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  • May 21 2019 9:12AM
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स्मार्टफोन और सोशल मीडिया छीन रहा हमारी नींद, बज रही है खतरे की घंटी

स्मार्टफोन और सोशल मीडिया छीन रहा हमारी नींद, बज रही है खतरे की घंटी

भागदौड़ से भरी हमारी जिंदगी में नींद दूर होती जा रही है. स्मार्टफोन और सोशल मीडिया नींद के सबसे बड़े दुश्मन बनते जा रहे हैं. हमारी लाइफ स्टाइल कुछ इस तरह की होती जा रही है कि देर रात तक जागना सामान्य बात हो गयी है. मार्निंग स्कूल होने के कारण बच्चे देर से तो सोते हैं लेकिन जल्दी जग जाते हैं जिसके कारण उनकी नींद पूरी नहीं हो पा रही है. ऐसे में डाॅक्टरों का मानना है कि  अगर आप पर्याप्त नींद नहीं ले पा रहे हैं, तो आपकी दिमागी क्षमता कम हो सकती है. जी हां, नींद नहीं होने से दिमाग को पर्याप्त आराम नहीं मिल पाता जिससे उसकी कार्यक्षमता प्रभावित होती है.

केस 1

चौथी कक्षा में पढ़ने वाला अनुराग, बदला हुआ नाम, देर रात को सोता है लेकिन सुबह पांच बजे ही स्कूल की तैयारी के लिए उठ जाता है. क्लास में उसे अक्सर ही नींद आती रहती है. उसे सोता देख उसके साथी उसका मजाक भी उड़ाते हैं. टीचर जब उससे सवाल पूछते हैं तो वह जवाब नहीं दे पाता और उसका रिजल्ट लगातार खराब होता जा रहा है.

केस 2

राहुल, एक कॉरपोरेट कंपनी में काम करता है. रात में घर आने के बाद उसे घंटों सोशल मीडिया पर वक्त बिताने की आदत है. नतीजा यह होता है कि रोजाना ही रात के दो बजे के आस-पास वह सोता है. ऑफिस समय पर जाने के लिए सुबह जल्दी उठना भी उसकी मजबूरी है. ऐसे उसकी नींद पूरी नहीं हो पाती. नींद नहीं पूरी होने के कारण दिन भर उसका मन अशांत रहता है.

ये दोनों केस बताते हैं कि अच्छी नींद नहीं लेने के कारण किस तरह की परेशानी हमें हो सकती है. आज शहर के लोग बड़ी संख्या में अनिंद्रा के शिकार हैं. इसमें बच्चों से लेकर युवा शामिल हैं.बच्चों में नींद कम लेने का बड़ा कारण स्कूल भी हैं. मॉर्निंग स्कूल होने के कारण बच्चों को लगभग 5 बजे ही उठना पड़ता है. ऐसे में उनकी नींद पूरी नहीं होती. वहीं स्मार्टफोन और सोशल मीडिया पर देर रात तक वक्त देने के कारण युवा अपनी नींद में कटौती कर रहे हैं.

रात के दो-तीन बचे तक लोग चिपके रहते हैं फोन से

नींद पर एक थ्योरी यह है कि नींद के दौरान हमारा दिमाग यादाश्त को सही से व्यवस्थित करता है. कटु अनुभवों से निपटने में भी नींद हमारी मदद करती है. रिसर्च बताती है कि अगर आप पहले से ही कुछ ज़्यादा देर तक सो लें, तो बाद में कम नींद के नुकसान से कुछ हद तक बच सकते है. अगर आप कम नींद ले पाते हैं तो दिन में थोड़ी देर के लिए झपकी लेकर इससे होने वाले नुकसान को कम कर सकते हैं. प्राकृतिक तौर पर झपकी लेने का समय दोपहर 2 से 4 बजे के बीच होना चाहिए जिससे रचनात्मकता बढ़ती हैं.

पैरेंट्स को सजग रहने की है जरूरत

मनोचिकित्सक बिंदा सिंह कहती हैं कि बच्चों में नींद नहीं आने की सबसे बड़ी वजह मोबाइल है. बच्चे देर रात मोबाइल का इस्तेमाल करते हैं. इस कारण वह अच्छी नींद नहीं ले पाते हैं. कई पैरेंट्स बच्चों की शिकायत लेकर मेरे पास आते हैं. इसमें सबसे ज्यादा क्लास छठी से 12वीं तक के बच्चे रहते हैं. उन्हें मोबाइल का एडिक्शन हो जाता है. गेम सबसे ज्यादा इनके जीवन को प्रभावित कर रहा है. खान-पान भी सही से नहीं हो पाता है. इस कारण बहुत सारी बीमारियों की गिरफ्त वे आ जाते हैं. इस मामले में पैरेंट्स को सजग रहने की जरूरत है. पैरेंट्स भी घर में मोबाइल का अत्याधिक इस्तेमाल न करें. अगर बच्चे अच्छी नींद नहीं लेंगे तो क्लास में वे सो जायेंगे. इसका असर उनकी पढ़ाई पर पड़ेगा. स्कूल में सोने के कई मामले आये हैं. बच्चे से पूछने पर पता चलता है कि वह अच्छी नींद नहीं ले पा रहे हैं.

आठ घंटे की नींद जरूरी

न्यूरोलॉजिस्ट डॉ सुजाय सान्याल कहते हैं कि नींद कम लेने वाले पढ़ाई हो या काम दोनों जगहों पर ध्यान नहीं दे पाते. नींद कम लेने का सीधा असर स्मरण शक्ति पर पड़ता है. कई दूसरी बीमारियों का भी शिकार कम नींद लेने वाले हो सकते हैं. इसलिए अगर आप अच्छा स्वास्थ्य चाहते हैं तो आठ घंटे की नींद जरूर ले. अच्छी नींद दिन भर आपको ताजा रखती है.

नींद को प्रभावित कर रहा है मोबाइल

स्टूडेंट ऑक्सीजन मूवमेंट के संयोजक विनोद सिंह का मानना है कि नींद भाेजन से थोड़ी भी कम महत्वपूर्ण नहीं है. अगर आप को इसे चेक करना है तो दो दिन सही से नहीं सोये आपको इसका महत्व पता चल जायेगा. मोबाइल फोन हमारी नींद को प्रभावित कर रहा है इसलिए सोते समय इससे दूर रहें. स्कूल मॉर्निंग होने के कारण बच्चे पूरी नींद नहीं ले पा रहे है इससे उन्हें क्लास रूम में नींद आती है. साथ ही साथ बच्चों में सीखने की क्षमता भी प्रभावित हो रही है. अच्छी नींद हमारे लिए बेहद जरूरी है.

क्यों जरूरी है अच्छी नींद लेना

डॉक्टरों का मानना है कि नींद पूरी नहीं होने पर दिमाग अनावश्यक विचारों और भावों को समाप्त नहीं कर पाता जो कि दिमाग की सफाई की तरह है. ऐसी हालत में दिमाग तेजी से काम नहीं कर पाता. इससे सिरदर्द व चिड़चिड़ापन भी पैदा हो सकती है. नींद दिमाग के लिए पोषण का काम करती है और मानसिक स्वास्थ्य को बेहतर बनाती है, जिससे अच्छी नींद लेने के बाद आप ताजगी महसूस करते हैं. जबकि नींद पूरी नहीं होने पर दिन भर दिमाग के भारीपन का एहसास होता है. लंबे समय तक कम नींद लेने वाले जल्दी तनाव की चपेट में आ जाते हैं और अगर यह तनाव लगातार बना रहता है तो यह आपको मानसिक रूप से बीमार भी कर सकता है. नींद पर हुई एक स्टडी बताती है कि जो लोग लगातार नींद कम लेते हैं उनके दिमाग में संकुचन अधिक होता है. ऐसे लोग पूरी तरह से अपने दिमाग का इस्तेमाल नहीं कर पाते.

नींद को लेकर एक रिपोर्ट कहती है कि हमें रोजाना आठ घंटे की नींद की जरूरत होती है. लेकिन 30 प्रतिशत  लोगों को प्रति रात छह घंटे से कम नींद मिलती है. अगर आप लगातार 12 रातों तक छह घंटे से  कम सोते रहे हैं, तो आपकी चुस्ती और चेतना वैसी ही होगी जैसे कि आपके रक्त  में 0.1 प्रतिशत अल्कोहल के बाद होगी.  इसका असर आप पर यह दिखेगा कि आपका बोलना साफ़ नहीं होगा, संतुलना  बिगड़ा हुआ होगा और यादाश्त भी तेज़ नहीं होगी. इसे दूसरे शब्दों में कहें तो  आप नशे में होंगे.

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