डॉ खगेंद्र ठाकुर : साहित्यिक आंदोलन का परचम

By Prabhat Khabar Digital Desk
Updated Date
राजेंद्र राजन
पूर्व महासचिव, प्रलेस
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हिंदी साहित्य के प्रसिद्ध आलोचक डॉ खगेंद्र ठाकुर का जाना हमारे समाज और साहित्य के लिए एक अपूरणीय क्षति है. प्रगतिशील लेखक संघ (प्रलेस) के राष्ट्रीय अध्यक्ष बननेवाले वह उसके वरिष्ठतम सदस्य भी थे और पूर्व महासचिव भी थे. वह जनशक्ति के संपादक भी रहे और उन्होंने दो दर्जन के करीब किताबें भी लिखी हैं.
अभी कुछ दिनों पहले तक वह अपने काम को लेकर सक्रिय थे. हां, उनकी तबियत जरूर खराब थी, लेकिन इस तरह वे अचानक चले जायेंगे, इसका किसी को विश्वास ही नहीं है. किसी भी तरह की परिस्थिति में वह कभी भी डिगते नहीं थे, हमेशा अविचल रहते थे. वह प्रलेस के तमाम आंदोलनों के साथ जुड़े रहे. इसलिए प्रलेस के सभी साथी उनके असामयिक निधन से स्तब्ध हैं.
झारखंड के गोड्डा में 9 सितंबर, 1937 को जन्मे खगेंद्र ठाकुर एक प्रतिबद्ध मार्क्सवादी चिंतक होते हुए भी साहित्यिक आंदोलन से अलग नहीं रह पाये.
साहित्य आलोचना के शीर्ष स्तंभ डॉ नामवर सिंह और कमला प्रसाद की तरह ही प्रगतिशलील लेखक संघ एवं आंदोलन के रहनुमाओं में खगेंद्र जी अग्रणी थे. बिहार प्रगतिशील लेखक संघ के 25 वर्षों तक महासचिव रहे और जिले-जिले की प्रलेस इकाइयों को गठित करना और साहित्यांदोलन को तेज करना उनके जीवन के साथ जुड़े हुए ऐतिहासिक दस्तावेज हैं. जनकवि नागार्जुन उनके अत्यंत करीबी थे.
नागार्जुन जब पटना आते थे, तो खगेंद्र जी के आवास पर ही ठहरते थे. स्वतंत्र भारत के सबसे बड़े संपूर्ण कवि नागार्जुन थे, तो एक संपूर्ण आलोचक खगेंद्र जी थे. उन्होंने आलोचना के साथ-साथ जो भी लिखा, वह सब भी अपने-आप में एक समृद्ध साहित्य है. आलोचना के क्षेत्र में उनकी ख्याति राष्ट्रीय स्तर पर मानी जाती है. आलोचना एवं वैचारिकी लेखों के साथ कविताएं भी लिखीं और व्यंग्य भी. साहित्य के हर विधा के समीक्षक एवं आलोचक के रूप में उनकी अद्भुत ख्याति रही है.
खगेंद्र ठाकुर सामाजिक चिंतक थे. आज पूरे देश को जिस सांप्रदायिकता से खतरा है, इसके विरुद्ध उनकी आवाज सबसे ऊंची रहती थी. देश के अंदर जातिवादी राजनीति, सांप्रदायिक राजनीति और अभद्र राजनीति के वह प्रखर विरोधी थे और हमेशा धर्मनिरपेक्षता के प्रखर समर्थक थे. कहीं पर भी वह अपने मूल्यों से समझौता नहीं करते थे.
भीष्म साहनी के बाद जब खगेंद्र जी प्रलेस के महासचिव बने, तब उन्होंने राष्ट्रीय स्तर पर अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभायी. वह हिंदी के साहित्यकर्मी तो थे ही, अहिंदी क्षेत्रों में भी उन्होंने उल्लेखनीय काम किया. अहिंदी क्षेत्रों में हमेशा उनकी जरूरत महसूस की जाती रही, क्योंकि वहां उन्होंने संवाद स्थापित किया और प्रलेस को सक्रिय भी बनाया. उनकी सबसे बड़ी खासियत यह थी कि उम्र और बीमारी उनके आड़े कभी नहीं आयीं और हाल-फिलहाल तक प्रलेस के सभी सम्मेलनों में उपस्थित रहे.
खगेंद्र जी ऐसे साहित्यकर्मी थे, जिन्हें पद की आकांक्षा कभी नहीं रही. पद हमेशा उनके पीछे रहा और जिम्मेदारी उनके आगे रही. यह सबसे बड़ी उनकी पहचान थी.
छोटी से छोटी जगह में भी हम उनके साथ आंदोलनों में शामिल रहे. संगठन और आंदोलन के लिए ही नहीं, वैचारिक प्रतिबद्धता के लिए भी वे हमारे प्रेरणास्रोत हैं. जब मैं महासचिव बना, तब मुझे सबसे ज्यादा मार्गदर्शन उन्होंने ही दिया. संयुक्त बिहार में सम्मेलनों में खगेंद्र जी की उपस्थिति साहित्यिक गरिमा बन जाती थी. वह नहीं होते, तो वह कार्यक्रम अधूरा माना जाता था. प्रलेस ही नहीं, बिहार के साहित्यिक आंदोलन के किसी भी मत को खगेंद्र जी से अलग नहीं माना जाता था.
साहित्य के माध्यम से जो राजनीतिक और वैचारिक जागरूकता उन्होंने पैदा की, उसका अभाव अब पूरे देश को खलेगा. खगेंद्र जी आजीवन साहित्य के अडिग योद्धा थे और अविश्राम यात्री थे. वह साहित्यिक आंदोलन का परचम और वैचारिक प्रतिबद्धता का बेहतरीन मिसाल थे.
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