कार्रवाई करने के लिए तैयार नहीं हैं. बार-बार अनुरोध करने पर भी टाल मटोल करते हैं. रोचक बात यह है कि तब से अब तक दो सीओ बदले जा चुके हैं.
और वह गोलीबारी : गांव के ही एक अन्य युवक टुनटुन राम कहते हैं, अधिकारी 15 दिन की बात कह कर गये थे, मगर साल भर बीतने के बावजूद अधिकारी नहीं आये. वे लोग बार-बार कहने गये, मगर कोई सुनवाई नहीं हुई. फिर पीड़ित परिवारों ने सोचा कि क्यों न खुद जाकर अपने हिस्से की जमीन कब्जा ली जाये. लोग दल बांध कर गये और उस जमीन पर झोपड़ी बनाने लगे. मगर दबंगों को जैसे खबर मिली, वे हथियार लेकर पहुंच गये और घेर कर गोलीबारी करने लगे. भयभीत लोगों ने पुलिस को फोन किया. फिर पुलिस आयी तब जाकर उन लोगों की जान बची. उस मामले में 22 लोगों पर नामजद केस भी हुआ. मगर वे लोग पकड़े नहीं जा सके.
सीओ को पता भी नहीं है कि हो चुका है भू-अर्जन: वर्तमान सीओ से जब फोन पर बलकुंडा का मामला उठाया गया तो वे इस पूरे मामले से अनजान नजर आते हैं. वे कहते हैं कि बलकुंडा का मामला बहुत पुराना है, भू-अर्जन का मामला जिला पदाधिकारी ही देखते हैं. भू-अर्जन काफी तकनीकी काम है, इसमें वक्त लगता है. जब उन्हें बताया जाता है कि भू-अर्जन हो चुका है और प्लॉटिंग भी की जा चुकी है. काम सिर्फ लोगों को कब्जा दिलाने का है और जिलाधिकारी ने यह जिम्मा उन्हें सौंपा है. तो वे कहते हैं, सच यही है कि मैं छह माह पहले यहां आया हूं और बलकुंडा के मामले में मुझे ठीक से जानकारी नहीं है.
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