67 : Gen Alpha के नए स्लैंग 67 का जलवा, गूगल भी ट्रेंड में शामिल; जानिए खासियत

6–7 : शायद ही कोई ऐसी पीढ़ी होगी, जो अपने से आगे वाली पीढ़ी को ठीक से समझती होगी और उन्हें सही मानती होगी. इस स्थिति को ही जेनरेशन गैप कहा जाता है. आज के नए जेनरेशन और उनके माता–पिता के बीच भी ऐसी ही स्थिति देखने को मिलती है, जब 6–7 मीम उनके सामने आता है. यहां जरूरी यह है कि नए जेनरेशन को समझा जाए, ना कि उनकी बुराई की जाए, तभी समाज और परिवार सही तरीके से चल सकता है.

6–7 : Gen Z के बाद अब Gen Alpha ने भी अपना जलवा दिखाना शुरू कर दिया है और इनके पैंतरों से उनके माता–पिता जो जेनरेशन एक्स का प्रतिनिधित्व करते हैं, उनका दिमाग घूम जाता है. दरअसल यहां बात हो रही है उस जेनरेशन गैप की,जो हमेशा से दो पीढ़ियों के अंतर चाहे वो बोलचाल का हो, रहन–सहन, खानपान का हो या फिर विचारों का हो साफ दिखता है. Gen Alpha का एक नया स्लैंग या जिसे उनके बोलचाल का नया तरीका कह सकते हैं, वो काफी चर्चा में है और उसका अर्थ जानने के लिए बच्चों के माता–पिता और टीचर्स भी परेशान हैं. 67 के ट्रेंड में गूगल भी शामिल हो गया है और उसने इसके लिए ईस्टर एग एड किया है, जब कोई 67 सर्च करता है, तो आपके मोबाइल का स्क्रीन और डेस्कटाॅप हाथ की तरह हिलता है. इस आर्टिकल में हम ऐसे ही एक स्लैंग 6–7 की चर्चा कर रहे हैं, तो आइए समझते हैं.

क्या है 6–7?

6–7 मीम की शुरुआत 2024–25 में TikTok और Instagram Reels से हुई. एक रैपर स्क्रिला ने अपने साॅन्ग डाॅट–डाॅट में इसका इस्तेमाल किया था, जो मीनिंग लेस था. उसके बाद कुछ रैंडम वीडियो में गिनती के बीच 6–7 बोला गया. इसका कोई अर्थ नहीं है, यह मीनिंग लेस स्लैंग है, जिसे मजाकिया अंदाज में बेवजह बोला जाता है, ताकि लोग हंसे. जैसे कोई सीरियस क्लास चल रही हो और सबकुछ बोझिल सा लग रहा हो, तो अचानक क्लास का एक बच्चा जोर से बोल पड़े 6–7. 6–7 स्लैंग की शुरुआत तो वैसे जेन जी ने की है, लेकिन यह प्रचलित ज्यादा जेन अल्फा के बीच है. वे बेवजह हंसने और दूसरों को फंसाने के लिए 6–7 स्लैंग का प्रयोग करते हैं. जैसे ही वे 6–7 बोलते हैं, उनके माता–पिता और उनके आसपास के लोग इसका अर्थ समझने की कोशिश करते हैं. वे यह जानने की कोशिश करते हैं कि आखिर उनका बच्चा बोल क्या रहा है. उनका ब्रेन राॅट करना ही दरअसल जेन अल्फा का मकसद है.

6–7 मीम पैरेंट्‌स को परेशान और बच्चों को खुश क्यों कर रहा?

6–7 मीम से पैरेंट्‌स इसलिए परेशान हैं, क्योंकि वे अबतक यह समझ नहीं पा रहे हैं कि इसका अर्थ क्या है. इसके साथ ही उनकी परेशानी यह है कि वे इसे अपने इगो से जोड़ रहे हैं और उनके बच्चे उन्हें कंफ्यूज कर देते हैं. बच्चे एक तरह से 6-7 को अपना कोडवर्ड समझते हैं और पैरेंट्‌स के सामने 6–7 बोलकर हंसते हुए निकल जाते हैं और वे कुछ कर नहीं पाते हैं. 

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वहीं  Gen Alpha को इस बात की खुशी है कि उनके पास ऐसा कुछ है, जिसकी मदद से वे अपने पैरेंट्‌स का मजाक बना सकते हैं और जिस बात पर उनके पैरेंट्‌स उन्हें कुछ कर भी नहीं पा रहे हैं. इस सोच से Gen Alpha के ईगो को भी सेटिस्फेक्शन मिल रहा है.

कौन है 6–7 मीम का क्रियेटर Gen Z या Gen Alpha?

6–7 मीम का प्रयोग ज्यादातर स्कूल के बच्चे कर रहे हैं. यह एक तरह का क्लासरूम स्लैंग हैं. हालांकि इस स्लैंग के क्रियेटर Gen Z हैं और इसके यूजर Gen Alpha हैं, जिन्होंने इसे वायरल कर दिया है.  वे इसका प्रयोग ज्यादातर खुद से बड़े लोगों को कंफ्यूज करने के लिए करते हैं. कई रैपर साॅन्ग में भी 6–7 मीम का प्रयोग किया गया है, जिसमें से स्क्रिला का डाॅट–डाॅट गाना बहुत मशहूर है.

Gen Z और Gen Alpha Slangहिंदी अर्थकब / कैसे बोला जाता है
6-7कोई मतलब नहींअचानक मजाक, कन्फ्यूजन के लिए
Brain Rotदिमाग पकाना, बकवासबहुत ज्यादा बेकार कंटेंट देखने पर
NPCबिना सोचे चलने वालाजो बस ट्रेंड फॉलो करे
Skull बहुत ज्यादा हंसी आनाकुछ बहुत ज्यादा फनी हो
Bro / Bruhभाई / अरे यारहैरानी, गुस्सा, मजाक
Midठीक-ठाक / बेकारजब कुछ खास न हो
Wजीत / बढ़ियाकिसी अच्छी चीज पर
Lहार / फेलकिसी गड़बड़ी पर
Susशकी / गड़बड़जब कुछ सही न लगे
Deluluभ्रम में जीनाहकीकत से दूर सोच
Gyattजोर का रिएक्शनशॉक या हैरानी में
Rizzइंप्रेस करने की कलास्टाइल / बात करने की स्किल
Sheeshअरे वाहतारीफ या शॉक
Low-keyथोड़ा-सा / अंदर-ही-अंदरहल्की भावना जताने में

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लेखक के बारे में

By Rajneesh anand

रजनीश आनंद प्रभात खबर में सीनियर चीफ कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत हैं और पत्रकारिता के क्षेत्र में 25 वर्षों से अधिक का अनुभव रखती हैं.फिलहाल वे प्रभात खबर के ओरिजिनल, नेशनल, इंटरनेशनल और खेल कैटेगरी के लिए राइटिंग का काम करती हैं. उनकी पहचान फैक्ट बेस्ट रिपोर्टिंग, रिसर्च बेस्ड स्टोरी और एक्सप्लेनर लेखन के लिए है.

राजनीति, सामाजिक सरोकार, ग्रामीण विकास, महिला मुद्दों, इतिहास, खेल, जनजातीय समाज और सार्वजनिक नीतियों से जुड़े विषयों पर उनकी विशेष रुचि रही है. वैसे मुद्दे जो समाज के हाशिये पर मौजूद समुदायों और आम लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं, लेकिन मुख्यधारा की बहस में अपेक्षाकृत कम जगह पाते हैं, ऐसे विषयों पर भी लेखन में रुचि रखती हैं.

रजनीश आनंद कई प्रतिष्ठित पत्रकारिता फेलोशिप से जुड़ी रही हैं. इन्क्लूसिव मीडिया–यूएनडीपी फेलोशिप के तहत उन्होंने झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) जिले में माहवारी स्वच्छता और किशोरियों एवं महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों पर अध्ययन एवं रिपोर्टिंग की. झारखंड सरकार मीडिया फेलोशिप के दौरान महिला सशक्तिकरण, सरकारी योजनाओं के प्रभाव और सामाजिक बदलाव के विभिन्न आयामों पर काम किया. इसके अलावा सेव द चिल्ड्रन फेलोशिप के तहत बच्चों के अधिकार, शिक्षा, सुरक्षा और बाल कल्याण से जुड़े मुद्दों पर गहन रिपोर्टिंग की है.

आदिवासी समाज, विशेषकर मुंडा जनजाति के इतिहास, संस्कृति और समकालीन चुनौतियों पर उनका काम उल्लेखनीय माना जाता है. उन्होंने भूमि, पहचान, परंपरा, सामाजिक बदलाव और आदिवासी समुदायों के अधिकारों से जुड़े विषयों पर व्यापक फील्ड रिपोर्टिंग की है.हाल के वर्षों में उन्होंने झारखंड में ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) और जस्ट ट्रांजिशन की अवधारणा पर भी काम किया है. विशेष रूप से कोयला आधारित अर्थव्यवस्था वाले क्षेत्रों में रोजगार, आजीविका और सामाजिक प्रभावों से जुड़ी चुनौतियों पर उनकी रिपोर्टिंग ने महत्वपूर्ण सवाल उठाए हैं.

रजनीश आनंद झारखंड की राजधानी रांची में रहती हैं और इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक हैं. उन्होंने वर्ष 2000 में पत्रकारिता की शुरुआत झारखंड जागरण दैनिक से की. इसके बाद प्रभात खबर, हिंदुस्तान, रांची एक्सप्रेस और दैनिक जागरण सहित कई प्रमुख समाचार संस्थानों के लिए रिपोर्टिंग और स्वतंत्र लेखन किया. प्रिंट मीडिया के दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक और सांध्य प्रकाशनों में काम करने के साथ-साथ वे वर्ष 2012 से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं.

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