बैंक प्रबंधन सवालों के घेरे में
Published by :Prabhat Khabar Digital Desk
Published at :15 Mar 2016 8:03 AM (IST)
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हेराफरी. ऋण ठगी मामले में एसबीआइ के जिला समन्वयक से मांगी रिपोर्ट कृषि व जेएलजी ऋण में ठगी के आरोप में घीरे राजद विधायक चंदन राम इनके पिता अर्जुन राम के अलावे एसबीआइ को एडीएम शाखा के क्रियाकलापों की जांच चल रहीं है. यदि आरोप सही सिद्ध हुए तो प्रबंधक के साथ कई बैंक कर्मचारी […]
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हेराफरी. ऋण ठगी मामले में एसबीआइ के जिला समन्वयक से मांगी रिपोर्ट
कृषि व जेएलजी ऋण में ठगी के आरोप में घीरे राजद विधायक चंदन राम इनके पिता अर्जुन राम के अलावे एसबीआइ को एडीएम शाखा के क्रियाकलापों की जांच चल रहीं है. यदि आरोप सही सिद्ध हुए तो प्रबंधक के साथ कई बैंक कर्मचारी इस मामले में नपेंगे.
खगड़िया : ऋण ठगी के दो मामले सामने आये हैं. पहले मामले में अलौली प्रखंड के हथवन गांव के पांच ऋण धारकों ने तीन मार्च को शपथ पत्र देकर बैंक की मदद से विधायक के पिता द्वारा ऋण की आधी से अधिक राशि ठगी करने का आरोप लगाया गया था. वहीं दूसरा मामला 10 मार्च को सामने आया. जब सदर प्रखंड के मथार, रहीमपुर सहित कुछ अन्य जगहों के 27 ऋणधारकों ने शपथ पत्र देकर विधायक तथा इनके पिता पर ऋण की राशि गवन कर लेने का आरोप लगाया था.
इन दोनों मामलो की जांच चल रहीं है. एक मामले में जहां एसबीआइ के जिला समन्वयक से रिपोर्ट मांगी गयी है. वहीं दूसरे मामले में सदर एसडीओ को जांच करने की जिम्मेवारी दी गयी है. इनदोनों चौकाने वाले मामले सामने आने के बाद एसबीआइ की एडीबी शाखा प्रबंधक की भूमिका सवालों के घेरे में आ गयी है.
बैंक गलियारों में इस बात की चर्चा आम है. कि बैंक के किसी एक पदाधिकारी नहीं बल्कि कुछ अन्य लोगों की मदद से इस ठगी के कार्य को अंजाम दिया गया . क्योंकि बैंक में शाखा प्रबंधक के साथ साथ सभी कर्मियों की अलग अलग भूमिका तय है.
ऐसे में अगर पीड़ित कर्जदारों के आरोप जांच में सत्य पाये गये तो शाखा प्रबंधक के साथ साथ बैंक के फिल्ड ऑफिसर एवं वहां तैनात कैसियर की भी मुश्किले बढ़ सकती है. क्योंकि ऋण आवेदनों की जांच आम तौर पर किसी बैंक में फिल्ड ऑफिसर के द्वारा ही की जाती है. ऐसे में यह सवाल उठता है. कि बैंक ने कितने अयोग्य लोगों को ऋण की स्वीकृति दी है. स्वीकृति के पूर्व फिल्ड ऑफिसर ने जांच की थी अथवा नहीं .
तथा कितने आयोग्य लोगों के ऋण आवेदन की स्वीकृति की अनुशंसा फिल्ड ऑफिसर के द्वारा की गयी थी . जानकार बताते है कि यूं ही बैंक किसी को ऋण मुहैया नहीं कराती है. ऋण देने के पूर्व बैंक इस बात की पूरी तहकीकात करती है कि ऋण लेने वाला व्यक्ति ऋण प्राप्त करने की पात्रता रखता है अथवा नहीं तथा वह व्यक्ति किस कार्य के लिए ऋण ले रहा है. ऐसे कई बिंदू है. जिसकी जांच बैंक के फिल्ड ऑफिसर के द्वारा की जाती है. जांच के बाद ही शाखा प्रबंधक के द्वारा ऋण आवेदनों की जांच करायी थी अथवा नहीं.
इस दोनों मामलों में भुगतान में गड़बड़ी के आरोप लगाये गये है ऐसे में बैंक के कैसियर की भूमिका भी सवालों के घेरे में आ गयी है. शिकायतकर्ता सह शपथकर्ता धरम यादव, मानो देवी, जयमाला देवी, सियाराम पासवान, संतोष, मुननी, फुना, देवकी देवी, रानी देवी, प्रमिला देवी, सरिता देवी, सहित 27 ऋण धारकों ने यह शिकायत की है. कि उन्हें 50 हजार रुपये ऋण की स्वीकृति दी गयी थी. जबकि मात्र 8 से 10 हजार रुपये ही मिले है .
इसी तरह हथवन के चार लोगों ने एक लाख के ऋण के विरुद्ध मात्र 40 हजार रुपये ही प्राप्त होने की बातें कहीं है. ज्ञात हो कि निकासी पंजी भरने के बाद कोई भी व्यक्ति काउंटर पर कैरियर के बाद उस पंजी को जमा करता है. तथा वहीं से लोगों को राशि दी जाती है. इन दोनों मामले में पीड़ित लोगों के द्वारा कम राशि दिये जाने की बातें कहीं गयी है.
जिससे कैसियर की भूमिका भी संदिग्ध लगने लगी है. हालांकि जांच के बाद ही स्पष्ट हो पायेगा कि कैसियर ने इनलोगों को कम राशि दी थी या फिर पिछले दरवाजे से इनलोगों के ऋण की राशि का भुगतान किया गया था. फिलहाल तो सभी आरोपी यानी विधायक के पिता, बैंक के शाखा प्रबंधक अपने को पाक साफ बता रहें है. इनके अनुसार शिकयकर्ता झूठी शिकायत कर रहें है.
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