रेलवे क्रासिंग पर अतीत की यादें

Published at :02 Dec 2013 4:18 AM (IST)
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रेलवे क्रासिंग पर अतीत की यादें

।। शैलेश कुमार।। (प्रभात खबर, पटना)फुलवारीशरीफ रेलवे स्टेशन के पास की रेलवे गुमटी. किसी ट्रेन के आने की सूचना नहीं थी. फाटक खुले थे. फिर भी रेलवे ट्रैक के दोनों ओर वाहन रुके हुए थे. जाम-सा लग गया था. जगदेव पथ पर दोनों ओर वाहनों की लंबी कतार लगी थी. दो मिनट से ज्यादा हो […]

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।। शैलेश कुमार।।

(प्रभात खबर, पटना)
फुलवारीशरीफ रेलवे स्टेशन के पास की रेलवे गुमटी. किसी ट्रेन के आने की सूचना नहीं थी. फाटक खुले थे. फिर भी रेलवे ट्रैक के दोनों ओर वाहन रुके हुए थे. जाम-सा लग गया था. जगदेव पथ पर दोनों ओर वाहनों की लंबी कतार लगी थी. दो मिनट से ज्यादा हो गये. ट्रैफिक टस-से-मस नहीं हुआ. पता चला कि बिल्ली मौसी रास्ता काट गयी हैं. लोग इंतजार में हैं कि पहले कौन आगे बढ़े. ऐसा लगा रहा था मानो धरती वीरों से खाली हो गयी हो. यह जान कर मैं ठहाके लगा कर हंसा. ऑफिस के लिए देर हो रही थी. चेहरे पर बेचैनी की लकीरें उभर आयी थीं.

फिर भी मौसी के रास्ता काटने की बात सुन एक पल के लिए सब भूल गया. मन इतना ताकतवर है कि एक क्षण में वह भूत और दूसरे ही क्षण भविष्य में पहुंच जाता है. वही मेरे साथ भी हुआ. बचपन की एक बात याद आ गयी. पड़ोस की दीदी ने मुङो बताया कि अकेली मैना को देखना अशुभ है. जोड़ा देखना शुभ है. तीन देख लिया, तो चिट्ठी आयेगी. तब से जब भी एक मैना देखता, बाकी काम भूल मेरी नजरें दूसरी मैना की तलाश में जुट जातीं. जोड़ा देख लेता, तो मन खुशी से सातवें आसमान पर पहुंच जाता. और जब तीन देखता, तो नजरों को बस डाकिया का इंतजार रहता. आज चिट्ठी नहीं आती. इसलिए अब तीन मैना देखने पर तुरंत फेसबुक चेक करता हूं कि कहीं किसी का मैसेज तो नहीं आया.

थोड़ा और बड़ा हुआ, तो किसी ने कहा कि दही खा कर निकलो, तो काम अच्छा होगा. बस फिर क्या था, रोज स्कूल जाने से पहले, खेलने से पहले दही खाना शुरू कर दिया. यहां तक कि रात में अच्छे सपने देखूं, इसके लिए सोने से पहले दही खाने लगा. एक हफ्ते तक सब ठीक रहा. उसके बाद जुकाम इस कदर हुआ कि एक हफ्ते के लिए बेड रेस्ट पर जाना पड़ा. हां, एक फायदा हुआ, सात दिन पढ़ाई से छुट्टी मिली रही. घरवालों का खूब दुलार मिला सो अलग. घर से थोड़ी दूरी पर एक मैदान था. रोज शाम वहां क्रिकेट खेलने जाता था. वहां बरगद का पेड़ था. दोस्त कहते थे कि उस पर भूत रहते हैं. जब भी वहां गेंद लाने जाता था, तो हनुमान चलीसा पढ़ना शुरू कर देता था. एक बार कुछ लाइनें भूल गया.

मैंने दोस्तों को यह बात बता दी. रात में थोड़ा बुखार चढ़ गया. दोस्तों ने भी घर में मैदानवाली बात बता दी. फिर क्या था, दूसरे ही दिन मुङो ले गये एक मंदिर में. वहां लंबे और खुले केशवाली खुद भूत-सी दिख रही एक बूढ़ी बैठी थी. झाड़ से मेरे सिर पर उसने दो बार मार कर कहा कि भूत भाग गया है. पता चला कि झाड़ जोर से पटकने से सिर में चोट लगी और एक जगह सूजन आ गयी. बुखार भी कई दिनों बाद उतरा. खैर, रेलवे ट्रैक पर लौटता हूं. एक स्कूली बच्च वहां पहुंचा. पटरी खाली होते हुए भी जाम देख कर थोड़ा हैरान हुआ. फिर निश्चिंत भाव से आगे बढ़ गया. इसके बाद सबने राहत की सांस ली और रुकी हुई गाड़ियों को एकाएक देर होने लगी.

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