एक घपला, 40 लाशें
Published by :Prabhat Khabar Digital Desk
Published at :01 Jul 2015 5:50 AM (IST)
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देश के सार्वजनिक जीवन में गहरे पैठ बना चुके भ्रष्टाचार और हिंसा के सामने अब शासन के सिद्धांत और सामाजिक मूल्य बौने नजर आते हैं. मध्य प्रदेश व्यावसायिक परीक्षा मंडल (व्यापमं) के घोटाले और इससे जुड़े 40 से अधिक लोगों की मौतें इस त्रसदी के ज्वलंत उदाहरण हैं. क्या इन मौतों को महज एक संयोग […]
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देश के सार्वजनिक जीवन में गहरे पैठ बना चुके भ्रष्टाचार और हिंसा के सामने अब शासन के सिद्धांत और सामाजिक मूल्य बौने नजर आते हैं. मध्य प्रदेश व्यावसायिक परीक्षा मंडल (व्यापमं) के घोटाले और इससे जुड़े 40 से अधिक लोगों की मौतें इस त्रसदी के ज्वलंत उदाहरण हैं.
क्या इन मौतों को महज एक संयोग माना जाये और भाजपा तथा मध्य प्रदेश सरकार की इस बात पर यकीन कर लिया जाये कि इन मौतों के स्वाभाविक और प्राकृतिक कारण हैं? या यह संदेह जताया जाये कि ये साजिशें रच कर की जा रही हत्याएं हैं?
या फिर बीच की राह लेते हुए इन्हें रहस्यात्मक परिस्थितियों में हुई मौतें कह कर ऐसी ही अगली किसी खबर का इंतजार किया जाये? जवाब में चाहे जो विकल्प हमारे सामने हों, एक बात तो तय है कि यह प्रकरण भ्रष्टाचार और हिंसा के आतंक के सामने हमारी बेचारगी को फिर रेखांकित करता है. मरनेवाले, या मारे जानेवाले, वे लोग हैं जो इस घोटाले की अब तक की जांच में आरोपित हैं या संदेह के दायरे में हैं.
इनमें जहां डॉक्टर बनने की अभिलाषा पूरी करने के लिए पैसे देकर परीक्षा पास करनेवाले साधारण लोग हैं, वहीं मध्य प्रदेश के राज्यपाल का बेटा भी है, कोई अदना-सा कर्मचारी है तो कोई मेडिकल कॉलेज का डीन. आरोपितों और जेल में बंद लोगों में मुख्यमंत्री के निजी सचिव भी हैं और बड़े प्रशासनिक अधिकारी भी. अगर आरोपितों एवं गवाहों की मौतें उनके घरों या होटलों में हो रही हैं, तो जेल में भी खैर नहीं है.
जब यह बात सामने आ चुकी है कि व्यापमं का घोटाला वर्षो से चल रहा है और इसमें सत्ता के शीर्ष पर बैठे लोगों के भी नाम हैं, जिनमें कई लोगों के खिलाफ ठोस सबूत तक अदालत में सौंपे जा चुके हैं, तो फिर सवाल सिर्फ यह नहीं है कि सरकार, पुलिस और जांच की निगरानी कर रही अदालत क्या कर रही है या लगातार हो रही मौतों को रोका क्यों नहीं जा रहा है, बल्कि चिंता यह भी है कि कहीं कातिल ही मुद्दई, कोतवाल और मुंसिफ तो नहीं है!
हमारे राजनेता अपने प्रतिद्वंद्वियों पर आरोप लगाते रहते हैं, मीडिया और जनता भी किसी मसले पर कुछ दिन शोर-गुल मचाते हैं, जांच की घोषणाएं होती हैं और कुछ लोग जेल भेज दिये जाते हैं. बाद में मामला खटाई में पड़ जाता है और हम सब भूल जाते हैं.
फिलहाल व्यापमं घोटाला एक भयावह स्थिति की ओर संकेत कर रहा है, जहां सन्नाटा है, अंधेरा है, लाशें हैं, कानून है और गवाह भी. परंतु हत्यारों का पता नहीं है. क्या इसी लोकतंत्र के लिए बरसों पहले नियति के साथ करार किया गया था?
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