Begusarai News : बेगूसराय जिले के स्कूलों में खेलों की जमीनी हकीकत क्या है, यह बेगूसराय के गांधी स्टेडियम में 4 जुलाई को आयोजित जिला स्तरीय बालक-बालिका (अंडर-15 और 17) सुब्रतो मुखर्जी फुटबाॅल टूर्नामेंट बखूबी बयां करता नजर आ रहा है. मजे की बात तो यह है कि प्रतियोगिता में जिले की मात्र दस स्कूली टीमों ने हिस्सा लिया. जिसमें बिहार सरकार की मात्र तीन टीम टीएन हाई स्कूल शालीग्रामी जानकी कुमरी हाई स्कूल बरौनी-1 और मध्य विद्यालय बरौनी के अलावे सीबीएसइ से सम्बद्ध लेफोर्ड इंटरनेशनल स्कूल बछवाड़ा, उड़ान इंटरनेशनल स्कूल बेगूसराय, कृष्णमूर्ति पब्लिक स्कूल पोखरिया, दून पब्लिक स्कूल बेगूसराय ने भाग लिया.
अंडर-15, अंडर-17 वर्ग की विजेता टीमें बेगूसराय का करेंगी प्रतिनिधित्व
प्रतियोगिता की विजेता टीम अंडर-15 बालक वर्ग में मुंगेर, अंडर-17 बालक वर्ग में किशनगंज और अंडर-17 बालिका वर्ग में समस्तीपुर में आयोजित 65वीं सुब्रतो मुखर्जी राज्य स्तरीय प्रतियोगिता में बेगूसराय जिले का प्रतिनिधित्व करेगी.
15 प्रखंडों से एक भी सरकारी स्कूल नहीं पहुंचा
बताते चलें कि बेगूसराय जिले के 18 प्रखंडों में कुल 261 विद्यालयों में लगभग 177 उत्क्रमित माध्यमिक विद्यालय 9 परियोजना बालिका विद्यालय तथा 75 राजकीय/राजकीयकृत उच्च विद्यालय हैं. पूरे जिले से उक्त प्रतियोगिता में मात्र तीन प्रखंड तेघड़ा, बेगूसराय और साहेबपुर कमाल का प्रतिनिधित्व रहा. बाकी के 15 प्रखंडों से एक भी सरकारी स्कूल का भाग न लेना विद्यालयों में खेलों की जमीनी हकीकत बयां करने के लिए काफी है. भला हो इन पब्लिक स्कूलों का जिसने अपनी बालक और बालिका टीम भेजकर प्रतियोगिता से जुड़े पदाधिकारियों की इज्जत बचायी.
10-10 मिनट के मैच में निपटाई गई प्रतियोगिता
विदित हो कि प्रतियोगिता में अंडर-15 के बालक वर्ग में तीन टीम,अंडर-17 बालिका वर्ग में तीन टीम और इसी वर्ग के बालक में चार टीम यानी की कुल दस टीमों ने हिस्सा लिया. समय की कमी और एक ही दिन में सभी मैच करा लेने की आपाधापी में खेल के दौरान सभी खेल नियमों की खुलकर अनदेखी की गयी. सभी मैच 10-10 मिनट का कराया गया और फिर सीधे टाई ब्रेकर का नियम लागू करके औपचारिकता पूरी कर स्कूली बच्चों की प्रतिभा के साथ खिलवाड़ किया गया. गर्मी और उमस के बीच पूरे दिन बच्चे मैदान में गेंद के पीछे भागते रहे. ऐसे ही लोगों के कारण बेगूसराय में फुटबाल का खेल और खेलने वाले बच्चों का भविष्य चौपट हो रहा है. विदित हो कि सुब्रतो मुखर्जी फुटबॉल प्रतियोगिता का मूल उद्देश्य स्कूली छात्रों में छिपी खेल प्रतिभाओं को निखारना और उन्हें राष्ट्रीय स्तर के लिए तैयार करना है.
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खेल नहीं, खर्च बना बड़ी बाधा! सरकारी स्कूलों ने क्यों नहीं भेजीं टीमें?
दरअसल इस प्रतियोगिता से सरकारी विद्यालयों की बेरूखी का एक कारण यह भी है कि इसमें भाग लेने का सारा खर्च विद्यालय को खुद करना होता है. टीम के लिए जर्सी, बूट, मोजा से लेकर आने-जाने, नाश्ता-पानी सहित अन्य खर्च विद्यालय मद से करना होता है. नाम ना बताने की शर्त पर एक शिक्षक ने कहा बेमतलब इतना बखेड़ा कौन मोल लेगा.
अधिकांश सरकारी स्कूलों में नहीं हैं खेल मैदान, खेल गतिविधियां हो रही प्रभावित
बच्चों के लिए पढ़ाई के साथ खेल भी जरुरी है लेकिन कड़वी सच्चाई यह है कि जिले के अधिकांश विद्यालयों में आउटडोर गेम के लिए खेल मैदान का अभाव है. यदि हैं भी तो खस्ताहाल में पड़े हैं. वहां खेलने की बात तो दूर चलने लायक भी नहीं है. अधिकांश स्कूल लंबे समय से संचालित होने के बाद भी विभाग सभी स्कूलों के लिए खेल मैदान की व्यवस्था नहीं करा सका है. इसके चलते क्षेत्र के विद्यालयों में मैदान के बिना खेल गतिविधियां प्रभावित हैं. इसके अलावा खेल संसाधनों की कमी होने से प्रतिभाओं को निखरने का पर्याप्त अवसर नहीं मिल पा रहा है. आज खेल मैदान नहीं होने की वजह से बच्चे व युवा कंप्यूटर, मोबाइल गेम व लैपटाॅप में अपना भविष्य खपा रहे हैं.
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खेल संसाधनों के नाम पर फंड जारी, लेकिन स्कूलों में नहीं दिख रहीं सुविधाएं
संसाधन की कमी का रोना रोते विद्यालयों में बेगूसराय कार्यक्रम पदाधिकारी ने मार्च महीने में सभी स्तर के विद्यालय के प्रधानाध्यापक को विद्यालय स्तर पर खेल सामग्री खरीदने को कहा. इसके लिए प्राथमिक विद्यालय को 5 हजार, मध्य विद्यालय को 10 हजार तथा हाई स्कूल को 25 हजार की राशि आवंटित की गयी. इसके बाद विद्यालय में खेल सामग्री खरीदी गयी या नहीं अथवा सिर्फ कागज पर क्रय हुआ,यह तो जांच का विषय है.
स्कूलों में सिर्फ खानापूर्ति तक सिमटी खेल व्यवस्था
एक समय था जब बेगूसराय जिले में काॅलीजिएट, बीपी हाई स्कूल, जेके हाई स्कूल, मटिहानी, चमड़िया हाई स्कूल बरौनी, मंझौल,शालीग्रामी बलिया सहित अन्य स्कूली टीमों की धमक जिला स्तरीय लीग प्रतियोगिता व सुब्रत कप में हुआ करती थी लेकिन आज इन्हीं स्कूलों में आऊटडोर वाले खेलों की गतिविधियां नहीं के बराबर होती है. मैदान सहित अन्य संसाधनों की कमी के कारण उन्हें प्रैक्टिस के लिए न तो जगह मिल पाता है और न खेल की कोई सुविधा. वहीं स्कूल खेल प्रतियोगिता के दौरान छात्र असमंजस की स्थिति में होते हैं जबकि स्कूल मात्र खानापूर्ति कर अपनी बांकी जिम्मेदारियों से बच निकलते हैं.
आउटडोर खेलों से दूर हो रहे छात्र, जिला स्तरीय प्रतियोगिता पर उठे सवाल
खेल मैदान की कमी से विद्यालयों में स्कूली खेल प्रतियोगिता कराने में विभाग को परेशानी होती है. दूसरे मैदानों में बच्चों को ले जाया जाता है जहां आधी-अधूरी तैयारी के बीच खेल प्रतियोगिता के आयोजन की औपचारिकता निभायी जाती है. हालांकि कुछ विद्यालयों में केवल इंडोर गेम करा सकने भर जगह है.जहां कबड्डी, वाॅलीबाॅल, बैडमिंटन जैसे खेल फिलवक्त जिंदा है, वहीं फुटबाॅल, हाॅकी, क्रिकेट जैसे खेल मैदान के अभाव में दम तोड़ रहे हैं. जबकि कई विद्यालयों में फिजिकल टीचर बेकार बैठकर दिन काट रहे हैं. स्कूलों के बच्चे इनडोर गेम खेल कर ही संतुष्ट हैं. आऊटडोर गेम खेलने से हरेक स्कूल के छात्र-छात्राएं वंचित रह जा रहे हैं. ऐसे में जिला स्तरीय सुब्रत मुखर्जी प्रतियोगिता का आयोजन महज औपचारिकता मात्र है क्योंकि स्कूलों में तो फुटबाॅल कागज और आंकड़ों भर का खेल रह गया है.
क्रीड़ा शुल्क के बावजूद स्कूलों में खेलों की बदहाल स्थिति, छात्र हो रहे प्रभावित
शिक्षा विभाग की ओर से छात्रों से क्रीड़ा शुल्क की वसूली की जाती है. प्राप्त जानकारी के अनुसार शुल्क की आधी राशि ब्लॉक कार्यालय और आधी राशि जिला कार्यालय में जमा की जाती है. प्राथमिक विद्यालयों के लिए ब्लॉक, जिला स्तर पर तथा उच्च प्राथमिक विद्यालयों के लिए जिला स्तरीय प्रतियोगिताएं होती है हालांकि इन विद्यालयों में नियमित रूप से खेल गतिविधियां संचालित नहीं हो पाती हैं. इसके चलते बिना अभ्यास के छात्रों को प्रतियोगिताओं में खेलने ले जाते हैं जहां वे अपना खेल प्रदर्शन सही नहीं दिखा पाते हैं. ऐसी स्थिति में फुटबाॅल की सुब्रतो कप जैसी प्रतिष्ठित प्रतियोगिता में कहां और कैसे स्कूली टीम और उसके खिलाड़ी भाग लेगें, एक यक्ष प्रश्न है.
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