क्या खालिदा के बेटे तारिक रहमान भारत–बांग्लादेश संबंधों को देंगे ऊंचाई या कायम रहेगी अराजकता

Bangladesh Election Results : 5 अगस्त 2024 को बांग्लादेश में जेन जी मूवमेंट के बाद प्रधानमंत्री शेख हसीना ने इस्तीफा दे दिया और भारत में शरण ली. बांग्लादेश में अराजकता की स्थिति थी और युवा गुस्से में था. युवाओं को रोजगार चाहिए, जो उन्हें मिल नहीं रहा था, वे सरकार की आरक्षण नीति का विरोध कर रहे थे. पूरे डेढ़ बरस बाद बांग्लादेश में हुए चुनाव में एक पूर्णबहुमत की सरकार चुनकर सामने आई है. इस सरकार से वहां की जनता को बहुत उम्मीद है, साथ ही भारत के लोग भी यह चाहते हैं कि पड़ोसी मुल्क के साथ संबंध सुधरे.

Bangladesh Election Results : बांग्लादेश आम चुनाव का परिणाम आ जाने के बाद उम्मीद की जा रही है कि भारत के साथ उसके संबंध स्थिर होंगे और दोनों देशों के बीच पिछले साल से जो तनाव सी स्थिति बनी हुई है, वह दूर होगी. यहां गौर करने वाली बात यह है कि बांग्लादेश के चुनाव में जिस बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) को जीत मिली है, उसका रुख भारत के प्रति बहुत दोस्ताना नहीं रहा है. ऐसे में अगर वहां तारिक रहमान प्रधानमंत्री के रूप में शपथ लेते हैं, जो वहां की पूर्व प्रधानमंत्री खालिदा जिया के बेटे हैं, तो दोनों देशों के संबंधों पर क्या असर होगा?

खालिदा जिया के बेटे हैं तारिक रहमान, जिनके तेवर भारत के विपरीत रहा है

बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी के नेता तारिक रहमान अगले पीएम बनेंगे. वे बांग्लादेश की दो बार प्रधानमंत्री रहीं खालिया जिया के बेटे हैं. खालिया जिया दो बार 1991–96 और 2001–2006 के बीच बांग्लादेश की प्रधानमंत्री बनी. उस दौरान इनकी विचारधारा बांग्लादेशी राष्ट्रवाद पर आधारित थी, इस्लामिक पहचान से ज्यादा जुड़ी थी. साथ ही बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी की सोच पाकिस्तान के प्रति नरम और भारत के प्रति उग्र रवैया रखती थी. अब जबकि खालिदा जिया के बेटे बांग्लादेश की सरकार के मुखिया बनेंगे, तो क्या यह संभव है कि वे अपनी मां की विचारधारा के साथ ही भारत के साथ संबंध बनाएंगे? खालिदा जिया का ऐसा मानना था कि भारत शेख हसीना के साथ ज्यादा मजबूती के साथ खड़ा दिखता है.

खालिदा जिया और तारिक रहमान के कार्यकाल में बहुत बदल चुका है बांग्लादेश : प्रो धनंजय त्रिपाठी

यह नया बांग्लादेश है, जिसकी नींव युवाओं की अपेक्षाओं पर रखी गई है. कोई भी नयी सरकार यह नहीं चाहेगी कि वो कोई ऐसा कदम उठाए जिससे युवाओं की अपेक्षाओं को ठेस पहुंचे. बांग्लादेश का युवा यह चाहता है कि भारत के साथ संबंध सुधरें और उनके लिए रोजगार के अवसर बढ़ें. इन परिस्थितियों में तारिक रहमान भारत के संबंध खराब करने की नहीं सोचेंगे.

साउथ एशियन यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर डाॅ धनंजय त्रिपाठी बताते हैं कि इस बार जो सरकार बनी है वह पूर्ण बहुमत की सरकार है. इससे पहले दो बार जब खालिदा जिया प्रधानमंत्री बनी थीं, तो वह गठबंधन की सरकार थी. बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी को जमात ए इस्लामी के समर्थन की जरूरत थी. जमात का रुख हमेशा ही भारत विरोधी रहा है, लेकिन अब परिस्थिति वैसी नहीं है. आज तारिक रहमान की पार्टी पूर्ण बहूुमत में है, इसलिए उन्हें किसी के दबाव में आने की जरूरत नहीं है.

यह नया बांग्लादेश है, जो भारत के साथ बेहतर संबंध विकसित करेगा. इसके संकेत भी मिलने शुरू हो गए है, जिस तरह प्रधानमंत्री मोदी ने तारिक रहमान को चुनाव में जीत पर धन्यवाद दिया और उनका सकारात्मक जवाब सामने आया है. बहुत मुमकिन है कि पिछले एक–डेढ़ साल में जिस तरह के रिश्ते बन गए थे उसमें सुधार होगा और अराजकता समाप्ति होगी.

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कैसा हो सकता है तारिक रहमान का कार्यकाल?

खालिदा जिया के कार्यकाल में भारत और बांग्लादेश के बीच जो कुछ हुआ, उसे राजनीतिक मजबूरी कहा जा सकता है, लेकिन तारिक रहमान को काफी सोच–समझकर कदम उठाना होगा. बांग्लादेश के सामने भारत एक बहुत बड़ी शक्ति है, जिससे मेल–जोल बांग्लादेश के लिए फायदेमंद ही साबित होगा.

बांग्लादेश को अपने देश में विकास करने और युवाओं को बेहतर जीवन देने की कोशिश में भारत के सहयोग की जरूरत है. इस बात को तारिक रहमान समझते हैं. भारत यह चाहेगा कि पूर्वोत्तर में उग्रवाद और सीमा की सुरक्षा को लेकर बांग्लादेश से सहयोग मिले, अगर ऐसा होता है, तो बेहतर है. अगर ऐसा नहीं हुआ और तारिक रहमान इस्लामिक कट्टरता के पक्षधर बने, तो फिर अराजकता बढ़ सकती है.

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By Rajneesh Anand

रजनीश आनंद प्रभात खबर में सीनियर चीफ कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत हैं और पत्रकारिता के क्षेत्र में 25 वर्षों से अधिक का अनुभव रखती हैं.फिलहाल वे प्रभात खबर के ओरिजिनल, नेशनल, इंटरनेशनल और खेल कैटेगरी के लिए राइटिंग का काम करती हैं. उनकी पहचान फैक्ट बेस्ट रिपोर्टिंग, रिसर्च बेस्ड स्टोरी और एक्सप्लेनर लेखन के लिए है.

राजनीति, सामाजिक सरोकार, ग्रामीण विकास, महिला मुद्दों, इतिहास, खेल, जनजातीय समाज और सार्वजनिक नीतियों से जुड़े विषयों पर उनकी विशेष रुचि रही है. वैसे मुद्दे जो समाज के हाशिये पर मौजूद समुदायों और आम लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं, लेकिन मुख्यधारा की बहस में अपेक्षाकृत कम जगह पाते हैं, ऐसे विषयों पर भी लेखन में रुचि रखती हैं.

रजनीश आनंद कई प्रतिष्ठित पत्रकारिता फेलोशिप से जुड़ी रही हैं. इन्क्लूसिव मीडिया–यूएनडीपी फेलोशिप के तहत उन्होंने झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) जिले में माहवारी स्वच्छता और किशोरियों एवं महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों पर अध्ययन एवं रिपोर्टिंग की. झारखंड सरकार मीडिया फेलोशिप के दौरान महिला सशक्तिकरण, सरकारी योजनाओं के प्रभाव और सामाजिक बदलाव के विभिन्न आयामों पर काम किया. इसके अलावा सेव द चिल्ड्रन फेलोशिप के तहत बच्चों के अधिकार, शिक्षा, सुरक्षा और बाल कल्याण से जुड़े मुद्दों पर गहन रिपोर्टिंग की है.

आदिवासी समाज, विशेषकर मुंडा जनजाति के इतिहास, संस्कृति और समकालीन चुनौतियों पर उनका काम उल्लेखनीय माना जाता है. उन्होंने भूमि, पहचान, परंपरा, सामाजिक बदलाव और आदिवासी समुदायों के अधिकारों से जुड़े विषयों पर व्यापक फील्ड रिपोर्टिंग की है.हाल के वर्षों में उन्होंने झारखंड में ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) और जस्ट ट्रांजिशन की अवधारणा पर भी काम किया है. विशेष रूप से कोयला आधारित अर्थव्यवस्था वाले क्षेत्रों में रोजगार, आजीविका और सामाजिक प्रभावों से जुड़ी चुनौतियों पर उनकी रिपोर्टिंग ने महत्वपूर्ण सवाल उठाए हैं.

रजनीश आनंद झारखंड की राजधानी रांची में रहती हैं और इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक हैं. उन्होंने वर्ष 2000 में पत्रकारिता की शुरुआत झारखंड जागरण दैनिक से की. इसके बाद प्रभात खबर, हिंदुस्तान, रांची एक्सप्रेस और दैनिक जागरण सहित कई प्रमुख समाचार संस्थानों के लिए रिपोर्टिंग और स्वतंत्र लेखन किया. प्रिंट मीडिया के दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक और सांध्य प्रकाशनों में काम करने के साथ-साथ वे वर्ष 2012 से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं.

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