रांची से रजनीकांत पांडेय की रिपोर्ट
Valentines Day Special: डिजिटल दौर में जहां रिश्ते मोबाइल स्क्रीन पर बनते और टूटते हैं, वहीं एक ऐसी प्रेम कहानी भी है जिसने समय, दूरी और सामाजिक बंधनों को चुनौती दी. यह कहानी है ओडिशा के एक दलित परिवार में जन्मे कलाकार प्रद्युम्न कुमार महानंदिया यानी पीके की, जिन्होंने अपने प्यार को पाने के लिए साइकिल से 11 हजार किलोमीटर का सफर तय कर दुनिया को चौंका दिया.
अभावों में बीता बचपन, अपमान से जन्मा आत्मबल
पीके का बचपन अभावों और सामाजिक भेदभाव के बीच बीता. स्कूल में उन्हें बाकी बच्चों के साथ बैठने की अनुमति नहीं थी, क्योंकि वे दलित परिवार से थे. ‘अछूत’ कहकर पुकारा जाना उनकी दिनचर्या का हिस्सा था. मंदिर के पास जाने पर पत्थर फेंके जाते. लेकिन उनकी मां ने एक दिन उनकी गुलेल जला दी और कहा- पत्थरों को लौटाने के बजाय उन्हें इकट्ठा करो, उन्हीं से अपनी सीढ़ियां बनाओ. यही सीख उनके जीवन का आधार बनी. कला के प्रति लगाव उन्हें आगे बढ़ाता गया. छात्रवृत्ति मिली और उन्होंने खल्लिकोते कॉलेज ऑफ आर्ट एंड क्राफ्ट्स, शांतिनिकेतन और फिर दिल्ली कॉलेज ऑफ आर्ट तक का सफर तय किया.
कनॉट प्लेस की मुलाकात, जिसने बदल दी जिंदगी
वर्ष 1975. इमरजेंसी का दौर. नई दिल्ली के कनॉट प्लेस के सेंट्रल पार्क में पीके राहगीरों के स्केच बनाते थे. 10 मिनट में 10 रुपये उनका उसूल था. एक दिन वहां 19 वर्षीय स्वीडिश युवती चार्लोट वॉन शेडविन आईं. सुनहरे बाल, नीली आंखें और जिज्ञासा से भरी नजरें. उन्होंने अखबार में पढ़ा था कि पीके प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और अंतरिक्ष यात्री वेलेंटीना तेरेशकोवा तक का चित्र बना चुके हैं. पहली मुलाकात में ही पीके घबरा गए. हाथ कांप रहे थे. चित्र अधूरा रह गया. लेकिन चार्लोट अगले दिन फिर आईं. तीन दिन तक वे स्केच बनवाती रहीं.
नजरों से नजरों का पहला प्यार
स्केच बनाते-बनाते दोनों के बीच अनकहा रिश्ता पनपने लगा. भाषाएं अलग थीं, लेकिन दिल की भाषा एक थी. पीके ने उनसे राशि पूछी. जवाब मिला- वृषभ. उन्हें बचपन में मां की कही बात याद आई कि उनकी शादी वृषभ राशि की लड़की से होगी, जो दूर देश से आएगी और संगीत जानती होगी. चार्लोट ने बताया कि वे पियानो बजाती हैं और उनके परिवार के पास जंगल भी है. पीके ने सहज भाव से कह दिया- आप ही मेरी जीवनसाथी हैं. यह आसमान में लिखा है.
ओडिशा में पारंपरिक विवाह
चार्लोट ने संबंध को आगे बढ़ाने से पहले पीके के गांव कंधापड़ा जाने की इच्छा जताई. साड़ी पहनकर वे उनके परिवार से मिलीं. आशीर्वाद के साथ ओडिया परंपरा से विवाह हुआ. इसके बाद दोनों कोणार्क मंदिर भी गए. लेकिन यह खुशी ज्यादा दिन नहीं रही. चार्लोट को पढ़ाई पूरी करने स्वीडन लौटना पड़ा. उन्होंने पीके को साथ चलने का प्रस्ताव दिया, टिकट देने की भी पेशकश की. पर पीके ने कहा- मैं खुद आऊंगा, तुम बस इंतजार करना.
प्रेम की अग्निपरीक्षा, साइकिल से 11 हजार किमी का सफर
जनवरी 1977. पीके ने अपनी सारी जमा पूंजी जुटाकर 80 डॉलर इकट्ठा किए और एक पुरानी साइकिल खरीदी. 22 जनवरी को दिल्ली से स्वीडन की यात्रा शुरू की. करीब 11 हजार किलोमीटर का सफर तय किया. अमृतसर से वाघा बॉर्डर, फिर अफगानिस्तान, ईरान, तुर्की, बुल्गारिया, यूगोस्लाविया, ऑस्ट्रिया, जर्मनी, डेनमार्क होते हुए स्वीडन पहुंचे. रोज लगभग 70 किलोमीटर साइकिल चलाते. कभी सड़क किनारे सोना पड़ता, कभी राहगीर खाना दे देते. खर्च के लिए चित्र बनाते. पैरों में असहनीय दर्द, लेकिन मन में प्रेम की ऊर्जा होती. चार महीने तीन सप्ताह बाद 28 मई 1977 को वे स्वीडन की सीमा में दाखिल हुए. अधिकारियों को विश्वास नहीं हुआ कि कोई भारत से साइकिल चलाकर आया है. जब चार्लोट को बुलाया गया और वे आमने-सामने हुए, तो शब्द नहीं थे, सिर्फ आंसू थे.
स्वीडन में नया जीवन
चार्लोट के परिवार ने दोनों के प्रेम को स्वीकार किया. आधिकारिक विवाह हुआ और वे स्वीडन में बस गए. उनके दो बच्चे सिद्धार्थ और एमेले हुए. पीके ने वहां कला और योग सिखाना शुरू किया. 2012 में उन्हें प्रतिष्ठित नॉर्डिक सम्मान मिला. वे स्वीडन सरकार के कला-संस्कृति सलाहकार भी रहे. आज 74 वर्षीय पीके ओडिशा संस्कृति के राजदूत माने जाते हैं.
पीके की कहानी पर बनी डॉक्यूमेंट्री
उनकी प्रेम कहानी पर ऑस्कर विजेता निर्देशक ऑर्लैंडो वॉन आइंसिडेल ने डॉक्यूमेंट्री ‘द साइकिल ऑफ लव’ बनाई. 30 अगस्त 2025 को अमेरिका के फिल्म फेस्टिवल में इसका वर्ल्ड प्रीमियर हुआ. इस प्रोजेक्ट से प्रियंका चोपड़ा और निक जोनस भी एक्जीक्यूटिव प्रोड्यूसर के रूप में जुड़े. स्वीडिश पत्रकार पेर जे एंडरसन ने उनकी कहानी पर किताब भी लिखी.
ओडिशा और झारखंड से अटूट जुड़ाव
पीके को भुवनेश्वर के उत्कल संस्कृति विश्वविद्यालय ने मानद डॉक्टरेट से सम्मानित किया. उन्होंने दलित और वंचित बच्चों के लिए छात्रवृत्ति कार्यक्रम चलाए. उनका परिवार आज भी ओडिशा और झारखंड से जुड़ा है. रिश्तेदार रांची और घाटशिला में रहते हैं. पीके जब भी भारत आते हैं, अपनी मिट्टी से जुड़ाव जताना नहीं भूलते.
पत्थरों से सीढ़ियां बनाने की सीख
पीके कहते हैं- जब शिक्षक ने मुझे कक्षा के बाहर बैठाया, तभी समझ गया कि समाज मुझे अलग मानता है. लेकिन उसी अपमान ने मुझे मजबूत बनाया. आज उनकी कहानी सिर्फ प्रेम कथा नहीं, बल्कि साहस, आत्मसम्मान और दृढ़ संकल्प की मिसाल है. साइबर लव के इस युग में जहां रिश्ते वर्चुअल हो गए हैं, वहां साइकिल से सात समंदर पार पहुंचा यह प्यार याद दिलाता है कि सच्चा प्रेम त्याग, विश्वास और धैर्य मांगता है.
इसे भी पढ़ें: जमशेदपुर के बारीगोड़ा-गोविंदपुर के लोगों के लिए खुशखबरी, रेलवे फाटक पर जल्द बनेगा ओवरब्रिज
प्रेम, कला और विश्वास की विरासत
पीके और चार्लोट की कहानी आज भी जारी है. यह सिर्फ दो व्यक्तियों का मिलन नहीं, बल्कि दो संस्कृतियों का संगम है. कला ने उन्हें जोड़ा, विश्वास ने संभाला और प्रेम ने अमर बना दिया. उनकी साइकिल यात्रा आने वाली पीढ़ियों को सिखाती है कि यदि इरादे मजबूत हों, तो दूरी मायने नहीं रखती. प्रेम किसी सीमा, भाषा या वर्ग का मोहताज नहीं होता. यह कहानी साबित करती है कि सच्चा प्यार आज भी जिंदा है, बस उसे निभाने का साहस चाहिए.
इसे भी पढ़ें: लातेहार में 7000 घूस लेते धरा गए अमीन साहेब, पलामू एसीबी टीम ने किया गिरफ्तार
