इथोपिया में बदल गई टाइम मशीन, 2025 के बजाय अभी 2018 में ही जी रहे हैं लोग! सच्चाई जानने के लिए पढ़ें

Ethiopia : अगर कोई अभी भारत में पूछे कि कौन सा साल चल रहा है, तो कोई भी आसानी से कहेगा, अभी 2025 चल रहा है. पाकिस्तान में भी जवाब यही होगा, समय का थोड़ा हेरफेर संभव है. यूरोप-अमेरिका में भी जवाब यही होगा, लेकिन अगर आप पूर्वी अफ्रीका के देश इथियोपिया चले जाएं और पूछें कि कौन साल चल रहा है तो आपको जवाब मिलेगा 2018. चौंकिए नहीं, इसकी वजह यह है कि वे लोग ग्रेगोरियन कैलेंडर को नहीं मानते, उनका अपनी संस्कृति के हिसाब से अलग कैलेंडर है.

Ethiopia : इथियोपिया में 24 नवंबर को लगभग 12000 हजार साल से सुसुप्त स्थिति में रहने वाला ज्वालामुखी विस्फोट हुआ. इस विस्फोट के बाद पूरे विश्व में इथियोपिया को लेकर चर्चा हो रही है. इथियोपिया पूर्वी अफ्रीका का एक देश है, जो सोमालिया और सूडान के पास स्थित है. इथियोपिया अफ्रीका का एक देश है, जो अपनी संस्कृति, आबादी और जातीय विविधता के कारण हमेशा चर्चा में रहता है. इथियोपिया एक और वजह से भी पूरे विश्व में जाना जाता है और वह यह है कि

इथियोपिया ग्रेगोरियन कैलेंडर को नहीं मानता है. उनके पास अपना कैलेंडर है और वे उसी को मानते हैं, जिसके अनुसार अभी इथियोपिया में 2025 नहीं बल्कि 2018 चल रहा है. आइए समझते हैं वहां के कैलेंडर की गणना.

इथियोपिया ग्रेगोरियन कैलेंडर को नहीं, तो किस कैलेंडर को मानता है?

इथियोपिया में ग्रेगोरियन कैलेंडर की मान्यता नहीं है, हालांकि कुछ कार्यों में वे इसका उपयोग करते हैं. इथियोपिया में जो कैलेंडर चलता है उसे इथियोपियन या गिअज कैलेंडर कहा जाता है. इस कैलेंडर की गणना अलग है, इसी वजह से इथियोपिया में वर्ष की गणना दुनिया से लगभग 7 से 8 साल पीछे चलती है. इस कैलेंडर में 13 महीने होते हैं और हर महीना 30 दिन का होता है.

कैसे हुई थी इथियोपियाई कैलेंडर की उत्पत्ति

इथियोपिया ईसाई धर्म का प्राचीन केंद्र माना जाता है. इथियोपिया और यूरोप दोनों ही जगहों पर तारीख की गिनती यीशु मसीह के जन्म से शुरू हुई, लेकिन यूरोपीय गणना में इसे 1 ईस्वी से माना जाता है जबकि इथियोपिया कैलेंडर में इसे 7-8 ईस्वी से माना जाता है. दोनों कैलेंडर में उत्पत्ति का यही मुख्य फर्क है और दोनों के बीच 7–8 साल का अंतर भी है. चूंकि दोनों मान्यताओं में एक ही घटना को दो अलग-अलग वर्ष में रखा गया है, इसलिए ग्रेगोरियन कैलेंडर आगे दिखता है , जबकि इथियोपिया का कैलेंडर पीछे.

कैसे काम करता है इथियोपिया का कैलेंडर?

इथियोपिया के कैलेंडर में कुल 13 महीने होते हैं. हर महीना 30 दिन का होता है, लेकिन यहां गौर करने वाली बात यह है कि 12 महीने में तो 30 दिन होते हैं लेकिन साल के अंतिम महीने में सिर्फ 5-6 दिन ही होते हैं. साल के अंतिम महीने को पगुमे कहते हैं. वर्ष की लंबाई 365 या 366 दिन की ही होती है, जिसमें प्रत्येक 12 महीने में 30 दिन यानी 360 दिन होते हैं और पगुमे महीने में 5 दिन होते हैं तो वर्ष में कुल 365 दिन होते हैं. लीप वर्ष में पगुमे में 6 दिन होते हैं, जिससे साल 366 दिन का हो जाता है. इथियोपिया में नया साल सितंबर में आता है, यानी जब पूरा विश्व 1 जनवरी 2026 को नया साल मना रहा होगा इथियोपिया में नए साल का जश्न नहीं होगा और वहां वर्ष होगा 2018. वहां हर साल 11 सितंबर को नया साल मनाया जाता है और लीप ईयर में यह 12 सितंबर को मनाया जाता है.

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Author: Rajneesh Anand

रजनीश आनंद प्रभात खबर में सीनियर चीफ कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत है.पत्रकारिता के क्षेत्र में 25 वर्षों का अनुभव रखती हैं. झारखंड की राजधानी रांची में रहने वाली रजनीश ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक की शिक्षा प्राप्त की और वर्ष 2000-01 में पत्रकारिता की शुरुआत की. इन्होंने पहली नौकरी झारखंड जागरण दैनिक अखबार में की. उसके बाद इन्होंने प्रभात खबर, हिंदुस्तान, रांची एक्सप्रेस तथा दैनिक जागरण सहित कई प्रमुख समाचार संस्थानों के लिए रिपोर्टिंग और लेखन किया. प्रिंट मीडिया के दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक और सांध्य संस्करणों में काम करने के बाद वे वर्ष 2012 से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं. रजनीश आनंद की पहचान तथ्यपरक रिपोर्टिंग, गहन शोध और विश्लेषणात्मक लेखन के लिए है. उनकी रुचि राजनीति, सामाजिक सरोकारों, ग्रामीण विकास, महिला मुद्दों, इतिहास, खेल, जनजातीय समाज और सार्वजनिक नीतियों से जुड़े विषयों में रही है। उन्होंने हमेशा उन मुद्दों को प्राथमिकता दी है जो समाज के हाशिये पर खड़े लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं, लेकिन मुख्यधारा की चर्चा में अपेक्षाकृत कम स्थान पाते हैं. वे कई प्रतिष्ठित पत्रकारिता फेलोशिप से जुड़ी रही हैं. इन्क्लूसिव मीडिया–यूएनडीपी फेलोशिप के तहत उन्होंने झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) जिले में माहवारी स्वच्छता और किशोरियों एवं महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों पर विस्तृत अध्ययन और रिपोर्टिंग की. झारखंड सरकार मीडिया फेलोशिप के दौरान उन्होंने महिला सशक्तिकरण, सरकारी योजनाओं के प्रभाव और सामाजिक बदलाव के विभिन्न आयामों पर कार्य किया. इसके अतिरिक्त सेव द चिल्ड्रन फेलोशिप के तहत उन्होंने बच्चों के अधिकार, शिक्षा, सुरक्षा और बाल कल्याण से जुड़े मुद्दों पर गहन रिपोर्टिंग की. आदिवासी समाज, विशेषकर मुंडा जनजाति के इतिहास, संस्कृति और समकालीन चुनौतियों पर उनका काम उल्लेखनीय माना जाता है. उन्होंने भूमि, पहचान, परंपरा, सामाजिक बदलाव और आदिवासी समुदायों के अधिकारों से जुड़े विषयों पर व्यापक फील्ड रिपोर्टिंग की है. हाल के वर्षों में उन्होंने झारखंड में ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) और जस्ट ट्रांजिशन की अवधारणा पर भी काम किया है. विशेष रूप से कोयला आधारित अर्थव्यवस्था वाले क्षेत्रों में भविष्य की चुनौतियों, रोजगार, आजीविका और सामाजिक प्रभावों पर उनकी रिपोर्टिंग ने महत्वपूर्ण प्रश्न उठाए हैं. उनका मानना है कि ऊर्जा परिवर्तन की प्रक्रिया तभी सफल होगी जब उसमें प्रभावित समुदायों की भागीदारी और हितों को केंद्र में रखा जाए.पत्रकारिता उनके लिए केवल एक पेशा नहीं, बल्कि समाज के प्रति जिम्मेदारी निभाने का माध्यम है. जमीनी रिपोर्टिंग, तथ्यों की पड़ताल और जनसरोकारों को केंद्र में रखकर लिखना उनकी कार्यशैली की विशेषता रही है. इसके अतिरिक्त रजनीश आनंद कहानियां और कविताएं लिखने का शौक भी रखती है.

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