कवयित्री भी थीं नगरवधू आम्रपाली, पढ़ें उनकी कुछ कविताएं

By Prabhat Khabar Digital Desk
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-ध्रुव गुप्त-

गौतम बुद्ध के काल में और उनके बाद प्रचुर बौद्ध साहित्य रचा गया. पाली भाषा में रचित ज्यादातर पद्यात्मक रचनाएं बुद्ध के जीवन, समय और उनकी शिक्षाओं पर केंद्रित हैं. इनमें से ज्यादातर रचनाएं इतिवृत्तात्मक हैं, लेकिन उनमें कहीं-कहीं कवित्व की झलक भी मिल जाती है. बौद्ध साहित्य में दो ग्रन्थ ऐसे हैं जिनमें सिर्फ कविताएं हैं. पहला ग्रन्थ है 'थेरागाथा' जिसमें बौद्ध भिक्षुओं की कविताएं संग्रहित हैं और दूसरा ग्रन्थ है 'थेरीगाथा' जिसमें बौद्ध भिक्षुणियों की काव्य रचनाओं को जगह दी गई है. दोनों ग्रंथों की कविताएं बेहद सीधी-सादी हैं जिनमें कविता के उच्च मानदंडों की तलाश सही नहीं होगी. इन कविताओं में बौद्ध भिक्षुओं और भिक्षुणियों ने अपने जीवन-संघर्षों, अनुभवों तथा जीवन से उपजे वैराग्य को सरल शब्द दिये हैं. 'थेरीगाथा' में वैसे तो दर्जनों भिक्षुणियों की कविताओं को जगह मिली है, लेकिन अनुभवों की गहराई और गहन संवेदना के कारण जो दो कवयित्रियां सबसे ज्यादा प्रभावित करती हैं, वे हैं बुद्ध के काल की दो सबसे ज्यादा चर्चित स्त्रियां - आम्रपाली और सुजाता.
आम्रपाली के जीवन और उसके अंत के बारे में सब जानते हैं. वह बौद्ध ग्रंथों की ही नहीं, भारतीय इतिहास और संस्कृति की सबसे चर्चित व्यक्तित्वों में एक रही हैं. वैशाली की नगरवधू, देश के इतिहास की सबसे चर्चित गणिका, लिच्छवियों की सबसे काम्य स्त्री, बिम्बिसार की प्रेमिका, अजातशत्रु की शत्रु और अपनी ढलती उम्र में गौतम बुद्ध के संघ में उनके जीवन काल में सम्मिलित होने वाली बौद्ध भिक्षुणी आम्रपाली उर्फ अम्बपाली एक कवयित्री भी थी, यह तथ्य बहुत कम लोगों को पता है. बौद्ध ग्रन्थ 'थेरीगाथा' की नौंवी किताब में कुछ अन्य बौद्ध भिक्षुणियों के साथ आम्रपाली की कविता भी संकलित है. प्रस्तुत है देह की क्षणभंगुरता के बोध के बीच शाश्वत सत्य की खोज करती उनकी पाली भाषा में लिखी कविता का ध्रुव गुप्त द्वारा अंग्रेजी से किया गया अनुवाद !
कवयित्री भी थीं नगरवधू आम्रपाली, पढ़ें उनकी कुछ कविताएं
कभी काले हुआ करते थे मेरे बाल
मधुमक्खियों के छत्ते जैसे
घने और घुंघराले
सुगंधित फूलों से भरी टोकरी की तरह
सोने के पिन से सजे और अलंकृत
उम्र के साथ इससे पशुओं के फर-सी
बासी गंध आ रही है
एक कलाकार की कलाकृति जैसी
मेरी मोटी, घुमावदार और रसीली गर्दन
उम्र के साथ ढल चुकी है नीचे
मेरी दीप्तिमान, गहरी, भावपूर्ण आंखें
खो चुकी हैं अपनी चमक
पतली पर्वत-चोटी की तरह मेरी नाक
एक सूखी लंबी मिर्च जैसी है.अब
अद्वितीय थे कभी जो मेरे कान
उम्र के साथ सिलवटें लिए
नीचे ढल चुके हैं
मेरे श्वेत और चमकते दांत
पीले पड़कर टूट रहे हैं
मेरे उन्नत कुशाग्र स्तन हो चले हैं
किसी खाली पुराने झोले की तरह
लुंज-पुंज
गहरे घने जंगल में
कोयल की कूक की तरह
मेरी मीठी आवाज में
उम्र के साथ दरारें पड़ चुकी हैं
झुर्रियों से भरी मेरी काया
अब कमनीय नहीं रही
देह की सच्चाई बदल चुकी है
मायावी वस्तुओं के इस ढेर को
एक दिन तो भरभरा कर गिरना ही था
मुझे तलाश है उसकी
जो क्षणभंगुरता से परे है
मुझे उस सत्य तक ले चलो, तथागत !
'थेरीगाथा' में जो दूसरी कविता सबसे ज्यादा ध्यान आकृष्ट करती है, वह है सुजाता की कविता. बुद्ध की कथाओं की सुजाता को हम उस स्त्री के तौर पर ही जानते हैं जिसने कठोर तप के कारण मरणासन्न बुद्ध को खीर खिलाकर उन्हें नया जीवन और जीवन के प्रति एक संतुलित दृष्टि दी थी. इस प्रसंग के अतिरिक्त भी बौद्ध-ग्रंथों में सुजाता के जीवन, उसके ह्रदय परिवर्तन और अंत के बारे में कुछ दूसरे प्रसंग भी हैं जिससे ज्यादा लोग परिचित नहीं हैं. सुजाता बोधगया के पास सेनानी ग्राम के एक साहूकार अनाथपिण्डिका की पुत्रवधू थी. अत्यंत अहंकारी, वाचाल और उद्दंड. अपने पति और ससुराल के लोगों से उसका रिश्ता बहुत कटु था. एक अरसे तक उसे संतान की प्राप्ति नहीं हुई तो उसने मनौती मांगी थी कि पुत्र होने के बाद वह गांव के निकट के पीपल के वृक्ष-देव को खीर चढ़ाएगी.

संयोग से इस मनौती के बाद उसे एक पुत्र की प्राप्ति हुई. पुत्र होने के बाद जब वह खीर चढ़ाने पीपल के पास पहुंची तो वृक्ष नीचे तपस्या में रत कृशकाय बुद्ध को देखकर उन्हें वृक्ष का देवता समझ बैठी. सुजाता ने उनका परिचय पूछा और उनकी जर्जर हालत देखकर उन्हें खीर और शहद अर्पण करते हुए कहा- ‘जैसे मेरी पूरी हुई, आपकी भी मनोकामना पूरी हो.' मरणासन्न बुद्ध ने नदी में स्नान करने के बाद खीर खाकर 49 दिनों का अपना उपवास तोड़ा. उस दिन बुद्ध को लगा कि तपस्या की अति में वे आजतक अपनी देह से अनाचार ही करते रहे थे. उस देह से जो ज्ञान तक ले जाने की सीढ़ी है. पहली बार उन्हें बोध हुआ कि अति किसी भी वस्तु की ठीक नहीं - न भोग की, न योग की.

जिस पीपल वृक्ष के नीचे सिद्धार्थ को यह बोध मिला वह बोधिवृक्ष कहलाया और गया नगर के पास का वह क्षेत्र बोधगया के नाम से प्रसिद्ध हुआ. ज्ञान-प्राप्ति के बाद उपदेश देने के उद्धेश्य से एक दिन बुद्ध सुजाता के गांव सेनानी में थे. प्रवचन के बाद खीर के लिए आभार प्रकट करने जब वे सुजाता के घर गए तो घर के भीतर से लड़ाई-झगड़े का शोर उठ रहा था. बुद्ध के आगमन की सूचना पाकर सुजाता के श्वसुर अनाथपिण्डिका बाहर आए. उन्होंने बुद्ध से क्षमा-याचना करते हुए उन्हें बताया कि उनकी बहू सुजाता घर में सास-ससुर-पति किसी की भी नहीं सुनती. उसमें बड़े कुल की बेटी होने का अभिमान है और वह ससुराल के लोगों के साथ अपमानजनक व्यवहार करती है. बुद्ध ने सुजाता को बुलाकर उसे स्त्रियों के कर्तव्य बताएं और सफल गृहस्थ जीवन के सूत्र दिए. बुद्ध की बातें सुनकर सुजाता को अपनी भूल का बोध हुआ. उसने परिवार में सबसे सबसे क्षमा मांगते हुए बुद्ध को आश्वासन दिया कि वह अपने स्वभाव में परिवर्तन लाएगी और भविष्य में सभी का सम्मान करेगी.

कवयित्री भी थीं नगरवधू आम्रपाली, पढ़ें उनकी कुछ कविताएं
इस घटना के बाद भी बुद्ध और सुजाता की भेट के दो संदर्भ मिलते हैं. अपने जीवन के उत्तरार्द्ध में सुजाता साकेत के एक मठ में बुद्ध का प्रवचन सुनने गई थी. बुद्ध के प्रभामंडल से वह इतना प्रभावित हुई कि वह बुद्ध से धर्म की दीक्षा लेकर बौद्ध भिक्षुणी बन गई. दीक्षा लेने के बाद वर्षों तक वह साकेत में तपस्विनी का जीवन जीती रही थी. बौद्ध ग्रंथों में एक बार और उसका उल्लेख आया है जब वह वैशाली के पास स्थित एक आश्रम में बुद्ध से अंतिम बार मिली थी. इसी आश्रम में बुद्ध की उपस्थिति में ही उसने अंतिम सांस ली थी. सुजाता की जो कविता 'थेरीगाथा' में है उसमें उसने सांसारिकता की व्यर्थता को रेखांकित करते हुए निर्वाण की दिशा में अपनी यात्रा के अनुभवों को भविष्य की भिक्षुणियों के मार्गदर्शन के लिए साझा किया है. सुजाता की उस एकमात्र उपलब्ध कविता का मेरे द्वारा अंग्रेजी से किया गया भावानुवाद आप भी देखें !
खूबसूरत, झीने, अनमोल परदों में
चंदन-सी सुगंधित
बहुमूल्य आभूषणों और
पुष्प मालाओं से सजी
घिरी हुई दास-दासियों
दुर्लभ खाद्य और पेय से
मैंने जीवन के सभी सुख
सभी ऐश्वर्य, सभी क्रीड़ाएं देखी
लेकिन जिस दिन मैंने
बुद्ध का अद्भुत प्रकाश देखा
झुक गई उनके चरणों में
और देखते-देखते
मेरा जीवन परिवर्तित हो गया
उनके शब्दों से मैंने जाना
कि क्या होता है धम्म
कैसा होता है वासनारहित होना
इच्छाओं से परे हो जाने में
क्या और कैसा सुख है
और अमरत्व क्या होता है
बस उसी दिन मैंने पा लिया
एक ऐसा जीवन
जो जीवन के दुखों से परे है
और एक ऐसा घर
जिसमें घर है ही नहीं !



लेखक का परिचय :ध्रुव गुप्त का जन्म 1 सितंबर, 1950 को बिहार के गोपालगंज में हुआ. पटना में इनका स्थायी निवास है. भारतीय पुलिस सेवा के पूर्व अधिकारी रहे हैं. कवि, ग़ज़लगो, कथाकार और फीचर लेखक. अब तक छह पुस्तकें - 'कहीं बिल्कुल पास तुम्हारे', 'जंगल जहां ख़त्म होता है', 'मौसम जो कभी नहीं आता' (कविता संग्रह), 'मुठभेड़' (कहानी संग्रह), 'एक ज़रा सा आसमां', 'मौसम के बहाने', मुझमें कुछ है जो आईना सा है'(ग़ज़ल संग्रह) प्रकाशित.संपर्क - 8210037611 / ईमेल dhruva.n.gupta@gmail.com
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