महिला के पायजामे का नाड़ा खोलना रेप की कोशिश ही माना जाएगा, हाईकोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट ने निरस्त किया

Supreme Court : सुप्रीम कोर्ट ने रेप की कोशिश के मामले में ऐतिहासिक फैसला सुनाया है और कहा है कि जब मामला किसी ऐसे पीड़ित से जुड़ा हो, जो बेबस है तो कोर्ट को संवेदशील होकर फैसला सुनाना चाहिए.

Supreme Court : किसी महिला के पायजामे का नाड़ा खोलना या तोड़ना और उसके शरीर को गलत तरीके से छूना रेप की कोशिश ही माना जाएगा है. भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने यह फैसला सुनाया है और इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस फैसले को निरस्त कर दिया है, जिसमें किसी महिला के पायजामे के नाड़े को खोलना महज रेप करने की तैयारी बताया गया था.

रेप की कोशिश और रेप की तैयारी में है फर्क

सुप्रीम कोर्ट ने यह माना है कि किसी महिला के पायजामे के नाड़े को खोलना रेप की कोशिश ही माना जाएगा ना कि रेप की तैयारी. इस संबंध में झारखंड हाईकोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता अवनीश रंजन मिश्रा ने बताया कि माननीय सुप्रीम कोर्ट ने जो व्यवस्था थी है उसके तहत पायजामे का नाड़ा खोलना रेप की कोशिश है, अगर इसे तैयारी के तौर पर भी देखा जाए, तो यहां यह समझना जरूरी है कि आखिर वह व्यक्ति ऐसा क्यों कर रहा था, उसके पीछे की वजह क्या थी? इस सवाल का जवाब स्पष्टत: यह है कि वह रेप करना चाह रहा था. भारतीय न्याय संहिता में रेप की परिभाषा स्पष्ट तौर पर दी गई है और संभवत: कोर्ट ने उसी परिभाषा के तहत इसे रेप की कोशिश माना है. अधिवक्ता अवनीश रंजन मिश्रा बताते हैं कि बीएनएस की धारा 351 में यह बताया गया है कि आरोपी व्यक्ति अगर रेप की तैयारी करे, तो उसके लिए उसे सजा कम होगी.

मार्च 2025 में हाईकोर्ट ने सुनाया था फैसला

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 17 मार्च 2025 को यह फैसला सुनाया था कि अगर किसी महिला के पायजामे के नाड़े को तोड़ा या खोला जाए तो उसे रेप की कोशिश नहीं बल्कि रेप करने की तैयारी माना जाएगा. इस अपराध में सजा कम होती है क्योंकि इसे एक महिला की इज्जत को ठेस पहुंचाने वाला माना जाता है ना कि रेप की कोशिश. इलाहाबाद हाईकोर्ट के इस फैसले के बाद काफी हो हल्ला मचा और सीनियर एडवोकेट शोभा गुप्ता के एक पत्र के बाद सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले का खुद संज्ञान लिया और मंगलवार को यह फैसला सुनाया.

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पॉक्सो एक्ट के तहत दर्ज किया गया मामला

चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस बागची और जस्टिस एनवी अंजारिया की बेंच ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले को निरस्त किया और 11 साल की बच्ची के साथ हुए यौन अपराध के प्रति पाॅक्सो एक्ट के तहत दो लोगों पर मामला चलाने की पेशकश की. कोर्ट ने कहा कि इस तरह के अपराधों में विशेष संवेदनशील होने की जरूरत है. अपने फैसले में कोर्ट ने कहा कि जजों को फैसला सुनाते हुए इस तरह के मामलों में सिर्फ संविधान और कानून का ही ध्यान नहीं रखना चाहिए बल्कि माहौल और पीड़ितों की स्थिति पर भी संवेदशीलता के साथ विचार करना चाहिए.

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By Rajneesh Anand

रजनीश आनंद प्रभात खबर में सीनियर चीफ कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत हैं और पत्रकारिता के क्षेत्र में 25 वर्षों से अधिक का अनुभव रखती हैं.फिलहाल वे प्रभात खबर के ओरिजिनल, नेशनल, इंटरनेशनल और खेल कैटेगरी के लिए राइटिंग का काम करती हैं. उनकी पहचान फैक्ट बेस्ट रिपोर्टिंग, रिसर्च बेस्ड स्टोरी और एक्सप्लेनर लेखन के लिए है.

राजनीति, सामाजिक सरोकार, ग्रामीण विकास, महिला मुद्दों, इतिहास, खेल, जनजातीय समाज और सार्वजनिक नीतियों से जुड़े विषयों पर उनकी विशेष रुचि रही है. वैसे मुद्दे जो समाज के हाशिये पर मौजूद समुदायों और आम लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं, लेकिन मुख्यधारा की बहस में अपेक्षाकृत कम जगह पाते हैं, ऐसे विषयों पर भी लेखन में रुचि रखती हैं.

रजनीश आनंद कई प्रतिष्ठित पत्रकारिता फेलोशिप से जुड़ी रही हैं. इन्क्लूसिव मीडिया–यूएनडीपी फेलोशिप के तहत उन्होंने झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) जिले में माहवारी स्वच्छता और किशोरियों एवं महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों पर अध्ययन एवं रिपोर्टिंग की. झारखंड सरकार मीडिया फेलोशिप के दौरान महिला सशक्तिकरण, सरकारी योजनाओं के प्रभाव और सामाजिक बदलाव के विभिन्न आयामों पर काम किया. इसके अलावा सेव द चिल्ड्रन फेलोशिप के तहत बच्चों के अधिकार, शिक्षा, सुरक्षा और बाल कल्याण से जुड़े मुद्दों पर गहन रिपोर्टिंग की है.

आदिवासी समाज, विशेषकर मुंडा जनजाति के इतिहास, संस्कृति और समकालीन चुनौतियों पर उनका काम उल्लेखनीय माना जाता है. उन्होंने भूमि, पहचान, परंपरा, सामाजिक बदलाव और आदिवासी समुदायों के अधिकारों से जुड़े विषयों पर व्यापक फील्ड रिपोर्टिंग की है.हाल के वर्षों में उन्होंने झारखंड में ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) और जस्ट ट्रांजिशन की अवधारणा पर भी काम किया है. विशेष रूप से कोयला आधारित अर्थव्यवस्था वाले क्षेत्रों में रोजगार, आजीविका और सामाजिक प्रभावों से जुड़ी चुनौतियों पर उनकी रिपोर्टिंग ने महत्वपूर्ण सवाल उठाए हैं.

रजनीश आनंद झारखंड की राजधानी रांची में रहती हैं और इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक हैं. उन्होंने वर्ष 2000 में पत्रकारिता की शुरुआत झारखंड जागरण दैनिक से की. इसके बाद प्रभात खबर, हिंदुस्तान, रांची एक्सप्रेस और दैनिक जागरण सहित कई प्रमुख समाचार संस्थानों के लिए रिपोर्टिंग और स्वतंत्र लेखन किया. प्रिंट मीडिया के दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक और सांध्य प्रकाशनों में काम करने के साथ-साथ वे वर्ष 2012 से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं.

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