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vishesh aalekh

  • Jun 13 2019 7:10AM
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विश्व कप 1983 : जब भारतीय क्रिकेट टीम ने जीतना सीखा

विश्व कप 1983 : जब भारतीय क्रिकेट टीम ने जीतना सीखा

प्रतिभा और साहस के बल पर जब हमने उम्मीदों पंख लगा कर उड़ना सीखा. भारतीय क्रिकेट की  स्वर्णिम यात्रा के प्रत्यक्षदर्शी डॉ. विजय राणा के संस्मरण...


ये उन दिनों की कहानी है जब हमारे क्रिकेटर स्टार नहीं, बल्कि हमारे और आप जैसे इंसान हुआ करते थे. खेल प्रेमी उनके पास जा सकते थे, उनके साथ फोटो खिंचवा सकते थे, हाथ मिला सकते थे  और ऑटोग्राफ मांग सकते थे. ऐसे ही माहौल में 9 जून 1983 की सुबह जब मैं भारत और वेस्ट इंडीज़ का मैच कवर करने मैंचेस्टर के ओल्ड ट्रेफोर्ड मैदान पर पहुंचा तो दोनों टीमों के खिलाड़ी मैदान पर वार्म-अप कर रहे थे. यशपाल शर्मा फेंस पर खड़े होकर अपने कुछ परचित लोगों से गपशप कर रहे थे. मदन लाल, रोजर बिन्नी और सैय्यद किरमानी फील्डिंग का अभ्यास कर रहे थे तो श्रीकांत बल्लेबाज़ी का. आज के खिलाड़ी तो अभ्यास नहीं मानो मिलिट्री ड्रिल करते हैं. लेकिन उन दिनों अभ्यास के नाम पर मानो मज़ाक हुआ करता था. तभी दौड़ कर मैंने विकेट कीपर सैय्यद किरमानी को पकड़ लिया फोटो खिचवाने के लिए. मदन लाल और रोजर बिन्नी ने भी मुझे उपकृत किया.
 
और जब मैदान के दूसरे छोर पर वेस्टइंडीज के खिलाड़ियों पर नज़र डाली तो दिल में दहशत सी होने लगी. बब्बर शेर की तरह सधे क़दमों से चलने वाले कप्तान क्लाइव लायड फील्डिंग करते वक्त गेंद पर चीते की तरह झपटते थे. अनुभवी ग्रीनीज़ और हेन्स की सलामी जोड़ी और गेंद को बड़ी बेरहमी से मारने वाले दुनिया के सर्वश्रेष्ठ बल्लेबाज़ विव रिचर्ड्स.
 
गेंदबाज़ी एंडी रॉबर्ट्स की दिल दहलाने वाली रफ्तार और फास्ट बोलिंग के “रोल्स रोयस” कहे जाने वाले माइकेल होल्डिंग और 6 फुट 8 इंच लंबे जोल गार्नर किसी भी टीम का दम निकालने लिए काफी थे. लगभग एक घंटे के अभ्यास के दौरान मुझे विश्वास हो चला था कि 1975 और 1979 के विश्व विजेताओं को हराना भारत की इस नौसिखिया टीम के लिए असंभव होगा. लगभग एक वर्ष पहले देश के सबसे लोकप्रिय क्रिकेटर सुनील गावस्कर को हटा कर पतले दुबले पंजाबी नौजवान कपिल देव को कप्तान बनाया गया था. गावस्कर रूठे से नज़र आते थे. प्रतिभा के धनी मोहिंदर अमरनाथ, यशपाल शर्मा, श्रीकांत और संदीप पाटिल निश्चय ही विश्व स्तर के महान खिलाड़ी नहीं कहे जा सकते थे.
 
बोलिंग में कपिल देव के अलावा मदनलाल, बलविन्दर संधु, अमरनाथ और रोजर बिन्नी से ज़्यादा उम्मीदें नहीं थीं. स्पिन गेंदबाजी का स्वर्ण युग समाप्त हो गया था. बेदी, चन्द्रशेखर, वेंकट और प्रसन्ना के अवसान के बाद स्पिन गेंदबाज़ी का बोझ रवि शास्त्री के अनुभवहीन कंधों पर आ पड़ा था. प्रेस कक्ष में मेरे साथ बैठे अंग्रेज़ क्रिकेट एक्सपर्ट भारत की हार के प्रति आश्वस्त थे. भारत ने यशपाल शर्मा 89 रनों की सहायता से 60 ओवेरों के मैच में 262 रन जोड़ लिये. वर्षा के कारण खेल पूरा नहीं हो सका.
 
दूसरे दिन जब वेस्ट इंडीज की बारी आई तो कपिल देव, संधु और मदनलाल ने निहायत कंजूसी से गेंदबाजी की. बिन्नी और शास्त्री ने 3-3 विकेट लिये. वेस्ट इंडीज का कोई भी धुरंधर बल्लेबाज़ 25 से ज़्यादा रन नहीं बना सका. सबसे ज़्यादा रन बनाए तेज़ गेंदबाज एंडी रॉबर्ट्स ने – 37 रन. वेस्ट इंडीज की टीम 54.1 ओवर में 228 रन बना कर आउट हो गयी. 34 रन से मैच जीत कर भारत ने तहलका मचा दिया. 1975 और 1979 की विजेता टीम की विश्व कप में ये पहली हार थी. भारत के लिए ये एक अविश्वसनीय कहानी की शुरुआत थी. भारतीय क्रिकेट में एक नए युग की नींव राखी जा रही थी.
 
लेकिन क्रिकेट के जानकार इसे एक फ्लूक मान कर चल रहे थे. एक दिन का करिश्मा है. सफर लंबा है. उस टीम से जीत की क्या आशा की जा सकती थी जो पिछले दो विश्व कप में सिर्फ एक मैच जीत सकी थी, और वो भी ईस्ट अफ्रीका जैसी कमजोर टीम के खिलाफ. एक और चौंका देने वाली बात ये है पहले दो मैचों में बुरी तरह से विफल रहने के बाद भारत के सबसे सफल खिलाड़ी सुनील गावस्कर को अगले दो मैचों के लिए ड्रॉप कर दिया गया. टेस्ट क्रिकेट में लंबी पारियाँ खेलने वाले गावस्कर वन डे क्रिकेट के बल्लेबाज़ नहीं थे. 1983 के विश्व कप अभियान में उनकी भूमिका नगण्य रही थी. अफवाहें थीं कि वो अपने जूनियर कपिल देव की कप्तानी में खेलने से नाखुश थे. 6 पारियों में वो सिर्फ 59 रन ही बना सके.

संयोग से भारत ऑस्ट्रेलिया और वेस्ट इंडीज से अगले दो मैच हार गया. ऐसा लगा कि भारत प्रतियोगिता से बाहर होने वाला है. प्रतियोगिता में बने रहने के लिए अगले दो मैच जीतना ज़रूरी था. गावस्कर की फिर टीम में वापसी हुई. टनब्रिज वेल्स में ज़िम्बाब्वे के विरुद्ध खेले गये अगले मैच में भारत एक बार फिर हार के दरवाजे तक जा पहुंचा. 17 रन के स्कोर पर उसके 5 बल्लेबाज़ आउट हो चुके थे और फिर आये कपिल देव एक नया इतिहास बनाने के लिए. उन्होने 138 गेंदों में 175 नाबाद रन बना कर बाज़ी पलट दी.

विशेषज्ञों का मानना है कि वो वन-डे क्रिकेट के इतिहास की सर्वश्रेष्ठ पारी थी. लेकिन उस दिन  बीबीसी टेलिविजन की हड़ताल के कारण वो पारी टेलिविजन पर नहीं दिखाई सकी और न ही भविष्य के लिए रेकॉर्ड की जा सकी. अगला पड़ाव था चेम्सफोर्ड, जहां भारत को ऑस्ट्रेलिया के साथ होने वाले दूसरे मैच को जीतना ज़रूरी था. भारत ने 60 ओवर में 247 रन बनाये और फिर मदन लाल ने 3 विकेट और कपिल देव और रोजर बिन्नी दो दो विकेट लेकर ऑस्ट्रेलिया को सिर्फ 39 ओवर में 129 रन पर आउट कर दिया.
 
बाद में कपिल देव ने कहा की ऑस्ट्रेलिया को हारने के बाद हमे विश्वास होने लगा था कि हम वर्ल्ड कप जीत सकते हैं. सेमीफाइनल में मुक़ाबला मेजबान इंग्लैंड से था. कपिल देव ने 35 रन देकर 3 विकेट लिये. एक बार फिर बिन्नी और मदन लाल ने दो-दो विकेट लेकर किफ़ायती गेंदबाजी में उनका साथ देते हुए इंग्लैंड को 213 रनो पर पवेलियन वापस भेज दिया. जवाब में यशपाल शर्मा ने 61, संदीप पाटिल ने 51 और मोहिंदर अमरनाथ ने 46 रन बनाकर भारत को फ़ाइनल में पहुंचा दिया.
 
25 जून 1983 को ऐतिहासिक लॉर्ड्स मैदान में भारत को रॉबर्ट्स, मार्शल, होल्डिंग और गार्नर जैसी  दुनिया की सबसे ख़तरनाक चौकड़ी का सामना करना था. जब सिर्फ 183 के स्कोर पर भारत की टीम आउट हो गयी तो लॉर्ड्स में बैठे सभी अनुभवी विशेषज्ञ भारत की हार कि भविष्यवाणियां करने लगे. दिल तो हम भारतीय पत्रकारों के भी बैठ गये थे, लेकिन मन के एक कोने में कहीं किसी अनहोने चमत्कार की जोत जलती रही. और हुआ भी वही.

ग्रीनिज सिर्फ 5 रन बना कर आउट हो गये. ये चमत्कार किया बल्लू यानि कि बलविंदर संधु ने. जिनके बारे में ये कह कर मज़ाक उड़ाया जाता था कि वो दुनिया में सबसे धीमी गति के माध्यम तेज़ गेंदबाज़ थे. 50 के स्कोर पर मदन लाल ने डेस्मंड हेन्स को आउट किया, लेकिन दूसरे छोर पर वीवियन रिचर्ड्स ने रनो की लूट मचा रखी थी. लगता था कि कुछ देर और क्रीज़ पर ठहरे तो भारत की हार पक्की थी. तभी एक और चमत्कार हुआ.

मदन लाल की एक गेंद रिचर्ड्स के बल्ले के ऊपरी छोर से लग कर हवा में उछली. कपिल देव ने लगभग  25 मीटर उलटे दौड़ते हुए डीप-स्क्वायर-लेग में एक शानदार कैच लिया और भारत के लिए जीत के द्वार खोल दिये. वेस्ट इंडीज का स्कोर था 3 विकेट पर 57 रन. 66 के स्कोर पर गोम्ज़ और कप्तान क्लाइव लायाड भी पवेलियन लौट गये. दूजों और मार्शल के सीमित प्रतिरोध के बावजूद, बाज़ी अब वेस्ट इंडीज के हाथ से निकल चुकी थी. 52 ओवर में दुनिया के महान बल्लेबाजों की वो टीम सिर्फ 140 रन बना कर आउट हो गयी.

स्टेडियम में बैठे हजारों भारतवंशी हाथ में तिरंगा लेकर लॉर्ड्स की मखमली घास को रोंदते, लाल पत्थर कि बाल्कनी के नीचे जमा हो गये. परंपराओं की जंजीरों में बंधे लॉर्ड्स मैदान पर जहां लोग तालियां भी गिन कर बजाते हों वहां अंग्रेज़ पत्रकारों ने अनियंत्रित भीड़ की आपाधापी का ऐसा दृश्य पहले कभी नहीं देखा था और जब कप्तान कपिल देव ने प्रूडेंशियल कप अपने हाथों में उठाया तो ऐसा लगा कि इंडिया, इंडिया के शोर में सारा लंदन डूब जाएगा.
 
(लेखक बीबीसी हिंदी के पूर्व संपादक रहे हैं.)

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