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  • Jul 16 2019 7:50AM
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महत्वाकांक्षी लक्ष्य की चुनौतियां

प्रभु चावला
एडिटोरियल डायरेक्टर 
द न्यू इंडियन एक्सप्रेस
prabhuchawla
@newindianexpress.com
 
गणितज्ञ सदियों से ब्रह्मांड की गुत्थियां सुलझाने के लिए संख्याओं का इस्तेमाल करते रहे हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के शासन में लक्ष्यों का गणित ही उपलब्धियों एवं उनकी सफल डिलीवरी के साधन तय करता रहा है. 
 
मोदी एक अनूठे सांख्यिकीय जादूगर हैं, जिनकी विजयी गणनाएं प्रत्येक चुनावों में भाजपा के लिए विशाल बहुमत जुटाती रही हैं. उनके सौभाग्य का सूत्र सर्वथा सटीक है: पहले संख्याएं तय करें, फिर उनके लिए उपयुक्त क्रियाविधि तलाशें. विपक्ष मोदी की महत्वाकांक्षी परियोजनाओं की कामयाबी के आकलन में असफल रहा, जिसने भारत के तीन-चौथाई से भी अधिक हिस्से से उसे मिटा दिया. 
 
चाहे वह महिलाओं को एलपीजी गैस सिलिंडर का वितरण हो, किसानों को ऋण वितरण हो, सस्ते मकानों का निर्माण या डिजिटलीकरण, इत्यादि हो, प्रधानमंत्री ने यह सुनिश्चित किया कि कार्य प्रदर्शन हेतु सभी हितभागी या तो साथ आएं अथवा रास्ता साफ करें. 
 
‘बड़ी सोच’ मोदी के असाधारण मस्तिष्क के लिए एक मामूली हिस्साभर है. मुख्य बाधा यह है कि जब क्रियान्वयन की बात आती है, तो उनका स्थूलकाय प्रशासनिक एवं सियासी तंत्र उन्हें नीचा दिखा जाता है. जब मोदी ने यह कहा, तो वे इसी खतरे के प्रति सावधान थे कि ‘भारत को पांच लाख करोड़ की अर्थव्यवस्था बनाने का लक्ष्य चुनौतीपूर्ण जरूर है किंतु राज्यों के समन्वित प्रयासों से शक्य भी है.’ 
 
उन्होंने अपने प्रथम पूर्णकालिक वित्त मंत्री निर्मला सीतारामण को राष्ट्र से एक साहसिक प्रतिबद्धता व्यक्त करने का निर्देश दिया और उन्होंने बेहिचक इसका पालन किया. अपने 135 मिनटों के भाषण के दौरान उन्होंने यह घोषणा की कि वर्ष 2014 के 1.85 लाख करोड़ (ट्रिलियन) डॉलर की अर्थव्यवस्था से बढ़कर आज हम 2.7 लाख करोड़ डॉलर की अर्थव्यवस्था बन चुके हैं. अगले चंद वर्षों में हम बखूबी पांच लाख करोड़ डॉलर की अर्थव्यवस्था तक पहुंच सकते हैं.’ 
 
उनके ये शब्द मोदी के आलोचकों को यह याद दिलाने को काफी थे कि कांग्रेस और उसके सहयोगी दलों ने भारत की अर्थव्यवस्था में पिछले छह दशकों में जितना कुछ जोड़ा है, उसकी तुलना में मोदी के नेतृत्व में भाजपा 250 प्रतिशत की अतिरिक्त कीमत जोड़ेगी. जो कुछ किया जाना है, वह बुनियादी ढांचे में पांच वर्षों की एक जुनूनी कोशिश है, जिनमें गांवों में भंडारण सुविधाओं का सृजन तथा शहरों का आधुनिकीकरण, उच्च पथों, रेलवे, हवाई मार्गों, जलमार्गों, आइटी, ब्रॉडबैंड का निर्माण और विस्तार तथा 1.25 लाख किमी ग्रामीण सड़कों का निर्माण शामिल है. 
 
ऐसा निश्चय व्यक्त करना आसान, मगर करना कठिन होता है. अंतर्निहित अकुशलता तथा वोटबैंक की राजनीति के कारण भारत में आर्थिक लक्ष्य शायद ही कभी पूरे हो पाते हैं. मोदी की चुनौती यह है कि वे मुद्रास्फीति तथा विदेशी विनिमय दरों को लक्षित करते हुए अर्थव्यवस्था में वास्तविक वृद्धि सुनिश्चित करें. 
 
यह आवश्यक है कि हमारी जीडीपी-वृद्धि रोजगारपरक हो, न कि प्रौद्योगिकी-संपन्न बहुराष्ट्रियों के लिए राजस्वपरक. आज भारत विश्व की सर्वाधिक तीव्र ट्रिलियन डॉलर अर्थव्यवस्था होकर वर्ष 1980 के 13 वें पायदान से शीघ्र ही पांचवें पर पहुंचनेवाला है. यदि मोदी की कोशिशें रंग लायीं, तो वर्ष 2023 तक उक्त आर्थिक लक्ष्य हासिल किया जा सकता है.
 
वर्ष 2014 में मोदी ने न्यूनतम सरकार से अधिकतम शासन प्रदान करने का वचन दिया था. पर सेवा प्रदान में किसी दीगर बेहतरी के बगैर ही केंद्र एवं राज्य दोनों सरकारों का आकार बढ़ गया. आयोगों, कमेटियों, विशेषज्ञ समितियों, तथा सचिव स्तरीय अधिकारियों की तादाद में 25 प्रतिशत इजाफा हो चुका. भारत में ढाई करोड़ से भी ज्यादा सरकारी सेवक हैं, यानी प्रत्येक 25 नागरिकों पर एक सरकारी कर्मी. 
 
इसमें रक्षा सेवाएं एवं सार्वजनिक उपक्रमों के कर्मी शामिल नहीं हैं. जीडीपी का लगभग 10 प्रतिशत उनके वेतन-भत्ते-सुविधाओं पर व्यय होता है. मोदी ने इनके अनुपयोगी हिस्सों की छुट्टी करना शुरू किया है और उन्हें शीघ्रता से अन्य अनुत्पादक मानव संपदा से भी छुटकारा पा लेना चाहिए. 
 
इसी तरह, 150 करोड़ रुपये अथवा उससे भी ऊपर की लागत की 357 अधोसंरचनात्मक परियोजनाएं ऐसी हैं, जिनकी समाप्ति में विलंब एवं अन्य वजहों से उनकी लागतों में 3.39 लाख करोड़ रुपयों की बढ़ोतरी हो चुकी है. 
 
अब इन्हें पूरा करने में सरकार को 25 प्रतिशत अतिरिक्त राशि व्यय करनी होगी. शहरों को स्वच्छ करने तथा नागरिकों को सांस लेने हेतु ताजा हवा मुहैया करने के संदर्भ में पर्यावरण का मुद्दा भी अहम है, जिसे तेल की खपत में हुई असीमित वृद्धि अत्यंत जटिल बना रही है. विद्युत वाहनों का अनिवार्य इस्तेमाल अब अपरिहार्य हो चुका है. 
 
‘जीवनयापन की सुगमता’ एक अन्य महत्वपूर्ण मुद्दा है. इसकी रैंकिंग 79 संकेतकों पर आधारित है, जिन्हें मोटे तौर पर संस्थागत, सामाजिक, आर्थिक तथा भौतिक वर्गों में बांटा जा सकता है. भौतिक वर्ग के अंतर्गत आवासन, जलापूर्ति तथा स्वच्छता जैसी सेवाएं शामिल हैं, जो किसी शहर की रैंकिंग तय करने में 45 प्रतिशत भूमिका निभाती हैं. 
 
अर्थव्यवस्था तथा रोजगार को सम्मिलित रूप से पांच प्रतिशत भारिता (वेटेज) प्रदान की गयी है. इसलिए सरकार को चाहिए कि वह नागरिकों के लिए तीव्र न्याय, समान अवसर, निर्भय यात्राओं के साथ ही जल, स्वच्छ पर्यावरण, गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य तथा शिक्षा सेवाएं हासिल कर पाना सुनिश्चित करे. भारत के अधिकतर छोटे शहरों एवं गांवों में स्वच्छ पेयजल तथा प्राथमिक स्वास्थ्य परिचर्या जैसी बुनियादी सुविधाओं का अभाव है. बड़ी तादाद में हवाईअड्डों एवं विमानों के बावजूद 70 प्रतिशत से भी ज्यादा भारतीयों के लिए भरोसेमंद तथा सुरक्षित सार्वजनिक परिवहन प्रणाली उपलब्ध नहीं है.
 
प्रौद्योगिकी-श्रम संघर्ष भी एक मुख्य समस्या है. व्यापक प्रौद्योगिकी ने रोजगार सृजन को न्यूनतम बना दिया है, जो 10 प्रतिशत युवाओं को प्रभावित कर रहा है. अतः पांच लाख करोड़ डॉलर की अर्थव्यवस्था का एक बड़ा हिस्सा श्रम-संकुल परियोजनाओं से सृजित होना चाहिए. 
वर्ष 2019 में मोदी को उचित ही सबका साथ मिला है. अब सबका प्रामाणिक विकास तय करते हुए उनके आर्थिक स्वप्न के विजेता संख्या तक पहुंचने की बारी है. ऐसा विकास के उस प्रतिफल का समानतापरक वितरण सुनिश्चित करने से ही संभव हो सकेगा, जो भारतीयों द्वारा भारत में भारतीयों के हित सृजित किया गया हो.
(अनुवाद: विजय नंदन)                 
 

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