कोई भी जश्न इंसान की जान से बढ़कर नहीं, बेंगलुरु पुलिस के मना करने पर भी क्यों हुई RCB की विक्ट्री परेड?

Bengaluru Stampede : 18 साल के लंबे इंतजार के बाद रॉयल चैलेंजर्स बेंगलुरु की टीम जब आईपीएल की चैंपियन बनी, तो जश्न आयोजित हुआ, लेकिन जीत की खुशी में मौत का सन्नाटा और चीख-पुकार भी शामिल हो गई. सवाल यह है कि क्या जीत के जश्न का आयोजन किसी की जिंदगी से बढ़कर हो सकता है? 11 मासूम लोगों की मौत की कीमत पर क्या विक्ट्री परेड होनी चाहिए थी? वह भी तब जबकि पुलिस ने इस तरह के किसी भी आयोजन को ना करने की सलाह दी थी? इतनी क्या जल्दी थी कि जश्न मनाने की कि पुलिस प्रशासन को तैयारी का मौका तक नहीं दिया गया. सरकार इतनी लापरवाह कैसे हो गई कि सुरक्षा जांच से पहले ही विक्ट्री परेड की इजाजत दे दी.खबर तो यह भी है कि भगदड़ की सूचना मिलने पर भी चिन्ना्स्वामी स्टेडियम में कार्यक्रम जारी रहा, हालांकि बाद में इस दुर्घटना पर शोक जताया गया.

Bengaluru Stampede : 3 जून की रात को रॉयल चैलेंजर्स बेंगलुरु की टीम ने आईपीएल की इतिहास में पहली बार खिताब जीता और अपने प्रशंसकों को बहुत बड़ी खुशी दे दी, जिसका जश्न पूरे देश में मनाया गया. महान क्रिकेट खिलाड़ी विराट कोहली जो 18 साल से टीम का हिस्सा हैं, वे इस ट्राॅफी का लंबे समय से इंतजार कर रहे थे और जब आरसीबी ने पंजाब किंग्स को छह रन से हराया, तो खुशी से उनकी आंखें छलक गई थीं. विराट की इस खुशी में पूरा देश उनके साथ खड़ा था, जश्न मना रहा था, लेकिन इस जश्न को नजर तब लग गई जब आरसीबी की जीत को सेलिब्रेट करने के लिए बेंगलुरु में आयोजित परेड में भगदड़ मच गई और 11 लोगों की जान चली गई.

आरसीबी के विक्ट्री परेड में भगदड़ क्यों मची?

बेंगलुरु भगदड़ की वजह

आरसीबी ने 3 जून को चैंपियनशिप का खिताब जीता और 4 जून को दोपहर में परेड आयोजित की गई. इतने कम समय में पुलिस-प्रशासन को तैयारी के लिए वक्त नहीं मिला और परेड को अफरा-तफरी में आयोजित करना पड़ा. जीत की खुमारी जो 3 जून की रात को चढ़ी थी उसे उतरने का समय भी नहीं मिला था और परेड आयोजित कर दी गई. लोगों की भावनाएं उफान पर थीं, ऐसे में उन्हें बिना प्लानिंग के नियंत्रित करना संभव नहीं था. बेंगलुरु पुलिस ने आरसीबी फ्रेंचाइजी और राज्य सरकार को सावधान किया था कि अभी परेड आयोजित ना करें यह सुरक्षा के दृष्टिकोण से उचित नहीं है, लेकिन पुलिस की चेतावनी को दरकिनार किया गया और विक्ट्री परेड आयोजित की गई, जिसकी वजह से यह दुर्घटना हुई. डेक्कन हेराल्ड में प्रकाशित खबर के अनुसार आरसीबी का तर्क यह था कि अगर जश्न को कुछ दिन बाद आयोजित किया जाता, तो विदेशी खिलाड़ी नहीं रूकते, उन्हें अपने देश वापस जाना था. राज्य सरकार ने भी जश्न की अनुमति दे दी, बिना सुरक्षा जांच के. पुलिस अधिकारियों का कहना था कि अगर जश्न करना ही है, तो उसे एक निश्चित स्थान तक सीमित किया जाए और कम से कम रविवार तक स्थगित किया जाए, लेकिन उनकी सलाह नहीं मानी गई. पुलिस की ताकीद के बावजूद कर्नाटक स्टेट क्रिकेट एसोसिएशन ने फ्री टिकट बांटे, जिसकी वजह से भीड़ अनियंत्रित हो गई. स्टेडियम के बाहर दो लाख लोग जमा थे, जिन्हें नियंत्रित करना पुलिस की सीमा से बाहर हो गया था.

कर्नाटक हाईकोर्ट ने लिया संज्ञान

बेंगलुरु के एम चिन्नास्वामी स्टेडियम के बाहर बुधवार को मची भगदड़ में 11 की मौत और 47 लोगों के घायल होने पर कर्नाटक हाईकोर्ट ने स्वत: संज्ञान लिया है. कोर्ट इस बात को लेकर चिंतित है कि जश्न का आयोजन तो हुआ, लेकिन इस जश्न की खुशी किसकी नजर लग गई. 11 लोगों की मौत हुई तो कैसे हुई और इस दुर्घटना के लिए कौन जिम्मेदार है.

क्या बेंगलुरु दुर्घटना के लिए बीसीसीआई जिम्मेदार है?

बेंगलुरु में जो दुर्घटना हुई क्या उसके लिए बीसीसीआई जिम्मेदार है? इस सवाल पर सफाई देते हुए बीसीसीआई ने स्पष्ट किया है कि उसकी इसमें कोई भूमिका नहीं है, इसलिए उसे दुर्घटना के लिए जिम्मेदार ठहराया नहीं जा सकता है. बीसीसीआई की ओर से यह कहा गया है कि उसे विक्ट्रीपरेड की कोई जानकारी नहीं थी और ना ही उससे इसपर कोई सहमति ली गई है, इसलिए दुर्घटना के लिए उसे जिम्मेदार ठहराना गलत होगा.

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लेखक के बारे में

Author: Rajneesh Anand

रजनीश आनंद प्रभात खबर में सीनियर चीफ कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत है.पत्रकारिता के क्षेत्र में 25 वर्षों का अनुभव रखती हैं. झारखंड की राजधानी रांची में रहने वाली रजनीश ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक की शिक्षा प्राप्त की और वर्ष 2000-01 में पत्रकारिता की शुरुआत की. इन्होंने पहली नौकरी झारखंड जागरण दैनिक अखबार में की. उसके बाद इन्होंने प्रभात खबर, हिंदुस्तान, रांची एक्सप्रेस तथा दैनिक जागरण सहित कई प्रमुख समाचार संस्थानों के लिए रिपोर्टिंग और लेखन किया. प्रिंट मीडिया के दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक और सांध्य संस्करणों में काम करने के बाद वे वर्ष 2012 से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं. रजनीश आनंद की पहचान तथ्यपरक रिपोर्टिंग, गहन शोध और विश्लेषणात्मक लेखन के लिए है. उनकी रुचि राजनीति, सामाजिक सरोकारों, ग्रामीण विकास, महिला मुद्दों, इतिहास, खेल, जनजातीय समाज और सार्वजनिक नीतियों से जुड़े विषयों में रही है। उन्होंने हमेशा उन मुद्दों को प्राथमिकता दी है जो समाज के हाशिये पर खड़े लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं, लेकिन मुख्यधारा की चर्चा में अपेक्षाकृत कम स्थान पाते हैं. वे कई प्रतिष्ठित पत्रकारिता फेलोशिप से जुड़ी रही हैं. इन्क्लूसिव मीडिया–यूएनडीपी फेलोशिप के तहत उन्होंने झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) जिले में माहवारी स्वच्छता और किशोरियों एवं महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों पर विस्तृत अध्ययन और रिपोर्टिंग की. झारखंड सरकार मीडिया फेलोशिप के दौरान उन्होंने महिला सशक्तिकरण, सरकारी योजनाओं के प्रभाव और सामाजिक बदलाव के विभिन्न आयामों पर कार्य किया. इसके अतिरिक्त सेव द चिल्ड्रन फेलोशिप के तहत उन्होंने बच्चों के अधिकार, शिक्षा, सुरक्षा और बाल कल्याण से जुड़े मुद्दों पर गहन रिपोर्टिंग की. आदिवासी समाज, विशेषकर मुंडा जनजाति के इतिहास, संस्कृति और समकालीन चुनौतियों पर उनका काम उल्लेखनीय माना जाता है. उन्होंने भूमि, पहचान, परंपरा, सामाजिक बदलाव और आदिवासी समुदायों के अधिकारों से जुड़े विषयों पर व्यापक फील्ड रिपोर्टिंग की है. हाल के वर्षों में उन्होंने झारखंड में ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) और जस्ट ट्रांजिशन की अवधारणा पर भी काम किया है. विशेष रूप से कोयला आधारित अर्थव्यवस्था वाले क्षेत्रों में भविष्य की चुनौतियों, रोजगार, आजीविका और सामाजिक प्रभावों पर उनकी रिपोर्टिंग ने महत्वपूर्ण प्रश्न उठाए हैं. उनका मानना है कि ऊर्जा परिवर्तन की प्रक्रिया तभी सफल होगी जब उसमें प्रभावित समुदायों की भागीदारी और हितों को केंद्र में रखा जाए.पत्रकारिता उनके लिए केवल एक पेशा नहीं, बल्कि समाज के प्रति जिम्मेदारी निभाने का माध्यम है. जमीनी रिपोर्टिंग, तथ्यों की पड़ताल और जनसरोकारों को केंद्र में रखकर लिखना उनकी कार्यशैली की विशेषता रही है. इसके अतिरिक्त रजनीश आनंद कहानियां और कविताएं लिखने का शौक भी रखती है.

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