वंदे मातरम्‌ का सरकार ने बढ़ाया सम्मान,अब पूरा गीत गाना हुआ जरूरी

Vande Mataram : वंदे मातरम्‌ के 150 साल पूरे होने के उपलक्ष्य में केंद्र सरकार ने देशभक्ति की अमर कृति को सम्मान देने के लिए एक प्रोटोकाॅल तय किया है, जिसमें यह बताया गया है कि कब–कब और कैसे यह गीत गाया और बजाया जाएगा. वंदे मातरम्‌ को नेशनल एंथम बनाने पर चर्चा तो संविधान सभा में हुई, लेकिन इसे स्वीकार नहीं किया गया. नेशनल ऑनर एक्ट 1971 के तहत जन–गण–मन को संविधान विशेष स्थान देता है, लेकिन वंदे मातरम्‌ के साथ यह स्थिति नहीं है, इसका संविधान में कोई जिक्र नहीं है. हालांकि इसके दो पैरा को राष्ट्रीय गीत के रूप में स्वीकार करते हुए संविधान सभा ने सम्मान दिया था.

Vande Mataram : केंद्रीय गृह मंत्रालय के 28 जनवरी के आदेश के अनुसार अब, जब भी वंदे मातरम्‌ और जन गण मन एक साथ बजाए जाएंगे, तो पहले वंदे मातरम्‌ का गायन होगा, उसके बाद ही जग गण मन गाया जाएगा. केंद्रीय गृह मंत्रालय के निर्देश में कहा गया है कि जब भी राष्ट्रगीत ‘वंदे मातरम्’ गाया जाएगा, तो इसके सभी छह छंद पहले गाए जाएं.  वंदे मातरम्‌ का गायन राष्ट्रपति के आगमन, तिरंगा फहराए जाने और राज्यपालों के भाषण जैसे आधिकारिक कार्यक्रमों में राष्ट्रगीत के सभी छह छंद (कुल अवधि तीन मिनट 10 सेकंड) गाए जाएंगे. 

मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि जहां राष्ट्रगीत गाया जाएगा, वहां मौजूद सभी लोगों को सावधान की मुद्रा में खड़ा होना होगा. लेकिन अगर किसी समाचार रील या वृत्तचित्र के दौरान राष्ट्रगीत फिल्म के हिस्से के रूप में बजाया जाए, तो दर्शकों से खड़े होने की अपेक्षा नहीं है.  हालांकि मंत्रालय ने ऐसी कोई सूची नहीं भेजी है, जिसमें यह बताया गया हो कि कहां–कहां और कब राष्ट्रगीत बजाया जाएगा.

संविधान सभा ने 2 छंद को दी थी मान्यता अब 6 छंद अनिवार्य

वंदे मातरम्‌ को आजादी के बाद 1947 में राष्ट्रीय गीत का दर्जा दिया गया था. संविधान सभा ने जन गण मन को राष्ट्रगान और वंदे मातरम को राष्ट्रीय गीत के रूप में स्वीकार किया. इस गीत के दो पद या जिसे छंद कहा जाता है आधिकारिक रूप से स्वीकार किया. इसके आगे के छंदों को स्वीकार नहीं किया गया, क्योंकि आगे के छंदों में भारत को माता के रूप में मानकर उसकी सुंदरता, शक्ति और समृद्धि का वर्णन है. संविधान सभा में बहस के दौरान यह बात कही गई थी कि चूंकि भारत एक सेक्यूलर देश है, इसलिए किसी को भी ऐसा करने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता, जिसकी इजाजत उन्हें उनका धर्म नहीं देता है. गृह मंत्रालय के नये आदेश में भी इस बात के लिए किसी को बाध्य नहीं किया गया है कि वंदे मातरम्‌ का गायन सबके लिए अनिवार्य है.

कानून के विरुद्ध नहीं राष्ट्रगीत के 6 पैरा का गायन जरूरी करना : फैजान मुस्तफा

प्रसिद्ध शिक्षाविद्‌ और कानून के जानकार फैजान मुस्तफा ने प्रभात खबर के साथ विशेष बातचीत में कहा कि वंदे मातरम्‌ के छह पैरा का गायन जरूरी करना किसी भी तरह कानून के विरुद्ध नहीं है. सरकार ने एक गाइडलाइन जारी की है, जिसमें यह बताया गया है कि राष्ट्रगीत का सम्मान जरूरी है और उसे कब-कब गाना और बजाना जरूरी होगा. सरकार ने संविधान का कहीं से उल्लंघन नहीं किया है. नेशनल ऑनर एक्ट 1971 के तहत नेशनल एंथम को तो विशेष दर्जा प्राप्त है, लेकिन राष्ट्रगीत के साथ वह स्थिति नहीं है. अगर सरकार यह चाहती है कि वह राष्ट्रगीत को भी वह दर्जा दे, तो उसे संविधान में संशोधन करना होगा, लेकिन सरकार ने यह नहीं किया है. उसने बस एक गाइडलाइन जारी की है. गाइडलाइन की स्थिति कानून की तरह नहीं होती है, यह कमजोर होता है. जहां तक वंदे मातरम्‌ को जन-गण-मन से पहले बजाने की बात है, तो ऐसा कोई कानून नहीं है, जो ऐसा करने से रोकता है, इसलिए यह कहा जा सकता है कि सरकार की गाइडलाइन कानून सम्मत है.

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राष्ट्रगीत और विवाद क्या हैं?

वंदे मातरम्‌, एक ऐसा गीत है जिसने भारत की आजादी की लड़ाई में काफी अहम भूमिका निभाई थी. आजादी के बाद संविधान सभा ने इस गीत को नेशनल एंथम बनाने पर विस्तृत चर्चा भी की थी, लेकिन इस गीत को राष्ट्रगान का दर्जा नहीं मिल सका, इसकी वजह यह थी कि इस गीत को हिंदू राष्ट्रवाद की भावना से जोड़ दिया गया था. कवि ने इस गीत में मां भारती को देवी दुर्गा के रूप में चित्रित किया है और उनकी स्तुति की है. इसी वजह से मुस्लिम राजनेताओं ने गीत को अपने धर्म के विरुद्ध बताया था.

भारत एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र है इसलिए सभी की भावनाओं की कद्र करते हुए डाॅ राजेंद्र प्रसाद ने इसे राष्ट्रगीत का दर्जा देने की घोषणा की थी. विवाद तब बढ़ा, जब वंदे मातरम के गायन को सबके लिए अनिवार्य करने की मांग उठी. 2006 में जब यह मामला सुप्रीम कोर्ट के पास पहुंचा, तो उस वक्त अदालत ने कहा था कि वंदे मातरम्‌ गाने के लिए किसी को बाध्य नहीं किया जा सकता है, हां स्वेच्छा से लोग इसका गायन कर सकते हैं. सुप्रीम कोर्ट ने इसे धार्मिक स्वतंत्रता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से जुड़ा मसला मानते हुए यह निर्णय दिया था.

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Published by: Rajneesh Anand

रजनीश आनंद प्रभात खबर में सीनियर चीफ कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत है.पत्रकारिता के क्षेत्र में 25 वर्षों का अनुभव रखती हैं. झारखंड की राजधानी रांची में रहने वाली रजनीश ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक की शिक्षा प्राप्त की और वर्ष 2000-01 में पत्रकारिता की शुरुआत की. इन्होंने पहली नौकरी झारखंड जागरण दैनिक अखबार में की. उसके बाद इन्होंने प्रभात खबर, हिंदुस्तान, रांची एक्सप्रेस तथा दैनिक जागरण सहित कई प्रमुख समाचार संस्थानों के लिए रिपोर्टिंग और लेखन किया. प्रिंट मीडिया के दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक और सांध्य संस्करणों में काम करने के बाद वे वर्ष 2012 से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं. रजनीश आनंद की पहचान तथ्यपरक रिपोर्टिंग, गहन शोध और विश्लेषणात्मक लेखन के लिए है. उनकी रुचि राजनीति, सामाजिक सरोकारों, ग्रामीण विकास, महिला मुद्दों, इतिहास, खेल, जनजातीय समाज और सार्वजनिक नीतियों से जुड़े विषयों में रही है। उन्होंने हमेशा उन मुद्दों को प्राथमिकता दी है जो समाज के हाशिये पर खड़े लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं, लेकिन मुख्यधारा की चर्चा में अपेक्षाकृत कम स्थान पाते हैं. वे कई प्रतिष्ठित पत्रकारिता फेलोशिप से जुड़ी रही हैं. इन्क्लूसिव मीडिया–यूएनडीपी फेलोशिप के तहत उन्होंने झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) जिले में माहवारी स्वच्छता और किशोरियों एवं महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों पर विस्तृत अध्ययन और रिपोर्टिंग की. झारखंड सरकार मीडिया फेलोशिप के दौरान उन्होंने महिला सशक्तिकरण, सरकारी योजनाओं के प्रभाव और सामाजिक बदलाव के विभिन्न आयामों पर कार्य किया. इसके अतिरिक्त सेव द चिल्ड्रन फेलोशिप के तहत उन्होंने बच्चों के अधिकार, शिक्षा, सुरक्षा और बाल कल्याण से जुड़े मुद्दों पर गहन रिपोर्टिंग की. आदिवासी समाज, विशेषकर मुंडा जनजाति के इतिहास, संस्कृति और समकालीन चुनौतियों पर उनका काम उल्लेखनीय माना जाता है. उन्होंने भूमि, पहचान, परंपरा, सामाजिक बदलाव और आदिवासी समुदायों के अधिकारों से जुड़े विषयों पर व्यापक फील्ड रिपोर्टिंग की है. हाल के वर्षों में उन्होंने झारखंड में ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) और जस्ट ट्रांजिशन की अवधारणा पर भी काम किया है. विशेष रूप से कोयला आधारित अर्थव्यवस्था वाले क्षेत्रों में भविष्य की चुनौतियों, रोजगार, आजीविका और सामाजिक प्रभावों पर उनकी रिपोर्टिंग ने महत्वपूर्ण प्रश्न उठाए हैं. उनका मानना है कि ऊर्जा परिवर्तन की प्रक्रिया तभी सफल होगी जब उसमें प्रभावित समुदायों की भागीदारी और हितों को केंद्र में रखा जाए.पत्रकारिता उनके लिए केवल एक पेशा नहीं, बल्कि समाज के प्रति जिम्मेदारी निभाने का माध्यम है. जमीनी रिपोर्टिंग, तथ्यों की पड़ताल और जनसरोकारों को केंद्र में रखकर लिखना उनकी कार्यशैली की विशेषता रही है. इसके अतिरिक्त रजनीश आनंद कहानियां और कविताएं लिखने का शौक भी रखती है.

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