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महामारी बनता वायु प्रदूषण

वाहनों के प्रदूषण, अनियोजित शहरीकरण जैसे कारणों से वायु प्रदूषण गंभीर होता जा रहा है. अगर हम नया आवासीय क्षेत्र बना रहे हैं, तो संभावित आबादी को देखते हुए कार्बन और गंदगी के निस्तारण की भी व्यवस्था जरूरी है.

By संपादकीय
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महामारी बनता वायु प्रदूषण
महामारी बनता वायु प्रदूषण
prabhat khabar

वायु प्रदूषण वर्षों से गंभीर समस्या का रूप लेता जा रहा है. हाल ही में विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने वायु प्रदूषण से संबंधित दिशा-निर्देशों में बदलाव किया है. तकनीकी विकास जैसे-जैसे मेडिकल साइंस में निगमित होता है, शोध और परिणाम बदलते रहते हैं. बीमारी के कारणों को चिह्नित करने और इलाज का तरीका भी बदलता है. इसी के अनुरूप नये सिरे से दिशा-निर्देश तैयार होते हैं. हर 10 में से नौ व्यक्ति वायु प्रदूषण से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष तौर पर प्रभावित होता है.

डब्ल्यूएचओ की रिपोर्ट में पीएम2.5 और पीएम10 के अलावा ओजोन, नाइट्रोजन डाइऑक्साइड, सल्फर डाइऑक्साइड और कॉर्बन मोनोऑक्साइड जैसे प्रदूषकों का भी जिक्र है. एक अन्य रिपोर्ट के मुताबिक, 2020 में दिल्ली में पीएम2.5 की सघनता निर्धारित स्तर से 17 गुना अधिक रही, जबकि मुंबई में आठ गुना, कोलकाता में नौगुना और चेन्नई पांच गुना अधिक दर्ज की गयी. डब्ल्यूएचओ ने ताजा शोध के आधार पर मानकों को सख्त बनाया है.

पहले हम मानते थे कि यदि पीएम2.5 की सघनता 25 माइक्रोग्राम प्रति घनमीटर तक है, तो वह सुरक्षित है, लेकिन अब डब्ल्यूएचओ का कहना है कि 15 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर की सघनता भी स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है. आम धारणा है कि वातावरण प्रदूषण केवल शहरों में होता है, गांवों में नहीं. लेकिन, जिस तरह ग्रामीण इलाकों में भी वाहनों की संख्या और आवागमन बढ़ रहा है, उससे वहां भी वायु प्रदूषित हो रही है. बस वहां का वायु गुणवत्ता सूचकांक शहरों से थोड़ा बेहतर है. लेकिन, सच्चाई है कि दोनों ही जगहें इंसान के रहने लायक नहीं है.

वायु प्रदूषण के कारण सालाना 70 लाख से अधिक मौतें होती हैं. इससे हर आयु वर्ग के लोग प्रभावित होते हैं. यहां तक कि मां के गर्भ में पल रहा बच्चा भी वायु प्रदूषण के हानिकारक प्रभावों की चपेट में आता है. इससे बच्चे की मौत हो सकती है या हो सकता है जन्म के बाद उसका वजन कम हो. मां के प्रदूषित हवा में सांस लेने से बच्चे की धमनियां कमजोर हो जाती हैं. बच्चे का वजन कम होने का कारण है कि गर्भावस्था में बच्चे को गर्भनाल से पर्याप्त पोषण नहीं पहुंच पाया. स्पष्ट है कि जन्म से लेकर अंतिम सांस तक हम वायु प्रदूषण का सामना कर रहे हैं.

किशोर और युवा भी इससे प्रभावित हैं. दमा, चर्मरोग, आंखों की तकलीफ, एलर्जी जैसी अनेक समस्याएं वायु प्रदूषण के कारण होती हैं. जो बच्चे बाहर धूप में निकलते और खेलते हैं, वे बीमार हो जाते हैं, जबकि पहले ऐसा नहीं था. लोग बचपन से ही दमे की चपेट में आ रहे हैं. ऐसा क्यों, इस पर कोई गंभीरता के विचार करने को तैयार नहीं है. वायु प्रदूषण से हर किसी को सांस की तकलीफ होती है.

इससे हृदयरोग की समस्या बढ़ रही है और मस्तिष्क व सोचने की क्षमता बाधित हो रही है. साफ हवा में रहनेवालों के मुकाबले प्रदूषित वायु में रहनेवाला व्यक्ति अधिक चिड़चिड़ा होता है. अगर कोई व्यक्ति लंबे समय तक प्रदूषणयुक्त इलाके में रहता है, तो कैंसर जैसी घातक बीमारी भी हो सकती है. फेफड़े के कैंसर और ब्लड कैंसर यानी ल्यूकीमिया जैसे अनेक तरह के कैंसर के खतरे बने रहते हैं.

वायु प्रदूषण के कारणों की बात करें, तो वाहनों के प्रदूषण, अनियोजित शहरीकरण जैसे कारणों से यह समस्या गंभीर होती जा रही है. अगर हम नया आवासीय क्षेत्र बना रहे हैं, तो संभावित आबादी को देखते हुए कार्बन और गंदगी के निस्तारण की भी व्यवस्था जरूरी है. मतलब खाने-पीने से कितनी गंदगी निकलेगी, गाड़ी से कितनी प्रदूषण होगा. बिजली और पानी की व्यवस्था, लोगों के आने-जाने से वायु गुणवत्ता प्रभावित होगी.

यह शहरीकरण की अनुमानित व्यवस्था होती है. हमें किसी इलाके में निश्चित आबादी के लिए संपोषणीय विकास की व्यवस्था तैयार करनी होगी. इसका तात्पर्य है कि जितनी भी गंदगी या कार्बन उत्सर्जन होगा, उसे नियंत्रित करने और दुष्प्रभावों को खत्म करने के लिए सीवर प्लांट, कंपोस्ट, हरित क्षेत्र आदि की व्यवस्था आवश्यक है. सुनियोजित शहरीकरण में ऐसी तमाम बातों और जरूरतों का ध्यान रखा जाता है.

प्रदूषण नियंत्रण के लिए पहले सीएनजी की व्यवस्था हुई, अब बैट्री संचालित वाहनों को लाया जा रहा है. लेकिन, उस बैट्री को चार्ज करने के लिए जो बिजली बनायी जा रही है, उससे कितना प्रदूषण होता है. भारत में व्यापक पैमाने पर कोयला संयंत्रों से बिजली तैयार होती है हाइड्रो पावर और नाभिकीय संयंत्रों से बिजली उत्पादन की व्यवस्था बहुत सीमित है.

कुल खपत का आठ प्रतिशत ही स्वच्छ ऊर्जा से आता है, शेष के लिए हम थर्मल पावर निर्भर हैं. कोयले के लिए वनों की कटाई करेंगे, कोयले से कार्बन डाइऑक्साइड निकलेगा. इससे बनी बिजली शहरों में की जायेगी, उससे बैट्री चार्ज होगी. स्पष्ट है कि वायु प्रदूषण को रोकने के लिए यह ठोस व्यवस्था नहीं है. अतः जरूरी है कि कारों को साझा किया जाये, सार्वजनिक यातायात की बेहतर व्यवस्था बने. नीति निर्माताओं को सुनिश्चित तरीके से ऐसी व्यवस्था बनाने पर विचार करना होगा.

दक्षिण एशिया में भूटान ही एक मात्र ऐसा देश है, जिसका कार्बन उत्सर्जन नकारात्मक है, यानी उसका प्रदूषण कम हैं और प्राकृतिक संसाधन प्रचुर हैं और वे संरक्षित हैं. जबकि भारत समेत अन्य दक्षिण एशियाई देशों में वायु गुणवत्ता चिंताजनक हैं. अतः हमें वातावरण प्रदूषण की चिंताओं पर कहीं अधिक गंभीरता से विचार करने की जरूरत है (बातचीत पर आधारित).

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