द्रविड़ राजनीति का नया अध्याय

Updated at : 13 Feb 2017 6:27 AM (IST)
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द्रविड़ राजनीति का नया अध्याय

तमिलनाडु में 1967 से शुरू हुई द्रविड़ राजनीति के वर्चस्व की यात्रा आज पांच दशकों के बाद नये युग में प्रवेश कर रही है. आत्म-सम्मान, ब्राह्मणवाद-विरोध और विशिष्ट तमिल पहचान के आधार पर पेरियार की छत्रछाया में सीएन अन्नादुरई ने तब कांग्रेस को सत्ता से बेदखल किया था. बाद में एम करुणानिधि और एमजी रामचंद्रन […]

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तमिलनाडु में 1967 से शुरू हुई द्रविड़ राजनीति के वर्चस्व की यात्रा आज पांच दशकों के बाद नये युग में प्रवेश कर रही है. आत्म-सम्मान, ब्राह्मणवाद-विरोध और विशिष्ट तमिल पहचान के आधार पर पेरियार की छत्रछाया में सीएन अन्नादुरई ने तब कांग्रेस को सत्ता से बेदखल किया था.
बाद में एम करुणानिधि और एमजी रामचंद्रन तथा फिर जे जयललिता ने अपनी व्यापक लोकप्रियता और जनाधार से द्रविड़ राजनीति को आगे बढ़ाया. राज्य की सत्ता की बागडोर द्रमुक और अन्नाद्रमुक के हाथों में रही और इन पार्टियों ने कांग्रेस और भाजपा जैसी राष्ट्रीय पार्टियों को राज्य में जमीन नहीं बनाने दी तथा केंद्र की राजनीति में खास दबदबा बनाये रखा. हालांकि द्रविड़ आंदोलन की विचारधारा की धार पचास सालों में लगातार कुंद होती गयी, पर उसका सांकेतिक महत्व बरकरार रहा. जलीकट्टू के समर्थन में राज्य में हुए हालिए आंदोलन में उसकी झलक देखी जा सकती है.
दिसंबर में जयललिता का अंतिम संस्कार भी प्राचीन तमिल संस्कारों के अनुरूप किया गया था. लेकिन अन्ना द्रमुक में पार्टी और सरकार पर कब्जे के लिए पन्नीरसेल्वम और शशिकला नटराजन के गुटों में चल रहा घमसान तथा बीमारी के कारण वयोवृद्ध द्रमुक नेता करुणानिधि की अनुपस्थिति को देखते हुए कहा जा सकता है कि करिश्माई व्यक्तित्व और लोक-लुभावन नीतियों पर आधारित द्रविड़ राजनीति अब नये आवरण ओढ़ने की प्रक्रिया में है.
भले ही द्रमुक को करुणानिधि का तथा अन्नाद्रमुक के दोनों धड़ों को जयललिता का नाम जपना पड़ रहा है, परंतु जलीकट्टू पर पाबंदी को लेकर फैले असंतोष को नेतृत्व देने या उसे शांत करने में मौजूदा नेता असफल रहे. पन्नीरसेल्वम या शशिकला भले ही अन्नाद्रमुक पर कब्जा कर लें, पर स्वयं को जयललिता का असली वारिस साबित कर बतौर नेता उभर पाने में दोनों ही असफल रहे हैं. द्रमुक के स्टालिन अपने पिता की छाया से बाहर नहीं निकल सके हैं. ऐसा करुणानिधि, एमजीआर और जयललिता के मामलों में नहीं हुआ था. दोनों दलों के मौजूदा नेताओं को राज्य के अलग-अलग इलाकों में प्रभाव रखनेवाले जाति-आधारित छोटे-छोटे संगठनों को साधने में भी खासा मुश्किल हो रही है.
इस अनिश्चितता का एक बड़ा कारण द्रविड़ राजनीति का विचारधारा से विचलित होकर व्यक्तिगत निष्ठा पर केंद्रित होते जाना है, और आज जब लोकप्रिय नेता नहीं हैं, तो पार्टियों का भविष्य ही सवालों के घेरे में है. यह देखना बड़ा दिलचस्प होगा कि तमिलनाडु किस दिशा का रूख करता है तथा सामान्य नेताओं के हाथों में अन्नाद्रमुक और द्रमुक का रूप क्या होता है.
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