उत्तर प्रदेश की जटिलताएं

Updated at : 28 Mar 2017 6:11 AM (IST)
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उत्तर प्रदेश की जटिलताएं

राजीव सक्सेना वरिष्ठ पत्रकार गढ़वाल की पहाड़ियों के मूल निवासी अजय सिंह बिष्ट ने स्वप्न में भी नहीं सोचा होगा कि एक दिन उन्हें गंगा-यमुना के मैदानों में हिमालय से भी ऊंची चुनौतियों का सामना करना होगा. आज योगी आदित्यनाथ के अवतार में वे सामाजिक और आर्थिक पिछड़ेपन से ग्रस्त और त्रस्त उत्तर प्रदेश के […]

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राजीव सक्सेना
वरिष्ठ पत्रकार
गढ़वाल की पहाड़ियों के मूल निवासी अजय सिंह बिष्ट ने स्वप्न में भी नहीं सोचा होगा कि एक दिन उन्हें गंगा-यमुना के मैदानों में हिमालय से भी ऊंची चुनौतियों का सामना करना होगा.
आज योगी आदित्यनाथ के अवतार में वे सामाजिक और आर्थिक पिछड़ेपन से ग्रस्त और त्रस्त उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री हैं. भले ही उनके सेवा-भाव पर अभी से शंका करना उचित न हो, किंतु यह तो कोई नकार नहीं सकता कि योगी और उनके अधिकतर मंत्रिमंडलीय सहयोगियों को कोई कहने लायक शासन, प्रशासन, नियोजन, वित्तीय प्रबंधन आदि का अनुभव नहीं है. चुनौती अति विषम है. अदम्य संकल्प शक्ति, तुरत-फुरत सीखने की उत्कट लालसा और अभूतपूर्व क्षमता की आवश्यकता है. गोरखनाथ मंदिर के 44 वर्षीय महंत को अपनी नयी भूमिका सफलता से निभाने के लिए परिवर्तन को अपनाना होगा. राजनीतिक दांव-पेच और राजधर्म में बड़ा अंतर होता है.
उत्तर प्रदेश एक अजूबा है. भारत की राजनीतिक गंगोत्री उद्गम यहीं से होता है. 20 करोड़ से अधिक जनसंख्या वाला यह प्रदेश 80 सदस्य लोकसभा में भेजता है. साथ में जोड़िये राज्यसभा के 30 सदस्य तथा विधानसभा व विधान परिषद् के 505 विधायक. देश के 13 प्रधानमंत्रियों में से सात उत्तर प्रदेश के थे. गुजरात के बाशिंदे होने के बावजूद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी उत्तर प्रदेश की धार्मिक राजधानी वाराणसी से लोकसभा का रास्ता चुना.
विडंबना है कि ऐसी राजनीतिक थाती भी उत्तर प्रदेश को आज तक बीमारू प्रदेशों की श्रेणी से न निकाल सकी. देश के सबसे पिछड़े जिलों की फेहरिस्त में आज के दिन 16 उत्तर प्रदेश से हैं. वर्ष 1960 में यह संख्या 17 थी. यानी प्रदेश के राजनेताओं की प्राथमिकता में प्रगति और विकास कभी नहीं रहे. वस्तुतः राजनीतिक वर्ग उत्तर प्रदेश की घोर उपेक्षा का दोषी है. प्रदेश का दोहन अपनों द्वारा ही होता रहा है. पहचान की राजनीति ने हालात को बदतर कर दिया है, समाज को बांटा है. विकास के छोटे-बड़े लाभ समय-समय पर भिन्न-भिन्न जाति, धर्म, संप्रदाय आदि को तुष्ट करने के लिए झोंक दिये गये. जनता को तो कण-कण में मात्र भ्रष्टाचार के ही दर्शन होते हैं.
कोई आश्चर्य नहीं कि प्रदेश की विकास दर सदैव अन्य प्रदेशों से पीछे रही है. 2014-15 के आंकड़ों के अनुसार, उत्तर प्रदेश ने 6.1 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की. अखिलेश यादव सरकार के आने के समय तो यह मात्र 3.9 प्रतिशत थी. अधिकतम वृद्धि 7 प्रतिशत मायावती के राजकाल में देखी गयी. इस के विपरीत, मध्य प्रदेश ने 6.8 प्रतिशत, छत्तीसगढ़ ने 7.9 प्रतिशत, हरियाणा ने 8 प्रतिशत, झारखंड ने 11 प्रतिशत और बिहार ने 15.6 प्रतिशत की प्रशंसनीय विकास दर दर्ज की. उत्तर प्रदेश के राजनीतिक नक्कारखाने में वित्तीय प्रबंधन, आर्थिक अनुशासन और विकास की तूती के लिए कोई सुनवाई नहीं है.
आज भी तेंडुलकर तथा रंगराजन फॉर्मूलों के अनुसार उत्तर प्रदेश के 30 से 40 प्रतिशत निवासी गरीबी रेखा के नीचे घुट-घुट कर जी रहे हैं. रुपये 48,500 की प्रति व्यक्ति वार्षिक आय, राष्ट्रीय औसत की आधी है. गांव में तो यह आय मात्र 25,000 रुपये ही है. मजबूरन ग्रामीणजन आजीविका के लिए दूर-दराज के स्थानों और विदेश के लिए पलायन करते रहे हैं.
पांच वर्ष से काम आयु के 50 प्रतिशत बच्चे कुपोषण के शिकार हैं. 60 प्रतिशत घरों में शौचालय नहीं है. मात्र 67 प्रतिशत जनता साक्षर है, जबकि राष्ट्रीय औसत करीब 75 प्रतिशत है. 30 प्रतिशत से अधिक ग्रामवासी भूमिहीन हैं. जिनके पास भूमि है भी, तो वह जीवन-यापन के लिए पर्याप्त नहीं है. समस्या और जटिल बन गयी है, क्योंकि मात्र 50 प्रतिशत किसानों के पास सिंचाई के भरोसेमंद साधन हैं. ऐसे अधिकतर किसान पश्चिमी उत्तर प्रदेश में हैं, जहां जीवन-स्तर बाकी प्रदेश के मुकाबले काफी बेहतर है. बुंदेलखंड तो पथरीला रेगिस्तान बन गया है.
सत्ता में कोई भी राजनीतिक दल रहा हो, प्रदेश में क्षेत्रीय असुंतलन बरकरार रहा है. मांग उठती रही है कि उत्तर प्रदेश को चार भागों- पूर्वांचल, पश्चिमांचल, अवध मध्य भाग और बुंदेलखंड- में विभाजित किया जाये.
सरकारी विद्यालयों में देख-रेख के अभाव में शिक्षा दुर्दशा भोग रही है. डेढ़ लाख शिक्षक पद रिक्त हैं. पुलिस विभाग तो यूूं भी सत्तासीन पार्टी का ताबेदार रहता है, लेकिन एक सच अनदेखा नहीं किया जा सकता; ऐसे अहम महकमे में भी 1.90 लाख पद खाली पड़े हैं. फिर लचर कानून व्यवस्था पर अचरज कैसा?
भाजपा निस्संदेह अयोध्या में राममंदिर निर्माण के लिए प्रतिबद्ध है. योगी आदित्यनाथ इस संकल्प के लंबरदारों की प्रथम कतार में हैं. आशा है कि वे शीघ्र समझ लेंगे कि उत्तर प्रदेश की वास्तविक आवश्यकताएं कुछ भिन्न ही हैं.
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