समाज का दायित्वबोध

Updated at : 02 Jul 2019 7:12 AM (IST)
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समाज का दायित्वबोध

मनींद्र नाथ ठाकुर एसोसिएट प्रोफेसर, जेएनयू manindrat@gmail.com हंसों का एक जोड़ा अपनी यात्रा के दौरान रात गुजारने के लिए किसी गांव में रुक गया. गांव बिलकुल खाली था. रात भर एक उल्लू बहुत तेज आवाज निकालता रहा. हंसों को नींद नहीं आयी. हंस खीजकर अपनी हंसिनी से कहता रहा कि शायद इस उल्लू के कारण […]

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मनींद्र नाथ ठाकुर
एसोसिएट प्रोफेसर, जेएनयू
manindrat@gmail.com
हंसों का एक जोड़ा अपनी यात्रा के दौरान रात गुजारने के लिए किसी गांव में रुक गया. गांव बिलकुल खाली था. रात भर एक उल्लू बहुत तेज आवाज निकालता रहा. हंसों को नींद नहीं आयी. हंस खीजकर अपनी हंसिनी से कहता रहा कि शायद इस उल्लू के कारण ही लोग इस गांव से भाग खड़े हुए हैं.
सुबह होते ही उल्लू ने घोषणा कर दी कि हंसिनी उसकी पत्नी है और हंस उसे लेकर नहीं जा सकता है. हंगामा हो गया. हंस चीखता-चिल्लाता रहा. पंचायत बिठायी गयी. पंचों ने सोचा कि हंस तो चला जायेगा, लेकिन हमें तो उल्लू के साथ ही रहना है, उससे बनाकर ही रखने में भलाई है. इसलिए पंचों का निर्णय था कि हंसिनी उल्लू की पत्नी है और हंस को उसे साथ ले जाने का कोई अधिकार नहीं है. ऐसा करना उल्लू के साथ अन्याय करना होगा.
हंस बिलखते हुए उल्लू से गुहार करने लगा कि ऐसा क्यों कर रहे हो भाई. उल्लू का जवाब था कि रात भर गांव खाली होने का आरोप मुझ पर लगाते रहे, जबकि सच्चाई यह है कि ऐसे पंचों के कारण गांव खाली हो गया है.
यही कहानी हमारे समाज की हो गयी है. हम न्याय और अन्याय के बीच फर्क करना भूलते जा रहे हैं. जब लोग अन्याय को न्याय समझने लगें, उसके खिलाफ बोलना बंद कर दें, तो समाज मर जाता है.
पिछले कुछ समय से जो कुछ राज्य में हो रहा है, उससे तो यही लगता है कि हमारा समाज केवल जनसंख्या में बदलता जा रहा है. भीड़ बीच सड़क पर लोगों को मार दे रही है. बच्चियों के साथ बलात्कार हो रहा है. जिस व्यक्ति ने उनकी सुरक्षा का दायित्व लिया था, वही उसके ऊपर अन्याय कर रहा है. ऐसा तो नहीं हो सकता है कि लोगों को यह मालूम नहीं हो रहा होगा. ऐसा भी नहीं है कि यह सब केवल एक आदमी कर रहा होगा. फिर भी प्रतिरोध नहीं हो रहा है.
सैकड़ों बच्चे किसी अनजान बीमारी से मर गये. और ऐसा एक बार नहीं हुआ है, बार-बार हो रहा है. लेकिन हम खामोश होकर देखते रहे हैं. बिना किसी शोध के ही यह बता दिया गया कि लीची खाने से बच्चे मर रहे हैं.
एक इलाके की अर्थव्यवस्था लीची पर टिकी है, उस पर गहरा चोट कर दिया गया. लेकिन सब खामोश रहे. एक डॉक्टर मुझसे कह रहा था कि सबसे कठिन है यह साबित करना कि कोई भूख से मरा है. क्योंकि पोस्टमार्टम में यदि अनाज का एक भी दाना उसके पेट में मिल गया, तो फिर उसे कानूनी तौर पर भूख से मरा नहीं माना जा सकता है.
लेकिन, हम यह भूल जाते हैं कि भूख बीमारियों का कारण है और बीमारियां मौत की वजह हैं. क्या विडंबना है कि हमारे बच्चे कुपोषण के शिकार हैं और हम मौत का कारण बीमारी को बता रहे हैं. सरकार तो सूचनाओं पर काम करती है. लेकिन, क्या स्थानीय लोगों को यह पता नहीं है कि कुपोषण ही वहां की सबसे बड़ी बीमारी है? फिर उनका दायित्व क्या है?
हम राष्ट्रवाद को लेकर चिंतित हैं. लेकिन, राष्ट्र केवल भौगोलिक भूभाग तो नहीं हो सकता है. वहां की गरीब जनता और ये भूखे बच्चे भी तो राष्ट्र के ही अंग हैं.
हम कैसा राष्ट्र बना रहे हैं, जहां कोई तो खाते-खाते मर रहा है, और कोई भूख से अपनी जिंदगी गंवा रहा है. जिस राज्य में बड़ी-बड़ी गाड़ियों की बिक्री सबसे ज्यादा है, वहीं भूख और कुपोषण से मरनेवाले बच्चों की संख्या भी सबसे ज्यादा है. आखिर यह कैसी बिडंबना है? क्या हमारे समाज में कोई दायित्वबोध बचा हुआ है? यदि नहीं बचा है, तो फिर हम समाज नहीं हैं, केवल मनुष्यों का समूहभर हैं, जो अपने अलावा किसी और की फिक्र ही नहीं करता है.
अक्सर यह होता है कि जब ऐसी घटनाएं होती हैं, तो हम सरकार के खिलाफ आवाज बुलंद करते हैं. सही है कि यह सरकार का दायित्व है.
चिकित्सालयों की बदहाली के लिए सरकार जरूर जिम्मेदार है. लेकिन, हजारों लोग जो रोज वहां जाते हैं या उधर से गुजरते हैं, क्या उन्हें यह बदहाली दिखायी नहीं देती है? और यदि इसे वे देख पाते हैं, तो क्या उन्होंने कभी चुनाव में इसे मुद्दा बनाया? क्या कभी रसूखदार राजनेताओं को यह कह पाया कि आप हमारे शहर में तब तक नहीं आ सकते हैं, जब तक इस बदहाली का जवाब न दे दें?
हो सकता है कि हमारे समाज में राजनेताओं और नौकरशाहों का जमीर मर सा गया हो. क्या इसका भी कारण हम ही नहीं हैं? राज्य के किसी बड़े नेता ने मुझसे कहा कि यदि आप गाड़ियों के काफिलों के साथ जनता के बीच नहीं जायें, तो जनता आपको गंभीरता से नहीं लेगी.
कमाल है कि एक नेता का वजूद अब उसके व्यक्तित्व और कृतित्व से तय नहीं होता है, बल्कि गाड़ियों के काफिले से तय होता है. जब कोई नेता भीड़ जुटाने के लिए नाच का इंतजाम करता है, तो क्या हम वहां जाकर यह प्रमाणित नहीं करते हैं कि हम राजनीति की जगह नाच-तमाशा को ही ज्यादा गंभीरता से लेते हैं?
पिछले कई दशकों से हम सामाजिक न्याय की लड़ाई लड़ते रहे. उससे समाज में एक बदलाव भी आया. लेकिन, अब समझ में आ रहा है कि यह बदलाव काफी नहीं है.
इसमें एक सीमा से आगे न तो कुछ सामाजिक ही हो पाया है, न पर्याप्त न्याय ही हो पाया है. यह न्याय सामाजिक कम और व्यक्तिगत ज्यादा हो गया. इसने ऐसी अस्मिता की राजनीति को जन्म दिया, जिसमें हम न्याय और अन्याय का फर्क करना भूल गये. यदि अस्सी प्रतिशत संख्या सामाजिक रूप से पिछड़े लोगों की है और शिक्षा और चिकित्सा व्यवस्था चरमरा गयी है, तो ज्यादा तकलीफ किसे होगी, अस्सी प्रतिशत को या बीस प्रतिशत को?
ऐसे में, सामाजिक न्याय की राजनीति करनेवाले लोग किस पर अन्याय कर रहे हैं. सामाजिक न्याय की राजनीति को अस्मितावाद के अंधे कुएं से निकालकर एक न्यायपूर्ण समाज बनाने के प्रयास की ओर ले जाना बहुत जरूरी है. अब न्याय के लिए सामाजिक नीति की जरूरत है और समाज को न्यायपूर्ण राजनीति की अावश्यकता है.
समाज ही आदमी के स्वभाव का आईना है, जिसमें आदमी अपने व्यक्तित्व को सजाता-संवारता है. यदि आईना ही टेढ़ा हो, तो फिर आदमी सीधा कैसे हो सकता है?
यदि समाज धोखेबाज राजनेताओं को ही अपना आदर्श बनाता है, तो फिर धोखा ही समाज का आदर्श हो जाता है. सही राजनीति के लिए सही समाजनीति जरूरी है. बिहार राजनीतिक क्रांति के पहले एक सामाजिक क्रांति के इंतजार में है, और सामाजिक दायित्वबोध के जगने के इंतजार में है.
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