ePaper

कूटनीतिक तरीके से पीछे हटाएं चीन को

Updated at : 27 Aug 2020 2:32 AM (IST)
विज्ञापन
कूटनीतिक तरीके से  पीछे हटाएं चीन को

अब नयी बातचीत से क्या निकलता है, वह देखना है. उसके लिए विदेशमंत्री, एनएसए या फिर प्रधानमंत्री और शी जिनपिंग के स्तर से ही यह मामला हल हो सकता है.

विज्ञापन

मेजर जनरल (रिटा.) अशोक मेहता, रक्षा विशेषज्ञ

delhi@prabhatkhabar.in

सीमा विवाद को लेकर भारत और चीन के बीच जारी वार्ता असफल होती नजर आ रही है. चीन की तरफ से कोई बयान नहीं आया है. अब हमें फैसला करने की जरूरत है. हमारी तरफ से वार्ता के माध्यम से हल निकालने का प्रयास अभी भी जारी है. कहा जा रहा है कि मिलिट्री कमांडर स्तर की एक राउंड की और वार्ता होगी. डिप्लोमैटिक स्तर, डब्ल्यूएमसीसी, मिलिट्री कमांडर स्तर पर, अब कुछ आगे-पीछे होना नहीं है. क्योंकि चीन को जो करना था, वह कर चुका है. हमें समय चाहिए. अमेरिका या रूयययस की तरफ से बैक चैनल की कोशिश हो रही होगी. मैं समझता हूं कि रूस की तरफ से भारत कोशिश कर रहा होगा कि सीमा पर तनाव को कम किया जाये.

पहले वे दो-तीन जगहों से हटें, कुछ तो गुंजाइश दिखे, जिसे स्वीकार किया जा सके. लेकिन, सीडीएस ने सैन्य विकल्प की बात की है. हालांकि, उसका अभी सवाल ही नहीं है. चीन के साथ-साथ अगर छोटे-मोटे युद्ध की बात करें, तो 1967 में नाथूला में ऐसा हो चुका है. लेकिन, मैं नहीं समझता इस दफा छोटा-मोटा युद्ध होगा. सैन्य स्तर पर हमें जो करना चाहिए था, वह हमने नहीं किया. जब ये लोग पांच-छह जगहों पर घुसे, तो हमें भी एक-दो महीने पहले ही कुछ जगहों पर कब्जा कर लेना चाहिए था. उसकी बात अभी की जा रही है.

सैन्य तैयारी के लिहाज से दोनों देशों के तोपखानों, टैंकों, हवाई जहाजों, नेवी समेत हरेक स्तर पर आंकड़े प्रदर्शित किये जा रहे हैं. हमारे मुकाबले उनकी संख्या दोगुने से भी ज्यादा है. हमारे यहां कहा जाता है कि हम माउंटेन वारफेयर (पहाड़ी इलाकों की लड़ाई) में बेहतर हैं. चीनी लोग भी तिब्बत में 14000 फीट की ऊंचाई पर रहते हैं. हमारे यहां मद्रास, राजस्थान आदि जगहों से आये सैनिक दो-तीन साल के लिए तैनात होते हैं. चीनी तो ठंडे मौसम में पहले से ही रहते हैं. हमें इस पर ज्यादा नहीं सोचना चाहिए, क्योंकि यह वैसी लड़ाई नहीं है. लड़ाई लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल (एलएसी) पर होगी, यह देपसांग, पैंगोंग सो और हॉट स्प्रिंग आदि पहाड़ी इलाका नहीं है. ये तिब्बत का पठार इलाका है.

हमें यह भी ख्याल रखना है कि हमें दो मोर्चों पर सामना करना है. चीन और पाकिस्तान दोनों साथ आ सकते हैं. भारत-चीन की सेनाएं डोकलाम में भी आमने-सामने थीं, लेकिन वह भूटान से जुड़ा मामला था, वह अलग है. डोकलाम भूटान और चीन के बीच विवादित क्षेत्र है. हम उसमें शामिल हो गये, क्योंकि हमारा भूटान के साथ सुरक्षा समझौता है. उसकी तुलना एलएसी विवाद के साथ नहीं हो सकती है. अभी की स्थिति अलग है. चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ तीन महीने के बाद बोल रहे हैं, उन्हें शुरू में ही बोलना चाहिए था, अब कह रहे हैं कि हम भी कब्जा कर सकते हैं.

अभी ब्रिक्स और एससीओ की बैठक होनेवाली है. अगर ये वर्चुअल मीटिंग है, तो आमना-सामना नहीं होगा. लेकिन, अगर ब्रिक्स की बैठक फिजिकल होगी, तो इनकी मुलाकात हो सकती है. रूस तो भारत और चीन दोनों का ही मित्र है. ऐसे स्तर की बातचीत बहुत जरूरी है. क्योंकि अगर हम अक्तूबर तक पहुंच गये, तो वहां हम एक-दो साल लटके रहेंगे. चीन यही चाहता है, उसने आपसे 30 से 40 हजार अतिरिक्त सैन्य तैनाती करवा दी है.

अभी लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल एलओसी बन गया है. आगे कुछ हरकत होगी, तो बड़े स्तर पर कार्रवाई तय है. स्पेशल रिप्रेजेंटेटिव ने एक बार वार्ता करके छोड़ दी. इन्हें दोबारा वार्ता करनी चाहिए. मिलिट्री कमांडर स्तर की वार्ता बिल्कुल समय जाया करने की बात है. अगर कुछ नतीजा निकलना है, तो विदेशमंत्री और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार स्तर की वार्ता होनी चाहिए.

भारत अपनी साइड पर है, वह चीन की शर्त क्यों मानेगा. चीनी जब ऐसी वार्ता में आते हैं, तो वे ऐसी शर्तें रखते हैं. यहां चीन ने कब्जा किया है, भारत ने नहीं किया है. वे लोग बफर जोन की बात करते हैं. हम क्यों अपनी जमीन पर बफर जोन बनायेंगे. गलवान में कुछ बफर जोन बने हैं. देपसांग में उन्होंने हमारी पेट्रोलिंग भी बंद करा दी है. चीन को जो कराना था, उसने करा दिया है. अब हमें वहां डटकर बैठना है. कूटनीतिक तरीके से उन्हें पीछे हटाना है. इसमें मिलिट्री विकल्प इस्तेमाल नहीं हो सकता है. फौजें हमेशा तैयार रहती हैं. पिछले िदनों हमने जो तैयारी की है, वह लद्दाख और पैंगोंग रेंज पर है. वहां हमारा गतिरोध बना हुआ है.

इन दोनों पहाड़ियों पर विवाद की स्थिति है. हम अभी 60-70 किलोमीटर आगे एलएसी पर हैं. एलएसी पर लड़ने का कोई मतलब ही नहीं था. हमें तो पीछे लड़ना है. अब एलएसी पर लड़ने की तैयारी करनी होगी, हालांकि, उसका खाका बन गया होगा. हथियारों और राशन का वहां भंडारण किया जा चुका है. रहने, खाने-पीने और हथियारों आदि का साथ-साथ बंदोबस्त हो रहा है. ठंड से पहले 31 अक्तूबर तक यह सब इकट्ठा करने का काम पूरा करना पड़ेगा. क्योंकि 1 नवंबर के बाद गाड़ियां नहीं चलेंगी. अगर कुछ आगे होगा, तो वह एयर के माध्यम से ही होगा. दौलत बेग ओल्डी, चुसुल में होगा.

लड़ाई की क्षमता होने के बावजूद इस महामारी की स्थिति में जब हमारी आर्थिक व्यवस्था नीचे आ गयी है, हमें युद्ध के बारे में नहीं सोचना चाहिए. जब कोई विकल्प नहीं बचेगा, तो सरकार को आखिर में उस विकल्प पर विचार करना ही पड़ेगा. सीडीएस बिल्कुल लास्ट की बात कह रहे हैं. वह भी कह रहे हैं कि अभी बातचीत चल रही है. अब कौन तय करेगा कि बातचीत असफल हो गयी है. मैं तो मानता हूं कि जो अभी बातचीत हो रही है, वह तो फेल हो गयी है. अब नयी बातचीत से क्या निकलता है, वह देखना है. उसके लिए विदेशमंत्री, एनएसए या फिर प्रधानमंत्री और शी जिनपिंग के स्तर से ही यह मामला हल हो सकता है.

(बातचीत पर आधारित.)

विज्ञापन
अशोक मेहता

लेखक के बारे में

By अशोक मेहता

अशोक मेहता is a contributor at Prabhat Khabar.

Prabhat Khabar App :

देश, एजुकेशन, मनोरंजन, बिजनेस अपडेट, धर्म, क्रिकेट, राशिफल की ताजा खबरें पढ़ें यहां. रोजाना की ब्रेकिंग हिंदी न्यूज और लाइव न्यूज कवरेज के लिए डाउनलोड करिए

Download from Google PlayDownload from App Store
विज्ञापन
Sponsored Linksby Taboola