उज्जैन में जन्मे थे ग्रहों में धरा पुत्र मंगल

Updated at :07 Apr 2015 11:24 PM
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उज्जैन में जन्मे थे ग्रहों में धरा पुत्र मंगल

बैशाख बदी अष्टमी से दर्शन, हर मंगल को मंगलनाथ दर्शन यात्र से मिले पुण्य मंगलनाथ मंदिर, मध्य प्रदेश की धार्मिक राजधानी उज्जैन में अवस्थित है. पुराणों के अनुसार उज्जैन नगरी को मंगल की जननी कहा जाता है. ऐसे व्यक्ति जिनकी कुंडली में मंगल भारी रहता है, वे अपने अनिष्ट ग्रहों की शांति के लिए यहां […]

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बैशाख बदी अष्टमी से दर्शन, हर मंगल को मंगलनाथ दर्शन यात्र से मिले पुण्य
मंगलनाथ मंदिर, मध्य प्रदेश की धार्मिक राजधानी उज्जैन में अवस्थित है. पुराणों के अनुसार उज्जैन नगरी को मंगल की जननी कहा जाता है. ऐसे व्यक्ति जिनकी कुंडली में मंगल भारी रहता है, वे अपने अनिष्ट ग्रहों की शांति के लिए यहां पूजा-पाठ करवाने आते हैं.
वैसे तो देश में मंगल भगवान के कई मंदिर हैं, पर उज्जैन इनका जन्मस्थान होने के कारण यहां की पूजा को खास महत्व दिया जाता है. कहा जाता है कि यह मंदिर सदियों पुराना है. सिंधिया राजघराने में इसका पुनर्निर्माण करवाया गया था. उज्जैन शहर को भगवान महाकाल की नगरी कहा जाता है, इसलिए यहां मंगलनाथ भगवान की शिवरूपी प्रतिमा का पूजन किया जाता है. हर मंगलवार को इस मंदिर में श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है.
मंगल ग्रह के जन्म की कथा कुछ इस प्रकार है – अंधकासुर नामक दैत्य को तप के बाद भगवान शिव ने वरदान दिया था कि उसके रक्त से सैकड़ों दैत्य जन्म लेंगे. वरदान पाकर इस दैत्य ने अवंतिका में तबाही मचा दी. तब दीन-दुखियों ने शिव से प्रार्थना की. भक्तों के संकट दूर करने के लिए स्वयं शंभु ने अंधकासुर से युद्ध किया.
दोनों के बीच भीषण युद्ध हुआ. शिव का पसीना बहने लगा. रु द्र के पसीने की बूंद की गर्मी से उज्जैन की धरती फट कर दो भागों में विभक्त हो गयी और मंगल ग्रह का जन्म हुआ. शिवजी ने दैत्य का संहार किया और उसकी रक्त की बूंदों को नवोत्पन्न मंगल ग्रह ने अपने अंदर समा लिया. कहते हैं, इसलिए मंगल की धरती लाल रंग की है. (स्कंद पुराण के अवंतिका खंड से)
मंगलनाथ मंदिर में हर मंगलवार को भक्तों की भीड़ लगी रहती है. लोगों का मानना है कि इस मंदिर में ग्रह शांति करवाने के बाद ग्रहदोष खत्म हो जाता है. ऐसे व्यक्ति जिनकी कुंडली में चतुर्थ, सप्तम, अष्टम, द्वादश भाव में मंगल होता है, वे मंगल शांति के लिए विशेष पूजन-अर्चन करवाते हैं. अमूमन मार्च में पड़नेवाली अंगारक चतुर्थी को मंगलनाथ में विशेष पूजा-अर्चना की जाती है. इस दिन यहां विशेष यज्ञ-हवन किये जाते हैं. इस समय मंगल ग्रह की शांति के लिए लोग दूर-दूर से उज्जैन आते हैं. यहां होनेवाली भातपूजा को भी काफी महत्वपूर्ण माना जाता है. मंगल ग्रह को मूलत: मेष और वृश्चिक राशि का स्वामी माना जाता है.
मंगल दोष दूर करें मंगलनाथ : अगर आप मंगल दोष से परेशान हैं और मंगल दोष ने कर रखा आपका जीना मुहाल, तो उज्जैन में है एक ऐसा मंदिर, जो आपको इस दोष से मुक्ति दिलाता है. उज्जैन को पुराणों में मंगल की जननी कहा गया है. ऐसे व्यक्ति जिनकी कुंडली में मंगल भारी रहता है, वे अपने अनिष्ट ग्रहों की शांति के लिए यहां पूजा-पाठ करवाने आते हैं.
भात पूजा से कटे मंगल दोष : कहा जाता है कि मंगलनाथ के दरबार में भात पूजा से मंगल दोष दूर हो जाता है. जिनकी कुंडली में मंगल भारी होता है, वह मंगल शांति हेतु यहां भात पूजा करवाते हैं. मंगल दोष एक ऐसी स्थिति है, जो किसी जातक की कुंडली में बन जाये, तो उसे बड़ी ही विचित्र परिस्थिति ङोलनी पड़ती है. मंगल दोष कुंडली के किसी भी घर में स्थित अशुभ मंगल द्वारा बनाये जानेवाले दोष को कहते हैं, जो कुंडली में अपनी स्थिति और बल के चलते जातक के जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में समस्याएं उत्पन्न कर सकता है.
मंगल दोष पूरी तरह से ग्रहों की स्थिति पर आधारित है. वैदिक ज्योतिष के अनुसार यदि किसी जातक के जन्म चक्र के पहले, चौथे, सातवें, आठवें और 12वें घर में मंगल हो, तो ऐसी स्थिति में पैदा हुआ जातक मांगलिक कहा जाता है. यह स्थिति विवाह के लिए अत्यंत अशुभ मानी जाती है.
संबंधों में तनाव व बिखराव, घर में कोई अनहोनी व अप्रिय घटना, कार्य में बेवजह बाधा और असुविधा व किसी भी प्रकार की क्षति और दंपती की असामयिक मृत्यु का कारण मांगलिक दोष को माना जाता है.
ज्योतिष शास्त्र की दृष्टि में एक मांगलिक को दूसरे मांगलिक से ही विवाह करना चाहिए. यदि वर और वधू मांगलिक होते हैं, तो दोनों के मंगल दोष एक-दूसरे के योग से समाप्त हो जाते हैं. मूल रूप से मंगल की प्रकृति के अनुसार ऐसा ग्रहयोग हानिकारक प्रभाव दिखाता है, लेकिन वैदिक पूजा-प्रक्रिया के जरिये इसकी भीषणता को नियंत्रित कर सकते हैं. मंगल ग्रह की पूजा से मंगल देव को प्रसन्न किया जाता है तथा मंगल द्वारा जनित विनाशकारी प्रभावों को शांत व नियंत्रित कर सकारात्मक प्रभावों में वृद्धि की जा सकती है.
सती शिरोमणि हैं मां अनुसूया
पुराणों में मां अनुसूया को सती शिरोमणि का दर्जा प्राप्त है. अनसूया मंदिर के निकट अनसूया आश्रम में त्रिदेव (ब्रह्मा, विष्णु व महेश) ने अनुसूया माता के सतीत्व की परीक्षा ली थी. मान्यता के अनुसार एक बार देवर्षि नारद ने त्रिदेवियों (सरस्वती, लक्ष्मी व पार्वती) से कहा कि तीनों लोकों में अनुसूया से बढ़ कर कोई सती नहीं है. नारद मुनि की बात सुन कर त्रिदेवियों ने त्रिदेवों को अनसूया के सतीत्व की परीक्षा लेने मृत्युलोक भेजा. तीनों देवता अनुसूया आश्रम में साधु वेष में आये और मां अनुसूया से नग्नावस्था में भोजन करवाने को कहा. साधुओं को बिना भोजन कराये सती मां वापस भी नहीं भेज सकती थीं.
तब मां अनुसूया ने अपने पति अत्रि ऋषि के कमंडल से तीनों देवों पर जल छिड़क कर उन्हें शिशु रूप में परिवर्तित कर दिया और स्तनपान कराया. कई सौ सालों तक जब तीनों देव अपने लोकों में नहीं लौटे, तो चिंतित होकर तीनों देवियां अनुसूया आश्रम पहुंचीं तथा मां अनुसूया से क्षमा याचना कर तीनों देवों को उनके मूल स्वरूप में प्रकट करवाया. तब से उत्तराखंड के गोपेश्वर धाम में सती मां अनसूया को पुत्रदायिनी के रूप में पूजा जाता है.
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