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vishesh aalekh

  • Dec 14 2018 11:31PM
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मंगलमय जीवन का ग्रंथ है गीता

मंगलमय जीवन का ग्रंथ है गीता
गीता ग्रंथ का प्रादुर्भाव मार्गशीर्ष मास में शुक्लपक्ष की एकादशी को कुरुक्षेत्र में हुआ था. ब्रह्मपुराण के अनुसार मार्गशीर्ष शुक्ल एकादशी के दिन द्वापर युग में भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को भगवद् गीता का उपदेश दिया था, इसीलिए यह तिथि गीता जयंती के नाम से मनायी जाती है. 
 
इस बार यह मंगलवार, 18 दिसंबर को मनायी जायेगी. इस ग्रंथ में छोटे-छोटे 18 अध्यायों में संचित ज्ञान मानव मात्र के लिए बहुमूल्य रहा है. आज जब मनुष्य भोग विलास, भौतिक सुखों, काम वासनाओं में जकड़ा हुआ है और एक-दूसरे का अनिष्ट करने में लगा है तब गीता का ज्ञान ही उसे समस्त अंधकारों से मुक्त कर सकता है. 
 
जब तक मानव इंद्रियों की दासता में है, भौतिक आकर्षणों से घिरा हुआ है, तथा भय, राग, द्वेष एवं क्रोध से मुक्त नहीं है तब तक उसे शांति एवं मुक्ति का मार्ग प्राप्त नहीं हो सकता.
 
 कहा गया है कि शुद्धा, विद्धा और नियम आदि का निर्णय यथापूर्व करने के अनंतर मार्गशीर्ष शुक्ल दशमी को मध्याह्न में जौ और मूंग की रोटी व दाल का एक बार भोजन कर द्वादशी को प्रातः स्नानादि करके उपवास रखना चाहिए.
 
 भगवान का पूजन करें और रात्रि में जागरण करके द्वादशी को पारण करें. यह एकादशी मोह का क्षय करनेवाली है. इस कारण इसे मोक्षदा एकादशी भी कहते हैं. भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं- मैं महीनों में मार्गशीर्ष का महीना हूं.
 
 इसके पीछे मूल भाव यह है कि मोक्षदा एकादशी के दिन मानवता को नयी दिशा देनेवाली गीता का उपदेश हुआ था. इसके पठन-पाठन श्रवण एवं मनन-चिंतन से जीवन में श्रेष्ठता के भाव आते हैं. गीता केवल लाल कपड़े में बांधकर घर में रखने के लिए नहीं, बल्कि उसे पढ़कर संदेशों को आत्मसात करने के लिए है. गीता का चिंतन अज्ञानता के आचरण को हटाकर आत्मज्ञान की ओर प्रवृत्त करता है.
 

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