िजले में बाढ़ ने किसानों व बंटाइदारों की तोड़ी कमर

Published at :26 Aug 2017 5:13 AM (IST)
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िजले में बाढ़ ने किसानों व बंटाइदारों की तोड़ी कमर

बरबादी. सूद पर पैसा लेकर अधिकांश ने की थी खेती दरभंगा : जिले में आयी बाढ़ ने किसानों की कमर तोड़ दी है. लहलहाती फसल बरबाद हो चुकी है. सूद पर पैसा लेकर खेती करने वालों को हालात ने मूक बना दिया है. पशुपालक चारे की व्यवस्था नहीं कर पाने के कारण भूखे मवेशियों को […]

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बरबादी. सूद पर पैसा लेकर अधिकांश ने की थी खेती

दरभंगा : जिले में आयी बाढ़ ने किसानों की कमर तोड़ दी है. लहलहाती फसल बरबाद हो चुकी है. सूद पर पैसा लेकर खेती करने वालों को हालात ने मूक बना दिया है. पशुपालक चारे की व्यवस्था नहीं कर पाने के कारण भूखे मवेशियों को बस निहारते रहते हैं. घरों में पानी होने के कारण विस्थापित होकर लोग सड़क किनारे धूप तथा बरसात का सामना करने को मजबूर हैं. चारा एवं अनाज की किल्लत की वजह से बाढ़ पीड़ित लोग तथा पशु की शक्ति क्षीण हो गयी है. दरभंगा में एकमी के पास बने बाईपास पर
सैंकड़ों लोग प्रतिदिन गुजरते हैं. इनमें अधिकारी भी होते हैं, राजनीतिक दलों के कार्यकर्ता भी और समाजसेवी भी. सड़क किनारे खानाबदोश की जिंदगी में कोई झांकने की जहमत नहीं उठाते. परीक्षण राय कहते हैं कि कल बारिश से भींग गया और आज गर्मी तथा उमस से पसीना निकल रहा है. सूरज की गर्मी में सड़क तप रहा है. उपर झोपडी पर जो प्लास्टिक दे रखा है उससे तो आग बरस रही है. यहां से गुजरने वाले पदाधिकारी एवं जनप्रतिनिधि रुक कर हाल-चाल भी पूछने की जरूरत नहीं समझते. भरत पासवान ने बताया कि इलाके में शत-प्रतिशत फसल की क्षति हो गई है. कई जानवर बाढ़ के पानी में किधर चला गया पता नहीं चल रहा. पानी चढने के साथ ही किसानों ने जान बचाने के लिए मवेशी का रस्सी काट दिया था. मनोज राउत ने बताया कि किसानों- बटाईदारों कि क्षति इतनी जबरदस्त हुई है कि इसकी भरपायी में कई साल लग जाएंगे.
कॉल तक रिसीव नहीं करते जनप्रतिनिधि: जगेश्वर दास ने बताया कि जनप्रतिनिधि मोबाइल उठाने को तैयार नहीं है. अपना दु:ख लोग कहे तो किससे. अधिकारी कोई पास में आते नहीं कि उन्हें परेशानी बतायी जाए. हनुमाननगर प्रखंड के गोढ़ियारी, मुस्तफापुर, लावा टोल, भरौल, मोहम्मदपुर, उधोपट्टी, वसैला आदि के बाढ़़ पीड़ित श्याम दास, चैतु मंडल, कुशो यादव, गणेश कुमार, छोटी देवी, शंकर यादव, शंकर सहनी, मुसाफिर दास, काला मसोमात आदि की भी कुछ यही पीड़ा थी. अधिकांश इनमें किसान या बटायीदार हैं. बताया कि छह हजार रूपये प्रति वीघा खेती मैं पूंजी लगाए थे. सारा का सारा फसल बर्बाद हो चुका है. खाने के लाले पड़े हुए हैं.
क्षति का आकलन करना अबतक शुरू नहीं
तिरपित सहनी कहते हैं कि क्षति का आकलन करने अभी तक पदाधिकारी या कर्मचारी प्रखंड-अंचल से नहीं आया है. निजी संस्थानों द्वारा चूड़ा-गुड़ पॉलिथिन दिया जा रहा है. जब कोई राहत बांटने आता है तो अफरातफरी मच जाती है. कई लोग चोटिल हो गये हैं. वास्तव में जो इसके हकदार हैं वे धक्का खा रहे हैं. राजा यादव का कहना था कि मेडिकल भ्रमणशील टीम या स्वास्थ्य शिविर नजर नहीं आ रहा है.
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