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bbc news

  • Oct 8 2019 8:05AM
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रफ़ालः भारत को फ़्रांस से मिल रहा जेट कितना ताक़तवर, कितना ज़रूरी ?

रफ़ालः भारत को फ़्रांस से मिल रहा जेट कितना ताक़तवर, कितना ज़रूरी ?

रफ़ाल

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वायु सेना दिवस यानी 8 अक्तूबर को भारत को अपना पहला रफ़ाल युद्धक विमान मिलने जा रहा है. रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह इसे लेने के लिए फ़्रांस पहुँचे हुए हैं. उन्होंने पेरिस जाने से पहले खुद ट्वीट कर इसकी जानकारी दी थी.

https://twitter.com/rajnathsingh/status/1181098961815261185

भारत को जो रफ़ाल लड़ाकू विमान मिल रहे हैं उसे फ़्रांस की दासॉ कंपनी ने बनाया है और इसकी ख़रीद को लेकर बहुत विवाद भी हुए थे.

कब हुआ था समझौता?

साल 2010 में यूपीए सरकार ने ख़रीद की प्रक्रिया फ़्रांस से शुरु की. 2012 से 2015 तक दोनों के बीच बातचीत चलती रही. 2014 में यूपीए की जगह मोदी सरकार सत्ता में आई.

सितंबर 2016 में भारत ने फ़्रांस के साथ 36 रफ़ाल विमानों के लिए करीब 59 हज़ार करोड़ रुपए के सौदे पर हस्ताक्षर किए.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सितंबर 2016 में कहा था, 'रक्षा सहयोग के संदर्भ में 36 रफ़ाल लड़ाकू विमानों की ख़रीद को लेकर ये खुशी की बात है कि दोनों पक्षों के बीच कुछ वित्तीय पहलुओं को छोड़कर समझौता हुआ है.'

क्या है विवाद?

सितंबर 2016 में हुई इस डील को लेकर कांग्रेस ने दावा किया था कि यूपीए सरकार के दौरान एक रफ़ाल फाइटर जेट की कीमत 600 करोड़ रुपये तय की गई थी लेकिन मोदी सरकार के दौरान जब डील को अंतिम रूप दिया गया तो उसके मुताबिक प्रत्येक रफ़ाल करीब 1600 करोड़ रुपये का पड़ेगा.

रफ़ाल की ख़रीद में अनियमितता का आरोप लगाते हुए पूर्व केंद्रीय मंत्री अरुण शौरी और यशवंत सिन्हा के साथ साथ वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण ने भारत की शीर्ष अदालत सुप्रीम कोर्ट में इस डील को लेकर स्वतंत्र जांच की याचिकाएं दायर कीं लेकिन दिसंबर 2018 में इस डील से संबंधित दायर सभी याचिकाओं को कोर्ट ने ख़ारिज करते हुए कोर्ट की निगरानी में जांच की मांग ठुकरा दी थी.

हालांकि इन्होंने फिर पुनर्विचार याचिका दायर. इसमें कहा गया कि कोर्ट के फ़ैसले में कई सारी तथ्यात्मक ग़लतियां हैं. सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला सरकार से मिले एक सीलबंद लिफाफे में दी गई ग़लत जानकारी पर आधारित है जिस पर किसी व्यक्ति के हस्ताक्षर भी नहीं हैं.

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रफ़ाल की कीमत, उसकी संख्या और अन्य अनियमितता को लेकर चीफ़ जस्टिस रंजन गोगोई ने कहा था, "कोर्ट का ये काम नहीं है कि वो निर्धारित की गई रफ़ाल कीमत की तुलना करे. हमने मामले की अध्ययन किया, रक्षा अधिकारियों के साथ बातचीत की, हम निर्णय लेने की प्रक्रिया से संतुष्ट हैं."

कोर्ट ने ये भी कहा कि "हम इस फ़ैसले की जांच नहीं कर सकते कि 126 रफ़ाल की जगह 36 विमान की डील ही क्यों की गई. हम सरकार से ये नहीं कह सकते कि आप 126 रफ़ाल ख़रीदें."

लेकिन रक्षा विशेषज्ञ मारुफ़ रज़ा कहते हैं कि रफ़ाल भारत को मिला है ये सबसे बेहतरीन फाइनेंशियल डील है.

मारुफ़ रज़ा कहते हैं, "भारतीय सेना में कोई भी नया हथियार लिया जाता है उसे बहुत जांच परख कर लिया जाता है. लंबे वक्त तक जांचने के बाद ही सेना उसे ख़रीदने की सलाह देती है. रफ़ाल के मुक़ाबले का कोई युद्धक विमान पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में ही नहीं है. चाहे चीन हो या पाकिस्तान या अन्य कोई देश. यही वजह है कि इसे लेकर बहुत प्रोपगैंडा भी हुआ. साथ ही उसकी ख़रीद को लेकर बहुत विवाद हुआ लेकिन कोई भी अब तक साबित नहीं हो सका."

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'नाकाफ़ी हैं 32 विमान'

एक ओर मारुफ़ रज़ा कहते हैं कि भारत 16-16 विमानों के जो दो स्क्वाड्रन ख़रीद रहा है उससे उसकी रक्षा ज़रूरतें पूरी हो जाएंगी तो दूसरी तरफ़ रक्षा विशेषज्ञ राहुल बेदी की राय उनसे उलट है. उन्होंने बीबीसी को बताया था कि भारत के लिए इतने विमान नाकाफ़ी हैं.

वे कहते हैं कि रफ़ाल से भारतीय एयर फ़ोर्स की ताक़त तो ज़रूर बढ़ेगी, लेकिन इसकी संख्या बहुत कम है. उनके अनुसार 36 रफ़ाल अंबाला और पश्चिम बंगाल के हासीमारा स्क्वाड्रन में ही खप जाएंगे.

वो कहते हैं, 'दो स्क्वाड्रन काफ़ी नहीं हैं. भारतीय वायु सेना की 42 स्क्वाड्रन आवंटित हैं और अभी 32 ही हैं. जितने स्क्वाड्रन हैं उस हिसाब से तो लड़ाकू विमान ही नहीं हैं. हमें गुणवत्ता तो चाहिए ही, लेकिन साथ में संख्या भी चाहिए. अगर आप चीन या पाकिस्तान का मुक़ाबला कर रहे हैं तो आपको लड़ाकू विमान की तादाद भी चाहिए.'

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रफ़ाल की क्षमता पर कोई शक नहीं

भारतीय वायु सेना ने रफ़ाल को एक बेहतरीन लड़ाकू विमान बताते हुए कहा था कि इसमें ज़बरदस्त क्षमताएं हैं.

मारुफ रज़ा कहते हैं कि रफ़ाल की जो ख़ासियत है उसकी बदौलत उसे फोर्स मल्टीप्लायर कहा जा सकता है.

वे बताते हैं कि रफ़ाल की फ्लाइंग रेंज आम युद्धक विमानों और हथियारों से कहीं ज़्यादा है.

रज़ा कहते हैं, "उसकी मिसाइल 300 किलोमीटर की दूर से फ़ायर की जा सकती हैं जो अपने टारगेट को बिल्कुल हिट करेंगी. रफ़ाल की ऑपरेशनल उपलब्धता 65 से 70 फ़ीसदी तक है जबकि सुखोई की पचास फ़ीसदी. इसका मतलब यह हुआ कि सुखोई के आधे विमान किसी भी समय मेंटेनेंस में हो सकते हैं."

वे कहते हैं, "यह मल्टी रोल नहीं, ओमनी रोल वाला विमान है. पहाड़ी जगहों पर छोटी जगहों पर उतर सकता है. चलती हुई एयरक्राफ़्ट कैरियर पर समुद्र में उतर सकता है."

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किन खूबियों से लैस है रफ़ाल फ़ाइटर प्लेन?

• रफ़ाल विमान परमाणु मिसाइल डिलीवर करने में सक्षम.

• दुनिया के सबसे सुविधाजनक हथियारों को इस्तेमाल करने की क्षमता.

• इसमें दो तरह की मिसाइलें हैं. एक की रेंज डेढ़ सौ किलोमीटर है तो दूसरी की रेंज क़रीब तीन सौ किलोमीटर की है.

• परमाणु हथियारों से लैस रफ़ाल हवा से हवा में 150 किलोमीटर तक मिसाइल दाग सकता है और हवा से ज़मीन तक इसकी मारक क्षमता 300 किलोमीटर है.

• रफ़ाल जैसा विमान चीन और पाकिस्तान के पास भी नहीं है.

• ये भारतीय वायुसेना के इस्तेमाल किए जाने वाले मिराज 2000 का एडवांस वर्जन है.

• भारतीय एयरफ़ोर्स के पास 51 मिराज 2000 हैं.

• दासॉ एविएशन के मुताबिक, रफ़ाल की स्पीड मैक 1.8 है. यानी क़रीब 2020 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार.

• ऊंचाई 5.30 मीटर, लंबाई 15.30 मीटर. रफ़ाल में हवा में तेल भरा जा सकता है.

• रफ़ाल लड़ाकू विमानों का अब तक अफ़ग़ानिस्तान, लीबिया, माली, इराक़ और सीरिया जैसे देशों में हुई लड़ाइयों में इस्तेमाल हुआ है.

• पूर्व रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर ने कहा था कि रफ़ाल का टारगेट अचूक होगा. रफ़ाल ऊपर-नीचे, अगल-बगल यानी हर तरफ़ निगरानी रखने में सक्षम है. मतलब इसकी विजिबिलिटी 360 डिग्री होगी. पायलट को बस विरोधी को देखना है और बटन दबा देना है और बाक़ी काम कंप्यूटर कर लेगा.

कई खूबियों से लैस जो रफ़ाल फ़्रांस से ख़रीदा जा रहा है उसे आधिकारिक रूप से परमाणु हथियारों से लैस नहीं किया गया है. ऐसा अंतरराष्ट्रीय संधियों के कारण किया गया है.

हालांकि कई विशेषज्ञों का मानना है कि भारत मिराज 2000 की तरह इसे भी अपने हिसाब से विकसित कर लेगा.

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