रिसर्च के ''धाम'' में ढल रही शाम

By Prabhat Khabar Digital Desk
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टीएमबीयू l कई शोध केंद्र में लग गये ताले, अब बिहार-झारखंड स्तरीय केंद्र की बारी

भागलपुर : तिलकामांझी भागलपुर विश्वविद्यालय में स्थित रिसर्च के धाम (शोध केंद्र) में शाम ढलती जा रही है. कई शोध केंद्र बंद हो चुके हैं. अब बिहार-झारखंड स्तरीय शोध केंद्र के बंद होने की बारी है. न इन केंद्रों को शुरू करने की कवायद हो रही है और न ही शिक्षक बहाल करने का प्रयास किया जा रहा है, जबकि इन केंद्रों ने एक से बढ़ कर एक शोध कर केंद्र से लेकर राज्य सरकार तक को लाभ पहुंचाया.
रिसर्च केंद्र है, पर यहां शोध नहीं होता : दुनिया भर में मशहूर उपन्यासकार शरतचंद्र चट्टोपाध्याय अपने ही घर में बेगाने की तरह हैं. पूर्व कुलपति प्रो रामाश्रय यादव के समय शरतचंद्र पर रिसर्च कराने के लिए बांग्ला विभाग में एक केंद्र खोला गया था.
नैक मूल्यांकन के दौरान भी नैक टीम को इस केंद्र की कोई उपलब्धि दिखायी नहीं जा सकी. वर्ष 2002 में शरतचंद्र रिसर्च सेंटर का उद्घाटन किया गया था. इस केंद्र का एप्रूवल एकेडमिक काउंसिल, सिंडिकेट व सीनेट से प्राप्त है, लेकिन राजभवन से प्राप्त नहीं है. इस कारण आज तक इसे कोई फंड भी नहीं मिला. मानविकी व एजुकेशन की डीन प्रो ईरा घोषाल ने बताया कि स्थापना के बाद से केंद्र वैसे ही चल रहा है. विभाग की ओर से कोशिश भी नहीं की गयी कि ग्रांट मिले. किसी शिक्षक को भी कभी नियुक्त नहीं किया गया.
दो साल से एक भी प्रोजेक्ट नहीं मिला आरएससी को
रिजनल स्टडी सेंटर में बिहार-झारखंड की आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक, पर्यावरणीय आदि विषयों पर शोध व सर्वे किया जाता रहा है. 1978 में स्थापित इस सेंटर को देश की बड़ी-बड़ी संस्थाएं शोध करने के लिए प्रोजेक्ट देती रही हैं. लेकिन पिछले दो वर्षों से इस केंद्र को एक भी प्रोजेक्ट नहीं मिला है. पूर्व केंद्र इंचार्ज डॉ आरके सिन्हा के कार्यकाल में इसरो ने कार्बन पर शोध करने के लिए प्रोजेक्ट दिया था, जिसे वर्तमान में सेवानिवृत्त प्रो एसएन पांडेय आगे बढ़ा रहे हैं. प्रो पांडेय ने बताया कि बीच में कंप्यूटर की देखभाल ठीक से नहीं होने के कारण पुराना डाटा उड़ गया है. उसे फिर से चढ़वा रहे हैं. उन्होंने बताया कि शिक्षकों की कमी है. इसकी पूर्ति हो जाये, तो केंद्र संवर जायेगा.
नाम रिसर्च सर्विस सेंटर, पर इसमें खोला गया कैंटीन
रिसर्च सर्विस सेंटर. इस केंद्र की स्थापना वर्ष 1986 में हुई थी. उस दौर के शिक्षक बताते हैं कि इस केंद्र को पीजी फिजिक्स विभाग के बगल में खोला गया था. आज इस जगह पर कैंटीन चल रहा है. अब तो कोई नामो-निशान तक नहीं बचा है. उस समय यूजीसी का प्रोजेक्ट आया था. उसी के तहत केंद्र खोला गया था. रिसर्च करनेवालों के बीच को-ऑर्डिनेट करने का काम इस केंद्र का था. केंद्र खुलने के बाद छात्रों व शिक्षकों के बीच यह उम्मीद जगी थी कि नया प्रोजेक्ट आयेगा. उन्हें रिसर्च करने और विभिन्न रिसर्च पर समन्वय करने का मौका मिलेगा, लेकिन यह कुछ दिन ही चल पाया. इसमें कर्मचारी दिये गये थे. बाद में उन्हें भी हटा दिया गया. हालांकि पिछले वर्ष तक इस सेंटर के बजट का उल्लेख विवि के वार्षिक बजट में होता रहा है.
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