Ramdas Soren : जेएमएम के समर्पित साइलेंट वर्कर थे रामदास सोरेन, शिबू सोरेन काफी करीबी रहे

Ramdas Soren : झारखंड में गुरुजी शिबू सोरेन के निधन का मातम अभी खत्म भी नहीं हुआ था कि जेएमएम के जीवट नेता और पार्टी के सबसे विश्वसनीय कार्यकर्ता रामदास सोरेन इस दुनिया को अलविदा कह गए. शिबू सोरेन के सबसे करीबी, लेकिन पर्दे के पीछे रहने वाले पार्टी के समर्पित नेता थे रामदास सोरेन.

Ramdas Soren : झारखंड के शिक्षा मंत्री रामदास सोरेन का निधन शुक्रवार रात को दिल्ली में हो गया. उनके जाने से उनकी पार्टी झारखंड मुक्ति मोर्चा को एक बड़ा झटका लगा है. जेएमएम अभी दिशोम गुरु के जाने के सदमे से उबरने की कोशिश कर ही रहा था कि तबतक उनका एक साइलेंट वर्कर, जिसने आजीवन संगठन को मजबूत करने के लिए काम किया, उनका निधन हो गया. रामदास सोरेन गुरुजी शिबू सोरेन के सबसे करीबी लोगों में से एक माने जाते थे. उनके निधन की सूचना पर मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने, जो फिलहाल अपने पैतृक गांव नेमरा में हैं और पिता का श्राद्धकर्म कर रहे हैं, उन्होंने दुख जताया है.

रामदास सोरेन के जाने से जेएमएम को लगा बड़ा झटका

रामदास सोरेन जेएमएम के ऐसे कद्दावर नेता थे, जिन्होंने हमेशा पर्दे के पीछे से काम किया. उन्होंने कभी भी नाम के लिए राजनीति नहीं की. वे हमेशा संगठन को मजबूत करने में जुटे रहते थे. पूर्वी सिंहभूम जिले के घोड़ाबांधा के रहने वाले रामदास सोरेन बहुत ही सरल और सहज थे.वरिष्ठ पत्रकार अनुज सिन्हा रामदास सोरेन के बारे में बात करते हुए कहते हैं कि वे झारखंड आंदोलन के दौरान सिंहभूम जिले के सबसे विश्वसनीय नेताओं में से एक थे. इनके लिए काम सर्वोपरि था. 1990-91 के दौरान आर्थिक नाकेबंदी के वक्त पुलिस ने रामदास सोरेन को थाने में बहुत प्रताड़ित भी किया था. लेकिन वे टूटे नहीं और संगठन के लिए काम करते रहे. सिंहभूम जिला जब विभाजित हो गया, तब उन्हें पूर्वी सिंहभूम का जिलाध्यक्ष बनाया गया था. रामदास सोरेन मजदूरों के भी नेता थे और उन्होंने हमेशा उनके हक के लिए आवाज बुलंद की. उनका जाना पार्टी के लिए बड़ा नुकसान है.

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जादूगोड़ा के यूरेनियम माइंस के खिलाफ किया था संघर्ष

रामदास सोरेन गुरुजी शिबू सोरेन के विचारों से बहुत प्रभावित थे. उन्होंने ना सिर्फ पार्टी के लिए काम किया, बल्कि वे सामाजिक मुद्दों पर के लिए भी बहुत काम करते थे. सोशल एक्टिविस्ट रतन तिर्की ने प्रभात खबर से बात करते हुए बताया कि रामदास सोरेन ने जादूगोड़ा यूरेनियम माइंस के खिलाफ आंदोलन किया था. घटना यह थी कि यूरेनियम माइंस का जो कचरा टेलिंग पौंड में जमा होता था, वह वहां से रिसकर खेतों में जाता था, जिसकी वजह से बच्चों में विकलांगता की समस्या उत्पन्न हो रही थी. इस समस्या के खिलाफ उन्होंने अभियान चलाया था. उन्होंने एक मीटिंग के दौरान यूसीआईएल के पदाधिकारियों को चेताते हुए कहा था कि यूरेनियम का विकिरण आदिवासी समाज के अस्तित्व पर खतरा है, इस समस्या का समाधान तलाशा जाए. रामदास सोरेन के नहीं रहने से झामुमो ने अपना एक और मजबूत स्तंभ खो दिया है. संताल आदिवासियों के बीच उनकी पकड़ बहुत मजबूत थी.

साधारण परिवार से आते थे रामदास सोरेन

रामदास सोरेन एक बहुत ही साधारण परिवार से आते थे. उनकी शिक्षा जमशेदपुर से हुई थी. वे घाटशिला विधानसभा क्षेत्र से तीन बार विधायक चुने गए थे. 2009–2014, 2019– 2024 और 2025 के चुनाव में भी वे विजयी हुए थे. संघर्ष और जनसेवा के माध्यम से वे धीरे-धीरे राजनीति के शीर्ष पायदान तक पहुंचे . वे आदिवासी अधिकारों और शिक्षा सुधार के लिए दृढ़ता से काम करते रहे थे.

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By Rajneesh anand

रजनीश आनंद प्रभात खबर में सीनियर चीफ कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत हैं और पत्रकारिता के क्षेत्र में 25 वर्षों से अधिक का अनुभव रखती हैं.फिलहाल वे प्रभात खबर के ओरिजिनल, नेशनल, इंटरनेशनल और खेल कैटेगरी के लिए राइटिंग का काम करती हैं. उनकी पहचान फैक्ट बेस्ट रिपोर्टिंग, रिसर्च बेस्ड स्टोरी और एक्सप्लेनर लेखन के लिए है.

राजनीति, सामाजिक सरोकार, ग्रामीण विकास, महिला मुद्दों, इतिहास, खेल, जनजातीय समाज और सार्वजनिक नीतियों से जुड़े विषयों पर उनकी विशेष रुचि रही है. वैसे मुद्दे जो समाज के हाशिये पर मौजूद समुदायों और आम लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं, लेकिन मुख्यधारा की बहस में अपेक्षाकृत कम जगह पाते हैं, ऐसे विषयों पर भी लेखन में रुचि रखती हैं.

रजनीश आनंद कई प्रतिष्ठित पत्रकारिता फेलोशिप से जुड़ी रही हैं. इन्क्लूसिव मीडिया–यूएनडीपी फेलोशिप के तहत उन्होंने झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) जिले में माहवारी स्वच्छता और किशोरियों एवं महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों पर अध्ययन एवं रिपोर्टिंग की. झारखंड सरकार मीडिया फेलोशिप के दौरान महिला सशक्तिकरण, सरकारी योजनाओं के प्रभाव और सामाजिक बदलाव के विभिन्न आयामों पर काम किया. इसके अलावा सेव द चिल्ड्रन फेलोशिप के तहत बच्चों के अधिकार, शिक्षा, सुरक्षा और बाल कल्याण से जुड़े मुद्दों पर गहन रिपोर्टिंग की है.

आदिवासी समाज, विशेषकर मुंडा जनजाति के इतिहास, संस्कृति और समकालीन चुनौतियों पर उनका काम उल्लेखनीय माना जाता है. उन्होंने भूमि, पहचान, परंपरा, सामाजिक बदलाव और आदिवासी समुदायों के अधिकारों से जुड़े विषयों पर व्यापक फील्ड रिपोर्टिंग की है.हाल के वर्षों में उन्होंने झारखंड में ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) और जस्ट ट्रांजिशन की अवधारणा पर भी काम किया है. विशेष रूप से कोयला आधारित अर्थव्यवस्था वाले क्षेत्रों में रोजगार, आजीविका और सामाजिक प्रभावों से जुड़ी चुनौतियों पर उनकी रिपोर्टिंग ने महत्वपूर्ण सवाल उठाए हैं.

रजनीश आनंद झारखंड की राजधानी रांची में रहती हैं और इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक हैं. उन्होंने वर्ष 2000 में पत्रकारिता की शुरुआत झारखंड जागरण दैनिक से की. इसके बाद प्रभात खबर, हिंदुस्तान, रांची एक्सप्रेस और दैनिक जागरण सहित कई प्रमुख समाचार संस्थानों के लिए रिपोर्टिंग और स्वतंत्र लेखन किया. प्रिंट मीडिया के दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक और सांध्य प्रकाशनों में काम करने के साथ-साथ वे वर्ष 2012 से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं.

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