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  • Apr 9 2018 10:38AM
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राहुल सांकृत्यायन की 125वीं जयंती पर श्रद्धांजलि: जीवन के 45 साल घुमक्कड़ी में गुज़ारे

राहुल सांकृत्यायन की 125वीं जयंती पर श्रद्धांजलि: जीवन के 45 साल घुमक्कड़ी में गुज़ारे

राहुल सांकृत्यायन हिंदी साहित्य के एक ऐसे महापंडित थे, जिन्होंने यात्रा वृतांत या यूं कहें कि यात्रा साहित्य के क्षेत्र में अभूतपूर्व योगदान दिया. बौद्ध धर्म पर शोध के लिए उन्होंने तिब्बत से लेकर श्रीलंका तक भ्रमण किया था. इसके अलावा उन्होंने मध्य-एशिया तथा कॉकेशस भ्रमण पर भी यात्रा वृतांत लिखे जो साहित्यिक दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण माने जाते हैं. राहुल सांकृत्यायन की आज जयंती हैं, यह उनकी 125वीं जयंती है. 14 तारीख को उनकी पुण्यतिथि भी है. राहुल सांकृत्यायन ने बौद्ध धर्म पर शोध के लिए काफी यात्राएं की और कई दुर्लभ ग्रंथों की खोज में हजारों मील पैदल भटके, वे कई दुर्लभ ग्रंथों को खच्चर पर लादकर अपने देश लाये थे. आधुनिक हिंदी साहित्य में राहुल सांकृत्यायन एक यात्राकार, इतिहासविद्, तत्वान्वेषी, युगपरिवर्तनकार साहित्यकार के रूप में जाने जाते हैं. उनकी 125वीं जयंती पर उन्हें श्रद्धांजलि देते हुए प्रसिद्ध साहित्यकार ध्रुव गुप्त ने लिखा है-

 
जब चल पड़े सफ़र पे तो क्या मुड़ के देखना !

-ध्रुव गुप्त-
'महापंडित', 'आधुनिक बुद्ध' और 'घुमक्कड़ मनीषी' के नामों से प्रसिद्ध स्व राहुल सांकृत्यायन उर्फ केदार नाथ पांडेय भारतीय साहित्य और संस्कृति के सबसे विराट व्यक्तित्वों में एक रहे हैं. यायावर बौद्ध भिक्षु से लेकर सजग मार्क्सवादी चिंतक तक की उनकी जीवन-यात्रा इतने मुकामों और विविधताओं से गुज़री है कि उसपर सहसा यकीन करना मुश्किल हो जाता है. उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ जिले के एक छोटे से गांव पनदाहा में 9 अप्रैल, 1893 में जन्मे राहुल जी का झुकाव किशोरावस्था में ही बौद्ध धर्म की ओर हो गया. बौद्ध धर्म में दीक्षा लेकर वे केदार नाथ पांडेय से राहुल सांकृत्यायन बने और पाली, प्राकृत, अपभ्रंश, आदि भाषाएं सीखीं. बौद्ध भिक्षु के रूप में अपने जीवन के 45 साल घुमक्कड़ी में गुज़ारे.

उनके जीवन का मंत्र था - कमर बांध लो भावी घुमक्कड़ों, संसार तुम्हारे स्वागत के लिए बेकरार है'. घुमक्कड़ी उनके लिए आदत नहीं, धर्म थी. इस दौरान उन्होंने सड़क मार्ग से नेपाल, श्रीलंका, चीन, ईरान, मध्य एशिया और तिब्बत की निरंतर यात्राएं की.  यह यायावरी निरर्थक नहीं, अपनी विलुप्त संस्कृति की तलाश का एक अनुपम अनुष्ठान था. तिब्बत की दुर्गम घाटियों में उन्होंने हजारों विलुप्त बौद्ध ग्रंथों की पांडुलिपियों, पाली और प्राकृत साहित्य, धर्म और दर्शन की अमूल्य पुस्तकों और चित्रों की खोज की जिन्हें सदियों पहले विदेशी हमलावरों से बचाने के लिए कुछ बौद्ध भिक्षु नालंदा और विक्रमशिला विश्वविद्यालयों से चोरी- चोरी तिब्बत ले गये थे. यातायात के साधनों के अभाव में उन असंख्य ग्रंथों को उन्हें खच्चरों पर लादकर अपने देश में लाना पड़ा था. यह ख्याल भी हैरान करता है कि यह अमूल्य खज़ाना कितने परिश्रम से उन्होंने वापस अपने देश लाया होगा.  ये तमाम पांडुलिपियां और ग्रंथ पटना संग्रहालय की राहुल सांकृत्यायन दीर्घा में सुरक्षित हैं.
यायावरी से लौटने के बाद राहुल जी ने देश में ज़ारी स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय भागीदारी की. ब्रिटिश साम्राज्यवाद के खिलाफ उनके लेखों और भाषणों ने देश की गुलामी के खिलाफ जनमत तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाईं. अपने ब्रिटिश शासन-विरोधी भाषणों और लेखों के लिए उन्हें तीन साल के कारावास की सज़ा भी झेलनी पड़ी थी.

राहुल जी मार्क्सवाद के गहन अध्येता थे. अपने परवर्ती जीवन -काल में वे मार्क्सवाद से गहरे रूप से जुड़े और आजीवन मार्क्सवादी बने रहे. राहुल जी जनसरोकार के कई आंदोलनों में सक्रिय भूमिका निभाने के अलावा बिहार के किसान-आंदोलन में भी नज़दीकी से जुड़े. 1940  के किसान-आंदोलन के सिलसिले में उन्हें एक वर्ष की जेल हुई. किसान आंदोलन के उस समय के सर्वमान्य नेता स्वामी सहजानंद सरस्वती ने उन्हें अपने चर्चित द्वारा साप्ताहिक अखबार ‘हुंकार’ का संपादक बनाया. बिहार प्रांतीय किसान सभा के अध्यक्ष रूप में वे जमींदारों के आतंक के खिलाफ किसान सत्याग्रहियों के साथ हाथ में हंसिया लेकर कई बार साथ खेतों में उतरे और गन्ने की फसलें काटीं. जमींदारों के लठैतों ने कई बार प्राणघातक हमले कर उन्हें लहुलुहान किया पर वे हिम्मत नहीं हारे. किसान आंदोलन के दौरान वे बिहार की मिट्टी, जनजीवन और संस्कृति से निकटता से जुड़े.
 
राहुल जी हिंदी, भोजपुरी और संस्कृत के अलावा पाली, प्राकृत, इंग्लिश, रसियन, फ्रेंच, सिंहली, तमिल, कन्नड़, अरबी और फ़ारसी भाषाओं के विद्वान् थे. उन्होंने कई भाषाओं में उपन्यास, नाटक, यात्रा-वृतांत, संस्मरण जैसी विधाओं और इतिहास, दर्शन, धर्म, भाषाशास्त्र, व्याकरण और मार्क्सवाद जैसे विषयों पर एक सौ से ज्यादा पुस्तकों की रचना की. हिंदी यात्रा-सहित्य के तो वे पितामह कहे जाते हैं. उनके यात्रा-वृत्तांत हिंदी साहित्य की अनमोल धरोहर हैं. इतिहास को देखने, समझने और लिखने की उनकी दृष्टि भी सबसे अलग थी. उनका मानना था कि अतीत के प्रगतिशील प्रयत्नों को सामने लाकर पाठकों के हृदय में आदर्शों के प्रति लगाव पैदा किया जा सकता है.

उनके उपन्यासों और कहानियों में इतिहास की उनकी समझ और उनकी मानवीय संवेदनाएं महसूस की जा सकती है. लोक-नाट्य परंपरा को वे संस्कृति का वाहक मानते थे. उनकी समझ थी कि लोकनाटक और लोकमंच के माध्यम से किसी भी जनांदोलन को धार और प्रसार दिया जा सकता है. उन्होंने अपनी भाषा भोजपुरी में राहुल बाबा के नाम से कई नाटकों की रचना की. सामाजिक प्रतिकार इन नाटकों का मूल विषय है. राहुल जी की कुछ बहुचर्चित पुस्तकें हैं - वोल्गा से गंगा , दिवोदास, किन्नर देश, विस्मित यात्री, भागो नहीं दुनिया को बदलो, बीसवी सदी, पांच भोजपुरी नाटक, मध्य एशिया का इतिहास, मेरी जीवन-यात्रा, बचपन की स्मृतियां, सरदार पृथ्वी सिंह, महामानव बुद्ध, ऋग्वैदिक भारत, घुमक्कड़ शास्त्र, कार्ल मार्क्स, लेनिन, स्टालिन एवं माओ त्से तुंग आदि .
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