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calcutta

  • Jun 13 2019 2:26AM
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..ताकि बनने को मजदूर, न कोई बच्चा हो मजबूर

पहल  l बाल श्रमिक रहे एक प्रशिक्षु सिपाही ने लिया बच्चों की पहरेदारी का संकल्प

 
कोलकाता : बचपन में रोजी-रोटी के लिए बाल श्रम कर चुके एक प्रशिक्षु सिपाही ने बुधवार को ‘बाल श्रम निषेध दिवस’ के मौके पर इसे समाज से मिटाने का संकल्प लिया. वह सिपाही बन कर बच्चों को मजदूरी करने के लिए मजबूर करनेवालों के खिलाफ खड़े होंगे. ऐसे बच्चों को पढ़ाई के लिए सहयोग करेंगे.  
 
 बिहार पुलिस अकादमी के 22 वर्षीय रोहित महतो अपना प्रशिक्षण खत्म होने का बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं, ताकि वह इस सामाजिक खतरे से निपटने के लिए उचित कदम उठा सके.  महतो 15 साल की उम्र में पढ़ाई छोड़ कर गुजरात के सूरत चले गये थे, जहां वह अपने परिवार की बुनियादी जरूरतों को पूरा करने के लिए जरी का काम किया करते थे.  इससे पहले वह बिहार के पश्चिमी चंपारण में रहते थे.  उन्हें हर दिन सात से आठ घंटे काम करने के लिए 8,000-10,000 रुपये प्रति माह मिला करते थे. 
 
महतो ने कहा : हमारा वेतन इस बात पर निर्भर करता था कि हम क्या काम करते हैं. ऐसा भी वक्त था, जब मुझे अपने परिवार से बात करने तक का समय भी नहीं मिलता था. महतो के दोबारा स्कूल जाने का सफर भी आसान नहीं था, क्योंकि उनके माता-पिता इसके खिलाफ थे. 
आखिरकार एक गैर सरकारी संगठन (एनजीओ) के हस्तक्षेप के बाद माता-पिता उन्हें स्कूल भेजने को राजी हो गये. महतो को यह बात स्वीकार करने में कोई हिचक नहीं है कि पढ़ाई छोड़ना उनकी जिंदगी का सबसे बड़ा गलत फैसला था. आज वह जो कुछ भी हैं, उसका सारा श्रेय एनजीओ ‘चाइल्ड राइट एंड यू’ (क्राइ) को देते हैं, जो उनकी जिंदगी को बाल श्रम की दलदल से निकाल कर बेहतर रास्ते पर ले आया. 
महतो ने पुलिस अकादमी में कहा कि वह अपने बीते हुए कल को भूल जाना चाहते हैं, लेकिन अधिक से अधिक बच्चों तक पहुंचने का हर संभव प्रयास कर वह उन्हें इस खतरे से अवगत करायेंगे. 
 
‘बाल श्रम निषेध दिवस’ के मौके पर महतो ने कहा : मेरे सेवा में शामिल होने के बाद मैं यह सुनिश्चित करूंगा कि मैं इससे निपटने के लिए अधिक से अधिक बच्चों तक पहुंच पाऊं. साथ ही उन्होंने नागरिक समाज, सरकारी एजेंसियों और जनता से इस सामाजिक बुराई को समाप्त करने की अपील भी की.
 
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